भारत तो स्वतंत्र है पर हमारी शिक्षा नहीं

Jul 28, 2024 - 18:05
0 35
भारत तो स्वतंत्र है पर हमारी शिक्षा नहीं

भारत तो स्वतंत्र है पर हमारी शिक्षा नहीं

विजय गर्ग

असल में हमारी आकांक्षाओं और वास्तविकता में बहुत बड़ा अंतर है। सबसे बड़ा अंतर तब नजर आता है, जब हम स्कूलों की ओर देखते हैं। पिछले 77 सालों से हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे एक स्वतंत्र सोच, आत्मविश्वास और इनोवेटिव भारतीय की तरह बड़े हों। लेकिन हमारे शिक्षा तंत्र ने वह सबकुछ किया है, जिससे उन्हें दबा हुआ और अधिकारहीन रखा जाए। यह दुखद है कि साल-दर-साल अभिभावकों को बच्चों को अच्छे स्कूलों में एडमिशन दिलाने के लिए लंबी लाइनों में लगना पड़ता है।

इनमें अधिकतर को मायूसी ही मिलती है, क्योंकि अच्छे स्कूलों में पर्याप्त सीटें नहीं हैं। शिक्षा की स्थिति पर वार्षिक रिपोर्ट (एएसईआर) में हर बार यह बुरी खबर आती है कि कक्षा पांच के आधे से भी कम बच्चे ही एक पैराग्राफ को पढ़ सकते हैं या कक्षा दो की किताब से गणित का सवाल हल कर सकते हैं। कुछ राज्यों में 10% से भी कम शिक्षक पात्रता परीक्षा को पास कर पाते हैं। यूपी और बिहार में तो चार में से तीन शिक्षक पांचवीं की किताब से प्रतिशत का सवाल नहीं कर सकते। इसकी वजह अच्छे स्कूलों की कमी है। अभिभावकों को अपने बच्चे निजी स्कूलों मेंं भेजने के लिए मजबूर किया जाता है।

 सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2011 से 2015 के बीच सरकारी स्कूलों में नामांकन 1.1 करोड़ कम हुआ, इसके विपरीत निजी स्कूल में 1.6 करोड़ बढ़ा। इस ट्रेंड के आधार पर 2020 में देश में 1,30,000 अतिरिक्त निजी स्कूलों की जरूरत है, लेकिन वे नहीं खुल रहे हैं। क्यों? इसके कई कारण हैं। पहला यह कि किसी ईमानदार के लिए स्कूल खोलना बहुत मुश्किल है। इसके लिए राज्य के अनुसार 30 से 45 अनुमतियों की जरूरत होती है और इनमंे से अधिकांश के लिए रिश्वत देनी पड़ती है। सबसे अधिक रिश्वत स्कूल बोर्ड से मान्यता हेतु असेंशियलिटी सर्टिफिकेट (यह साबित करना कि स्कूल की जरूरत है) के लिए देनी होती है।

इस कमी की दूसरी वजह फीस पर नियंत्रण है। समस्या शुरू होती है शिक्षा का अधिकार कानून से। जब सरकार को लगा कि सरकारी स्कूल विफल हो रहे हैं तो उसने निजी स्कूलों में 25 फीसदी सीटें गरीबों के लिए आरक्षित करने को कहा। यह एक अच्छा विचार था, लेकिन इसे खराब तरीके से लागू किया गया। क्योंकि सरकार निजी स्कूलों को इन आरक्षित सीटों के बदले ठीक से मुआवजा नहीं दे सकी, जिसकी वजह से फीस देने वाले 75 फीसदी बच्चों पर बोझ बढ़ा। इसका अभिभावकों ने विरोध किया। कई राज्यों ने फीस पर नियंत्रण लगा दिया, जिससे लगातार स्कूलों की वित्तीय स्थिति खराब हो गई। जिंदा रहने के लिए कई स्कूलों ने खर्चे कम किए, जिससे गुणवत्ता में कमी आई और कई स्कूल तो बंद ही हो गए। स्कूलों की स्वायत्तता पर नया हमला निजी प्रकाशकों की किताबों को प्रतिबंधित करना है।

 2015 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्कूलों को सिर्फ एनसीईआरटी की किताबें ही इस्तेमाल करने का निर्देश दिया है। इससे किताबों की कीमत में तो कमी आई है, लेकिन अभिभावक इनकी गुणवत्ता व देरी को लेकर चिंतित हैं। यद्यपि एनसीईआरटी की किताबें बेहतर हुई हैं, लेकिन पढ़ाई का पुराना तरीका कायम है। शिक्षक हैलो इंग्लिश और गूगल बोलो जैसे आश्चर्यजनक एप्स से अनजान हैं, जो भारतीय बच्चों को तेजी से अंग्रेजी बोलना सिखा सकते हैं। शिक्षाविदों की चिंता है कि इस प्रतिबंध से भारतीय बच्चे दुनिया में हो रही क्रांतियों के बारे में जानने से वंचित हो सकते हैं, विशेषकर डिजिटल लर्निंग के क्षेत्र में। इससे वे ज्ञान अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में राेजगार के अवसरों से भी वंचित हो सकते हैं।

दुखद है कि एशिया का उच्च प्रदर्शन वाला शैक्षिक तंत्र एक उदार बहुपुस्तक नीति के विपरीत दिशा में चला गया है। इसने एक किताब और एक परीक्षा की कड़ी को तोड़कर विद्यार्थियों के प्रदर्शन को बेहतर बनाया था। चीन ने 1980 के आखिर में ही राष्ट्रीय पुस्तक नीति को छोड़ दिया था और बच्चों को कई किताबें इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया, ताकि वे आधुनिक समाज के वास्तविक अनुभवों से जुड़ सकें। गणतंत्र बनने के 70 साल के बाद अब समय है कि निजी स्कूलों को स्वयत्तता दी जाए। 1991 के सुधारों ने उद्योगों को स्वायत्तता दी, लेकिन हमारे स्कूलों को नहीं, जो आज भी लाइसेंस राज के नीचे कराह रहे हैं।

इसके बावजूद भारत के विकास में निजी स्कूलों का योगदान अमूल्य है। इनमें पढ़े लोग हमारे प्रोफेशनल, सिविल सेवा और व्यापार में उच्च पदों पर हैं। यह समय है कि भारत को अब अपना वह सामाजिक पाखंड छोड़ देना चाहिए, जाे निजी स्कूलों को लाभ कमाने से रोकता है। जिंदा रहने के लिए उसे लाभ कमाना ही होगा और इससे ही गुणवत्ता बढ़ेगी व अच्छे स्कूलों की मांग पूरी हो सकेगी। इन्हें केवल नॉन प्रॉफिट से प्रॉफिट क्षेत्र में बदलने से क्रांति आ सकती है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में निवेश आएगा और इनकी गुणवत्ता बढ़ेगी। आज भारतीय अच्छी शिक्षा के लिए खर्च करने को तैयार हैं। एक स्वतंत्र देश मंे किसी को एक अच्छे स्कूल या बेहतर किताब पर खर्च करने से क्यों रोका जाना चाहिए? निजी स्कूलों पर अधिक नियंत्रण की बजाय सरकार को सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने पर फोकस करना चाहिए।

इसकी शुरुआत मंत्रालय को दो कार्यों को अलग करके करनी चाहिए- 1. शिक्षा का नियमन बिना पक्षपात के करने के लिए सार्वजनिक व निजी दोनों ही क्षेत्रों पर समान मानदंड लागू करना। 2. सरकारी स्कूलों को चलाना। आज हितों के टकराव की स्थिति है, जो प्रशासक को भ्रमित करती है और उसका परिणाम गलत नीतियां होती हैं। समय आ गया है, जब निजी स्कूलों को अधिक स्वतंत्रता दी जाए, सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारी जाए और उस दिन का इंतजार किया जाए जब एडमिशन के लिए ये लाइनें छोटी होंगी और हमारी आकांक्षाएं हकीकत के निकट होंगी। हो सकता है

 विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शैक्षिक स्तंभकार मलोट

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Wow Wow 0
Sad Sad 0
Angry Angry 0

Comments (0)

User