मिट्टी की मर्यादा और जल की तपस्या से सजेगा हरित भविष्य

Feb 03, 2026 - 22:03
0 2
मिट्टी की मर्यादा और जल की तपस्या से सजेगा हरित भविष्य

block-350 block-350

मिट्टी की मर्यादा और जल की तपस्या से सजेगा हरित भविष्य

*-उमाशंकर पांडेय*

भारतीय कृषि की गाथा आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। दशकों पहले हमने खाद्यान्न की कमी वाले देश से निकलकर दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पादकों और निर्यातकों की कतार में अपनी जगह बनाई । यह हमारी मेहनत और बेहतर बीजों, सिंचाई के विस्तार व रासायनिक उर्वरकों का ही परिणाम था । लेकिन आज जब मैं अपने गांव जखनी, जिला बांदा, उत्तर प्रदेश की मिट्टी को छूता हूं, तो विशेषज्ञ एक गंभीर चेतावनी देते सुनाई देते हैं। वे कहते हैं कि जिस रासायनिक बैसाखी के दम पर हमने तरक्की की, उसने हमारी मिट्टी और पाताल के पानी को गहरा जख्म दिया है । *साइलेंट वेल्थ पर अदृश्य संकट* मिट्टी सिर्फ धूल नहीं, बल्कि देश की साइलेंट वेल्थ मौन संपदा है, जो हमारी पूरी खाद्यन्न व्यवस्था की नींव है । लेकिन यूरिया जैसे नाइट्रोजन उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग ने इस संपदा को खोखला कर दिया है। आज हमारी मिट्टी में सिर्फ मुख्य पोषक तत्वों की ही नहीं, बल्कि सल्फर, जिंक और बोरॉन जैसे सूक्ष्म तत्वों की भी भारी कमी हो गई है। नतीजा हमारे सामने है—मिट्टी की उपजाऊ शक्ति घट रही है और खेतों की पैदावार थम सी गई है।

हमें अब के मंत्र को जीवन में उतारना होगा: सही स्रोत (Right Source), सही खुराक (Right Dose), सही समय (Right Time) और सही स्थान (Right Place) । यह केवल तकनीक नहीं, बल्कि मिट्टी के प्रति हमारी जिम्मेदारी है ताकि पोषक तत्वों की बर्बादी न हो और पर्यावरण सुरक्षित रहे । *जखनी का अनुभव: हर खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़* मेरी जीवन यात्रा सूखे से जूझते बुंदेलखंड के जखनी गांव से शुरू हुई । साल 2005 में जब कोई सरकारी सहायता नहीं थी। बारिश के साथ बहती मिट्टी को खेत में रोकने के लिए कोई योजना भी नहीं थी। तब हमने सामुदायिक एकजुटता से परंपरागत जल संरक्षण खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़ का अभियान शुरू किया । हमारा लक्ष्य सीधा था—बारिश की हर बूंद को खेत में रोकना और धरती की कोख(एक्वीफर)को फिर से भरना । आज गर्व होता है कि नीति आयोग ने इस जखनी मॉडल को सराहा है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने मेड़बंदी सहित परंपरागत तरीके से जल संरक्षण के लिए देशभर के सरपंचों को पत्र लिखा। जिस बुंदेलखंड के बांदा, चित्रकूट जैसे जिलों में कभी गर्मियों में रेलगाड़ी से पानी आता था, वहां मेड़बंदी के कारण भू-जल स्तर में 1.34 मीटर तक का सुधार देखा गया है । लेकिन एक डर हमेशा बना रहता है—यदि हम जल तो बचा लें, पर उर्वरकों और रसायनों के जहर से मिट्टी को न बचा पाए, तो यह सारी मेहनत बेकार जाएगी । जल संरक्षण के साथ जैविक और प्राकृतिक खेती का संगम ही किसानों के लिए सोने पर सुहागा साबित होगा। *एकीकृत पोषण: परंपरा और तकनीक का मेल* भविष्य की कृषि का आधार एकीकृत पोषण प्रबंधन (INM) है।

इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि हम उर्वरकों को पूरी तरह त्याग दें, बल्कि उन्हें जैविक खाद, बायो-फर्टिलाइजर और सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ संतुलित करें। सरकार भी इस दिशा में ठोस कदम उठा रही है। फर्मेंटेड जैविक खाद (FOM) और मोलासेस से निकलने वाले पोटाश (PDM) को अब उर्वरक सब्सिडी के दायरे में लाया गया है, ताकि मिट्टी का ऑर्गेनिक कार्बन लेवल सुधारा जा सके । तकनीक भी अब किसान के दरवाजे पर है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) अब महज एक कागज नहीं, बल्कि किसान का गाइड बन रहा है । इसे डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) से जोड़ने की योजना है, जिससे हर खेत को उसकी जरूरत के हिसाब से पर्सनलाइज्ड सलाह मिल सकेगी । गांवों में बन रहे प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र (PMKSKs) अब खेती के वन-स्टॉप हब बन रहे हैं, जहां खाद से लेकर विशेषज्ञ सलाह तक सब एक छत के नीचे उपलब्ध है । *नैनो क्रांति और नीतिगत सुधार* भारत आज नैनो फर्टिलाइजर के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है। नैनो यूरिया और लिक्विड बायो-फर्टिलाइजर जैसे उत्पाद न केवल बर्बादी रोकते हैं, बल्कि पैदावार भी बढ़ाते हैं। 'पीएम-प्रणाम' (PM-PRANAM) जैसी योजनाएं राज्यों को रासायनिक खादों का मोह छोड़ने और वैकल्पिक पोषक तत्वों में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं । साथ ही, कृषि में ड्रोन का प्रवेश 'प्रिसिजन फार्मिंग' यानी सटीक खेती के सपने को सच कर रहा है ।

हालांकि, चुनौतियां अभी शेष हैं। यूरिया पर अत्यधिक सब्सिडी के कारण संतुलन अभी भी बिगड़ा हुआ है। हमें ऑर्गेनो-मिनरल फर्टिलाइजर (OMFs) के लिए एक स्पष्ट नियामक ढांचा चाहिए, ताकि खनिज और जैविक तत्वों का दोहरा लाभ खेतों तक पहुंच सके। *एक लचीला भविष्य* जैसे-जैसे भारत विकास के पथ पर अग्रसर होगा, सरकार, उद्योग व खेती करने वाले लोगों के बीच तालमेल बहुत जरूरी होगा। 4R के सिद्धांत को रसायनिक खादों के लिए अपनाने, खेती में आधुनिक तकनीक के विस्तार से बदलाव लाए जा सकते आज मिट्टी की सेहत को प्राथमिकता देकर, भारत का उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है। 2026 की देहरी पर खड़े होकर जब हम विकसित भारत का सपना देखते हैं, तो उसका रास्ता हमारे खेतों की मेड़ों से होकर ही जाता है। *(लेखक पद्मश्री से सम्मानित, जलयोद्धा है।)*

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0
SuragBureau

Surag Bureau पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और स्थानीय व राष्ट्रीय मुद्दों पर समाचार लेखन करते हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना हैं।

Comments (0)

User