Article : मेडल से बड़ी कसौटी: जीवन और रिश्तों की सफलता

Jan 17, 2026 - 09:25
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Article : मेडल से बड़ी कसौटी: जीवन और रिश्तों की सफलता

(क्या पुरुष त्याग की गरिमा नहीं है?) मेडल से बड़ी कसौटी: जीवन और रिश्तों की सफलता

भारतीय समाज में त्याग की भाषा पारंपरिक रूप से स्त्रियों से जोड़ी गई है। जब कोई पुरुष त्याग करता है—करियर छोड़ता है, घर संभालता है, बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाता है—तो समाज असहज हो जाता है। न तो उसे उस त्याग का नैतिक सम्मान मिलता है, न ही उसे सशक्तिकरण की कहानी का हिस्सा माना जाता है। जो लोग संघर्ष के समय आधार बने—घर संभालने वाले पति, बच्चों की परवरिश करने वाले पिता, मानसिक संबल देने वाले जीवनसाथी—वे सफलता की कहानी से अक्सर गायब कर दिए जाते हैं। कई बार उन्हें “निर्भर”, “निष्क्रिय” या “कमज़ोर” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि उन्होंने पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं को तोड़ते हुए वह किया, जिसे समाज आज भी पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाया है।

डॉ. प्रियंका सौरभ

मेडल खेल की कामयाबी का प्रमाण हो सकता है, लेकिन वह जीवन की कामयाबी का प्रमाण नहीं होता। किसी खिलाड़ी, अधिकारी या चर्चित चेहरे की उपलब्धियाँ चाहे जितनी बड़ी हों, यदि निजी जीवन में रिश्ते टूटन, कटुता और आरोपों से भरे हों, तो उस सफलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। आज का भारतीय समाज इसी दुविधा से गुजर रहा है—जहाँ करियर की उड़ान ऊँची है, लेकिन रिश्तों की ज़मीन लगातार खिसकती जा रही है। बीते कुछ वर्षों में सार्वजनिक जीवन में सक्रिय, सफल और प्रभावशाली महिलाओं के निजी रिश्ते बार-बार चर्चा का विषय बने हैं। खेल, मीडिया, प्रशासन और कॉरपोरेट जगत—हर क्षेत्र में यह प्रश्न उभरकर सामने आया है कि क्या व्यक्तिगत सफलता के साथ रिश्तों की कीमत चुकाना अब सामान्य बात हो गई है, या फिर हम सफलता की परिभाषा को ही गलत दिशा में ले जा रहे हैं। भारतीय समाज में सफलता को लंबे समय तक सामूहिक प्रयास का परिणाम माना जाता रहा है। यहाँ व्यक्ति अकेला नहीं जीतता—उसके साथ परिवार, जीवनसाथी, परिस्थितियाँ और अनगिनत अदृश्य हाथ होते हैं। विशेषकर महिलाओं के करियर में यह सहयोग और भी महत्वपूर्ण रहा है।

सामाजिक बंधन, पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ और मातृत्व जैसे कारक अक्सर उनके रास्ते में दीवार बनकर खड़े होते हैं। ऐसे में यदि कोई पति इन दीवारों को तोड़ने में सहयोगी बनता है, तो उसकी भूमिका साधारण नहीं कही जा सकती। खेल जगत की विश्वविख्यात बॉक्सर मेरी कॉम का उदाहरण इस संदर्भ में बार-बार सामने आता है। उनके शुरुआती संघर्षों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचने की यात्रा में उनके पति करुण ओंगखोलर की भूमिका को लंबे समय तक मौन समर्थन के रूप में देखा गया। माँ बनने के बाद, जब दुनिया को लगा कि उनका करियर अब ठहर जाएगा, तब घरेलू ज़िम्मेदारियाँ संभालकर उन्होंने यह संभव बनाया कि मेरी कॉम फिर से रिंग में लौट सकें। ऐसे उदाहरण केवल खेल तक सीमित नहीं हैं। प्रशासनिक सेवाओं में चयनित अनेक एसडीएम और आईएएस अधिकारियों की सफलता के पीछे भी ऐसे पति रहे हैं जिन्होंने अपने करियर को पीछे रखकर घर और बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाई। मीडिया जगत में भी कई महिला पत्रकारों और एंकरों की सफलता की कहानियों में यह सहयोगी भूमिका दिखाई देती रही है, जिसे अक्सर शब्दों में जगह नहीं मिलती। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब सफलता के शिखर पर पहुँचने के बाद यही रिश्ते बोझ समझे जाने लगते हैं। बीते वर्षों में देश की कुछ चर्चित महिलाएँ—जैसे एंकर अमृत राय और आज तक की वरिष्ठ पत्रकार चित्रा त्रिपाठी—अपने वैवाहिक अलगाव को लेकर सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनीं। इसी तरह प्रशासनिक सेवाओं और अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे कई मामले सामने आए, जहाँ करियर स्थापित होने के बाद रिश्ते टूटते नज़र आए। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि हर तलाक़ या अलगाव के पीछे एक ही कारण नहीं होता। किसी भी रिश्ते की जटिलताओं को बाहर से पूरी तरह समझ पाना संभव नहीं है।

 कई बार अलग होना मानसिक स्वास्थ्य, आत्मसम्मान या व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए ज़रूरी भी हो सकता है। लेकिन जब बार-बार एक जैसा पैटर्न उभरता है—संघर्ष के समय साथ और सफलता के बाद दूरी—तो यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक प्रश्न बन जाता है। आज का दौर “मैं” की संस्कृति का दौर है। उपलब्धियों की भाषा में “मैंने किया”, “मैंने बनाया”, “मैंने कमाया” जैसे वाक्य केंद्र में आ गए हैं। सोशल मीडिया, पुरस्कार समारोह और टेलीविजन इंटरव्यू व्यक्तिगत ब्रांडिंग को बढ़ावा देते हैं। इस प्रक्रिया में ‘हम’ धीरे-धीरे हाशिये पर चला जाता है। जो लोग संघर्ष के समय आधार बने—घर संभालने वाले पति, बच्चों की परवरिश करने वाले पिता, मानसिक संबल देने वाले जीवनसाथी—वे सफलता की कहानी से अक्सर गायब कर दिए जाते हैं। कई बार उन्हें “निर्भर”, “निष्क्रिय” या “कमज़ोर” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जबकि उन्होंने पारंपरिक लैंगिक भूमिकाओं को तोड़ते हुए वह किया, जिसे समाज आज भी पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाया है। नारी सशक्तिकरण का अर्थ आर्थिक स्वतंत्रता, पहचान और निर्णय की आज़ादी से है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह भी है कि संघर्ष के समय सहयोग देने वाले रिश्तों को नकार दिया जाए? क्या सशक्तिकरण का मतलब कृतज्ञता का अंत है? यह प्रश्न आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। विडंबना यह है कि जिस समाज ने लंबे समय तक महिलाओं को घरेलू भूमिकाओं तक सीमित रखा, उसी समाज में जब कोई पुरुष घरेलू ज़िम्मेदारी उठाता है, तो उसे सम्मान के बजाय संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। ऐसे पुरुषों को अक्सर “पत्नी की कमाई पर जीने वाला” कहकर अपमानित किया जाता है। यह सोच न केवल पुरुषों के साथ अन्याय है, बल्कि समानता की मूल भावना के भी विरुद्ध है। समस्या तब और गहरी हो जाती है, जब निजी रिश्तों के टूटने की कहानी सार्वजनिक मंचों पर एकतरफा बयानों के रूप में सामने आती है।

मेरी कॉम द्वारा टेलीविजन पर दिए गए बयान, जिनमें उन्होंने अपने पति के त्याग पर सवाल उठाया, इस बहस को और तीखा बना देते हैं। संभव है कि उनके अनुभव और आरोपों के पीछे ठोस कारण हों, लेकिन सार्वजनिक बयान रिश्तों की पूरी तस्वीर को अक्सर अधूरा और असंतुलित बना देते हैं। सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों की यह ज़िम्मेदारी भी बनती है कि वे निजी रिश्तों को बयानबाज़ी के ज़रिये सामाजिक ट्रायल में न बदलें। क्योंकि ऐसे बयान केवल दो व्यक्तियों को नहीं, बल्कि पूरे समाज की सोच और मूल्यों को प्रभावित करते हैं। भारतीय समाज में त्याग की भाषा पारंपरिक रूप से स्त्रियों से जोड़ी गई है। जब कोई पुरुष त्याग करता है—करियर छोड़ता है, घर संभालता है, बच्चों की ज़िम्मेदारी उठाता है—तो समाज असहज हो जाता है। न तो उसे उस त्याग का नैतिक सम्मान मिलता है, न ही उसे सशक्तिकरण की कहानी का हिस्सा माना जाता है। यदि समानता का अर्थ वास्तव में समान अवसर और समान सम्मान है, तो घरेलू श्रम और भावनात्मक सहयोग को भी उसी गरिमा से देखा जाना चाहिए, चाहे वह स्त्री करे या पुरुष। आज ज़रूरत इस बात की है कि हम सफलता को नए सिरे से परिभाषित करें। वह सफलता अधूरी है, जो रिश्तों की कीमत पर हासिल की जाए। वह पद खोखला है, जो अपने ही अतीत को नकार दे। और वह मेडल चमकहीन है, जिसके पीछे टूटे रिश्तों की पीड़ा छिपी हो। इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति को किसी असफल या विषाक्त रिश्ते में बने रहना चाहिए।

बल्कि इसका अर्थ यह है कि सफलता के साथ संवेदनशीलता, कृतज्ञता और साझेदारी के मूल्यों को भी उतना ही महत्व दिया जाए। अंततः प्रश्न यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत। प्रश्न यह है कि हम किस तरह की सफलता को आदर्श मान रहे हैं। क्या वह सफलता, जो मंच पर तालियाँ बटोरती है लेकिन घर में सन्नाटा छोड़ देती है, या वह सफलता, जो उपलब्धियों के साथ रिश्तों की गरिमा भी बचा सके? मेडल खेल की जीत का प्रतीक हो सकता है, लेकिन जीवन की जीत रिश्तों की परीक्षा में तय होती है। और सच्ची कामयाबी वही है, जो मंच पर भी दिखे और घर के भीतर भी महसूस हो।

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