केजीएमयू में सम्मानित हुए डॉ. सुरेश चन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ और प्रो. यशवंत वीरोदय
केजीएमयू में सम्मानित हुए डॉ. सुरेश चन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ और प्रो. यशवंत वीरोदय
*चिकित्सा, साहित्य और संस्कृति के समन्वय से ही समाज निर्माण संभव: प्रो. वीरेंद्र आतम*
लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के मेडिसीन विभाग में सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। यहां नॉर्वे से आए भारतीय-नॉर्वेजीयन सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम के अध्यक्ष, वरिष्ठ पत्रकार और सांस्कृतिक कार्यकर्ता डॉ. सुरेश चन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ और डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय लखनऊ के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. यशवंत वीरोदय को शिक्षा, साहित्य और सांस्कृतिक क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मेडिसीन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. वीरेंद्र आतम ने की, जबकि संचालन एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सतीश कुमार ने किया। डॉ. सुरेश चन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ भारत एवं नॉर्वे के सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से ओस्लो (नॉर्वे) में स्थापित भारतीय-नॉर्वेजीयन सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम (Indo & Norwegian Information and Cultural Forum) के अध्यक्ष हैं। वे हिन्दी और नार्वेजियन भाषा की बहुसांस्कृतिक द्वैमासिक पत्रिका ‘स्पाइल-दर्पण’ के संपादक भी हैं। विगत 32 वर्षों से वे पत्रकारिता के माध्यम से हिन्दी भाषा और साहित्य की सेवा कर रहे हैं और भारत तथा यूरोप के बीच सांस्कृतिक संवाद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती प्रदान कर रहे हैं।
डॉ. शरद आलोक साहित्य और पत्रकारिता के साथ-साथ दृश्य माध्यमों में भी सक्रिय रहे हैं। उन्होंने हिंदी टेलीफिल्म ‘तलाश’ और ‘गुमराह’ के साथ नॉर्वेजियन टेलीफिल्म ‘रायसेन तिल कनाडा’ का निर्माण किया है। अपने संबोधन में डॉ. सुरेश चन्द्र शुक्ल ने कहा कि नॉर्वे सहित यूरोप के अनेक देशों में भारतीय संस्कृति, योग, अध्यात्म, हिन्दी साहित्य और भारतीय जीवन-दर्शन के प्रति निरंतर रुचि बढ़ रही है। साहित्य और भाषा किसी भी सभ्यता की आत्मा होती है और इन्हीं के माध्यम से देशों के बीच आपसी समझ, संवाद और सहयोग को मजबूती मिलती है। प्रो. यशवंत वीरोदय ने कहा कि शिक्षा और साहित्य समाज को वैचारिक दिशा देने का सशक्त माध्यम हैं। विश्वविद्यालयों में इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों को केवल अकादमिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि वैश्विक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक संवेदनशीलता भी प्रदान करते हैं। प्रो. यशवंत वीरोदय समकालीन हिंदी साहित्य के प्रमुख समालोचक हैं। वे साहित्य को सत्ता संरचनाओं पर विमर्श का मंच बनाते हुए समकालीन सामाजिक प्रश्नों को रचनात्मक आलोचना के केंद्र में रखते हैं। उनकी गजलों के माध्यम से दलित और वंचित वर्गों के संघर्षों को सशक्त स्वर मिलता है। उनकी प्रमुख कृतियों में हिंदी साहित्य की मुख्यधारा (2010), दलित शिखरों का साक्षात्कार (2013) और सत्ता विमर्श एवं अस्मिता शामिल हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. वीरेंद्र आतम ने कहा कि चिकित्सा केवल शारीरिक उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के बौद्धिक, नैतिक और सांस्कृतिक विकास में भी चिकित्सकों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
ऐसे आयोजनों से विद्यार्थियों में मानवीय दृष्टिकोण, सामाजिक उत्तरदायित्व और संवेदनशीलता का विकास होता है, जो उन्हें बेहतर चिकित्सक और जागरूक नागरिक बनने की प्रेरणा देता है। इसके बाद कार्यक्रम का संचालन कर रहे एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सतीश कुमार ने कहा कि केजीएमयू जैसे चिकित्सा संस्थानों में साहित्य और संस्कृति से जुड़े आयोजन छात्रों के समग्र व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक हैं। इससे उनमें संवाद की क्षमता, संवेदनशीलता और सामाजिक समझ विकसित होती है, जो चिकित्सा पेशे को और अधिक मानवीय बनाती है। इस अवसर पर डॉ. हरीश गुप्ता, डॉ. रोशन, डॉ. प्रांजल, डॉ. भावना लालवानी, डॉ. आशुतोष सहित मेडिसीन विभाग के अन्य शिक्षक, चिकित्सक और बड़ी संख्या में छात्र उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन सम्मानित अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए किया गया।