बचपन का गाँव

Dec 10, 2024 - 19:58
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बचपन का गाँव

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बचपन का गाँव ठण्डी-ठण्डी छांव में

उस बचपन के गाँव में मैं-जाना चाहती हूँ।

तोडऩा चाहती हूँ बंदिश चारों पहर की।

नफरत भरी ये जिन्दगी शहर की॥

अपनेपन की छाया मैं पाना चाहती हूँ।

 उस बचपन के गाँव में मैं-जाना चाहती हँ हूँ॥

 घुट-सी गयी हूँ इस अकेलेपन में

खुशियों के पल ढूँढ रही निर्दयी से सूनेपन में

इस उजड़े गुलशन को मैं महकाना चाहती हूँ। 

उस बचपन के गाँव में मैं-जाना चाहती हूँ। 

प्रेम और भाईचारे का जहाँ न संगम हो। 

भागे एक-दूजे से दूर न मिलन की सरगम हो॥

उस संसार से अब मैं छुटकारा चाहती हूँ।

उस बचपन के गाँव में मैं-जाना चाहती हूँ।

—प्रियंका 'सौरभ'

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SuragBureau

2020 से सुराग ब्यूरो वेब पोर्टल मैनेजमेंट टीम सदस्य

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