ग्रहण, होलिका दहन और रंगोत्सव : शास्त्र सम्मत निर्णय

Feb 27, 2026 - 21:35
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ग्रहण, होलिका दहन और रंगोत्सव : शास्त्र सम्मत निर्णय

*ग्रहण, होलिका दहन और रंगोत्सव : शास्त्र सम्मत निर्णय* (आचार्य राजेश-विभूति फीचर्स)

इस वर्ष होली के पर्व पर ग्रहण के चलते असमंजस की स्थिति बनी हुई है ऐसे में शास्त्रों के अनुसार समय और नियमों का पालन करना अत्यंत कल्याणकारी रहेगा। तिथि और समय की गणना के अनुसार विशेष दिशा-निर्देश निम्नलिखित हैं- *होलिका दहन (2 मार्च)* शास्त्रों के अनुसार, पूर्णिमा तिथि 2 मार्च को सायंकाल 5:27 (गोधूली बेला से पूर्व) प्रारंभ हो रही है। अतः होलिका पूजन और प्रज्वलन 2 मार्च को ही किया जाना शास्त्र सम्मत और शुभ है।

 ध्यान दें 3 मार्च को गोधूली बेला से पूर्व ही पूर्णिमा समाप्त हो रही है, निर्णय सिंधु अनुसार तीन पहर व्यापनी पूर्णिमा 3 मार्च को नहीं है इसलिए दहन का मुख्य विधान 2 मार्च को ही मान्य होगा। *रंगोत्सव एवं अनराय की होली* परंपरा के अनुसार, जिस दिन होलिका प्रज्जवलित की जाती है, उसके अगले दिन रंगोत्सव (रंग वाली होली) और अनराय की होली मनाई जाती है। 3 मार्च को ग्रहण का प्रभाव होने के कारण समय का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। *ग्रहण, सूतक काल और होली उत्सव* 3 मार्च को ग्रहण लगने के कारण सूतक काल के नियमों का पालन करना उचित रहेगा। *1. ठाकुर जी को रंग अर्पण* सूतक काल सुबह 9:20 बजे से प्रारंभ होगा। अतः इससे पूर्व ही भगवान को अबीर-गुलाल अर्पित कर होली उत्सव की शुरुआत कर लेनी चाहिए। *2. होली खेलने का समय शास्त्रानुसार सूतक काल में होली खेलने (रंग खेलने) में कोई दोष नहीं लगता है।

3. शुभ समय* ग्रहण काल के दौरान मानसिक शांति और सात्विकता बनाए रखना आवश्यक है। इसलिए दोपहर से पूर्व (सूतक के शुरुआती समय में) होली मनाना सबसे उत्तम और शुभ फलदायी होगा। अतः 2 मार्च की शाम को होलिका दहन करें और 3 मार्च को सुबह ८ बजे से पहले प्रभु को रंग लगाकर दोपहर तक उल्लासपूर्वक होली मनाएं। *(विभूति फीचर्स)*