उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाहियों का गुडवर्क और श्रेय लेते ‘मोटी तोंद’ वाले अफसर

Dec 13, 2025 - 16:15
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उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाहियों का गुडवर्क और श्रेय लेते ‘मोटी तोंद’ वाले अफसर

उत्तर प्रदेश पुलिस में सिपाहियों का गुडवर्क और श्रेय लेते ‘मोटी तोंद’ वाले अफसर

 ● रामप्रसाद माथुर

ग्राउंड पर मेहनत, फाइलों में नाम—एक सच्चाई

उत्तर प्रदेश पुलिस देश की सबसे बड़ी पुलिस फोर्स मानी जाती है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने से लेकर अपराध नियंत्रण, वीआईपी सुरक्षा, चुनाव ड्यूटी, आपदा प्रबंधन और रोज़मर्रा की शांति व्यवस्था तक—हर मोर्चे पर पुलिस की मौजूदगी अनिवार्य है। लेकिन इस विशाल व्यवस्था के भीतर एक ऐसी हकीकत भी है, जिस पर अक्सर खुलकर चर्चा नहीं होती। वह हकीकत है—सिपाहियों की कड़ी मेहनत और उसका श्रेय ऊपर बैठे “मोटी तोंद” वाले अफसरों द्वारा ले लिया जाना।

 ■ ग्राउंड पर सिपाही, कैमरे में अफसर

किसी अपराध का खुलासा हो, चोर-लुटेरों की गिरफ्तारी हो या मुठभेड़—अधिकांश मामलों में जमीन पर काम सिपाही और हेड कांस्टेबल करते हैं। रात-रात भर गश्त, मुखबिरों से संपर्क, संदिग्धों की निगरानी, दबिश के दौरान जोखिम—ये सब सिपाही के हिस्से आता है। लेकिन जब प्रेस नोट जारी होता है, तो नाम थानेदार से लेकर उच्चाधिकारियों तक के होते हैं। सिपाही की भूमिका अक्सर “पुलिस टीम” शब्द में समेट दी जाती है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में अफसर सफलता की कहानी सुनाते हैं, कैमरों के सामने मुस्कराते हैं, जबकि जिन सिपाहियों ने अपनी जान जोखिम में डालकर अपराधियों को पकड़ा, वे पीछे खड़े रह जाते हैं। यही कारण है कि आम जनता को लगता है कि सारा काम अफसर ही कर रहे हैं, जबकि हकीकत इससे उलट है।

सीमित संसाधन, असीम जिम्मेदारी

 उत्तर प्रदेश के सिपाही सीमित संसाधनों में काम करते हैं। कई थानों में आज भी वाहनों की कमी है, वायरलेस सेट ठीक से काम नहीं करते, और रहने-खाने की व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। इसके बावजूद उनसे 24 घंटे उपलब्ध रहने की अपेक्षा की जाती है। त्योहार हो या चुनाव, वीआईपी दौरा हो या प्राकृतिक आपदा—सिपाही हर समय ड्यूटी पर तैनात रहता है। इसके उलट, कई वरिष्ठ अफसर वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर फाइलों पर हस्ताक्षर करते हैं। योजनाएं बनती हैं, निर्देश जारी होते हैं, लेकिन अमल सिपाही करता है। जब परिणाम सकारात्मक आता है, तो वाहवाही ऊपर तक पहुंच जाती है।

पुरस्कार और पदोन्नति में असंतुलन

पुलिस विभाग में अच्छे कार्य के लिए पुरस्कार और पदोन्नति की व्यवस्था है, लेकिन यहां भी असंतुलन देखने को मिलता है। कई बार बड़े ऑपरेशन के बाद अफसरों को प्रशस्ति पत्र, नकद इनाम और मीडिया कवरेज मिलती है, जबकि सिपाही को मामूली शाबाशी या कुछ सौ रुपये का इनाम देकर मामला निपटा दिया जाता है। कुछ मामलों में तो जिन सिपाहियों ने मुख्य भूमिका निभाई होती है, उनके नाम तक रिकॉर्ड में नहीं आते। इससे उनके मनोबल पर असर पड़ता है। मेहनत करने के बावजूद पहचान न मिलना, व्यवस्था के प्रति निराशा पैदा करता है।

■ “मोटी तोंद” एक प्रतीक यहां 

मोटी तोंद वाले” शब्द किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है, जो सत्ता और पद के साथ आती है। यह वह सोच है, जिसमें नीचे काम करने वालों को केवल आदेश पालन करने वाला माना जाता है, और सफलता का श्रेय ऊपर बैठे लोग ले लेते हैं। यह समस्या केवल उत्तर प्रदेश पुलिस तक सीमित नहीं, बल्कि कई सरकारी विभागों में देखने को मिलती है।

सिपाहियों की चुप्पी क्यों?

सवाल उठता है कि सिपाही इस अन्याय के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाते? इसका जवाब है—डर और मजबूरी। अनुशासनात्मक कार्रवाई, तबादले का भय और विभागीय राजनीति के कारण सिपाही खुलकर बोल नहीं पाते। कई बार शिकायत करने पर उल्टा उन्हें ही परेशानी झेलनी पड़ती है। इसके अलावा, आर्थिक जिम्मेदारियां और नौकरी की सुरक्षा भी उन्हें चुप रहने को मजबूर करती है। वे जानते हैं कि सिस्टम से टकराने का खामियाजा उन्हें ही भुगतना पड़ेगा।

 ■ सुधार की जरूरत

यदि पुलिस व्यवस्था को वास्तव में मजबूत बनाना है, तो सिपाहियों को उनका हक देना होगा। अच्छे कार्य के लिए व्यक्तिगत पहचान, पारदर्शी पुरस्कार प्रणाली और निष्पक्ष पदोन्नति आवश्यक है। प्रेस ब्रीफिंग और सरकारी रिकॉर्ड में उन सिपाहियों के नाम भी सामने आने चाहिए, जिन्होंने असली काम किया है। साथ ही, वरिष्ठ अफसरों को यह समझना होगा कि नेतृत्व का अर्थ श्रेय लेना नहीं, बल्कि टीम को आगे बढ़ाना है। जब सिपाही सम्मानित महसूस करेगा, तभी वह और बेहतर प्रदर्शन करेगा। 

निष्कर्ष

उत्तर प्रदेश पुलिस की रीढ़ सिपाही है। उसकी मेहनत, ईमानदारी और साहस के बिना कानून-व्यवस्था की कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन जब उसका गुडवर्क फाइलों और कैमरों के बीच दब जाता है और श्रेय “मोटी तोंद” वाले अफसर ले जाते हैं, तो यह केवल सिपाही का नहीं, पूरी व्यवस्था का नुकसान है। अब समय आ गया है कि इस सच्चाई को स्वीकार किया जाए और बदलाव की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं—ताकि मेहनत करने वाले हाथों को उनका सही सम्मान मिल सके।