दोस्ती के रंग

Colours of Friendship- दोस्ती के रंग

Jul 16, 2024 - 08:04
Updated: 2 years ago
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दोस्ती के रंग
Colours of Friendship

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दोस्ती के रंग - विजय गर्ग 

दोस्त का कोई तय मतलब नहीं होता है और अगर मतलब होता तो दोस्ती होती ही नहीं। दोस्ती इस संसार का ऐसा नाता है जो किसी भी औपचारिकता का मोहताज नहीं है, किसी प्रकार के बंधन का पर्याय नहीं है। अच्छे दोस्त होना मोक्ष पाने के बराबर है। रिश्ते-नाते मुसीबत में साथ तो आते तो हैं, लेकिन उनमें किंतु-परंतु बहुत होते हैं। वहीं दोस्ती सारी किंतु-परंतु से ऊपर होती है। जो कोई आगे-पीछे नहीं सोचता, बस खुशी हो या गम, बगैर बुलाए, बगैर किसी तामझाम के जो आ जाए, वही दोस्त और ईश्वर होते हैं ।

 ऐसा कहते हैं कि दोस्ती हृदय से हृदय का बंधन होता है और सच्चा दोस्त परेशानी आने से पहले ही मौजूद हो जाता है । कुछ लोग अपने दोस्ताना मिजाज के लिए ही बने होते हैं । मित्रता का विज्ञान ही दिल से चलता है, जहां गुणा- भाग, घटाव का स्थान नहीं होता है, सिर्फ जोड़ होता है । इतना ही गणित आता है दोस्तों को । वे एक और एक ग्यारह करना जानते है, दो और दो पांच तो कभी आठ कर देते हैं, पता ही नहीं चलता । रसायन भी इतना ही जानते है कि जो पदार्थ घुलनशील हैं, वे ही दोस्तों को याद रहते हैं। दोस्त नमक की तरह होते हैं । न हों तो खाने का स्वाद ही नहीं रहता है । उनका अर्थशास्त्र अलग ही होता है और कहता है, 'तू रख अभी, जब तेरे पास आएगा तब दे देना ।'

दोस्त सिर्फ आवरण को प्रभावित नहीं करते, वे अंतरतम तल तक जाकर वह सब कुछ जानते हैं जो शायद परिवार के लोग भी नहीं जानते । उन्हें तुरंत पता चल जाता है कि दोस्त की इस समय जरूरतें क्या हैं । ऐसा अनुसंधान कहते हैं कि अगर मन में अवसाद है तो वह दोस्तों की संख्या पर निर्भर करता है । 'प्रोसीडिंग्स आफ रायल सोसायटी' जर्नल में प्रकाशित शोध दोस्ती के बारे में नई बात सामने रखता है। शोध में ऐसे दो हजार विद्यार्थियों को शामिल किया गया, जिनमें अवसाद के लक्षण दिखे । सामने आया कि जिन विद्यार्थियों के पास दोस्तों की संख्या बड़ी थी, उनमें अवसाद के लक्षण घटे ।

 इनमें दोगुना तेजी से सुधार की संभावना देखी गई । अमेरिका में हुई एक और शोध के मुताबिक, अकेलापन अवसाद बढ़ाने के साथ सेहत को भी प्रभावित करता है । दरअसल, दोस्तों का दायरा हमारी उम्र बढ़ाता है और हमें खुश भी रखता है । दोस्ती हमेशा प्रेरणा देती है और हमें एकाकीपन से परे धकेलती है। जहां मौन हो वहां अगर दोस्त हो तो भी वह उस मौन को पढ़ लेता है । वे उन भावनाओं, अपनापन, खुशी, गम सबको पढ़ लेते हैं और वैसे ही सहयोग देने लगते हैं। बचपन के दोस्त तो ऐसे होते जो हमारी रग-रग से वाकिफ होते हैं और हमें चिढ़ाए बगैर नहीं मानते ।

 ब्रिटिश मानव विज्ञानी और शोधकर्ता राबिन डनबार की शोध कहती है कि एक इंसान डेढ़ सौ से अधिक दोस्तों से दोस्ती नहीं निभा सकता। इनमें से इंसान के दिल के करीब कुछ ही दोस्त होते हैं। सबसे अच्छे दोस्त कितने होते हैं, इस पर राबिन का कहना है कि एक इंसान भले ही डेढ़ सौ दोस्तों के दायरे को निबाह सकता है, लेकिन मात्र पांच दोस्त ही ऐसे होते हैं, जिनसे वह अपनी हर बात साझा कर सकता है। जर्नल 'साइकोलाजिकल साइंस' में प्रकाशित शोध के मुताबिक, जो लड़के बचपन में अपने दोस्तों के साथ ज्यादा वक्त बिताते हैं, जब वे तीस वर्ष के होते हैं तो उनका रक्तचाप और 'बाडी मास इंडेक्स' कम रहता है।

 अमेरिका की टेक्सास टेक यूनिवर्सिटी के जेनी कंडिफ का कहना है, 'शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि शुरुआती जीवन का वयस्क होने पर हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है । बचपन के हमारे दोस्त बड़े होने पर भी हमारी सेहत को फायदा पहुंचाते हैं।' जीवन में कुछ रिश्ते हमें ऊपर वाला ही बनाकर देता है, लेकिन दोस्ती का रिश्ता हम नीचे आकर स्वयं चुनते हैं। कई शोध में यह सिद्ध भी हो चुका है कि अकेले रहने वाले लोगों के शरीर में कार्टिसोल नाम का तनाव हार्मोन तेजी से बनता है, जिसकी वजह से उन्हें तनाव से जुड़ी समस्याएं होने लगती हैं। वहीं जिन लोगों के पास दोस्त होते हैं, जो ज्यादातर समय दोस्तों के साथ बिताते हैं, उनके तनाव हार्मोन कम हो जाते हैं । वे न सिर्फ बुरे वक्त में काम आते हैं, बल्कि हमें दिमाग से भी तेज बनाते हैं ।

 यह सच है कि जिनके पास दोस्त हैं, वे लोग बाकी लोगों के मुकाबले दिमागी तौर पर ज्यादा जवान और तेज होते हैं। एक शोध के मुताबिक, यादों, भावनाओं और प्रेरणाओं को महसूस करने वाला दिमाग का हिस्सा स्पष्ट रूप से उम्र के साथ प्रभावित होता है। लोगों के दिमाग के इस हिस्से में सामाजिक संबंध संरक्षित रहते हैं । दरअसल, दोस्ती का एक ही नियम है कि उसका कोई नियम नहीं है। बगैर नियम के जो चले और उसमें चार चांद लगा दे वही दोस्ती का आयाम होता है। वैसे हर दोस्ती अपने आप में एक मिसाल होती है, क्योंकि कोई भी दोस्ती की तुलना दूसरी दोस्ती से नहीं की जा सकती। हर दोस्ती में कुछ नया ही मिलेगा, कुछ अतरंगी मिलेगा। जितने रंग दोस्ती के होते हैं, उतने रंग तो शायद कुदरत ने भी नहीं बनाए।

-विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य शैक्षिक स्तंभकार मलोट

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SuragBureau

Surag Bureau पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और स्थानीय व राष्ट्रीय मुद्दों पर समाचार लेखन करते हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना हैं।

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