लाखों का घपला, मार्गशीर्ष मेला सोरों शूकरक्षेत्र में मेला प्रशासन की मनमानी- प्रो0 योगेन्द्र

Jan 13, 2024 - 17:38
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लाखों का घपला, मार्गशीर्ष  मेला  सोरों  शूकरक्षेत्र  में मेला  प्रशासन  की  मनमानी- प्रो0 योगेन्द्र
लाखों का घपला, मार्गशीर्ष  मेला  सोरों  शूकरक्षेत्र  में मेला  प्रशासन  की  मनमानी- प्रो0 योगेन्द्र

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लाखों का घपला, मार्गशीर्ष मेला सोरों शूकरक्षेत्र में मेला प्रशासन की मनमानी- प्रो0 योगेन्द्र

सोरों सूकरक्षेत्र । प्रोफेसर योगेंद्र मिश्र, सदस्य, हिंदी सलाहकार समिति, नागर विमानन मंत्रालय भारत सरकार ने कहा है कि शूकरक्षेत्र महोत्सव’ की जगह प्रांतीय मेला तथा ‘पत्रकार सम्मेलन’ के स्थान पर “पत्रकार सम्मान समारोह” कर मेला प्रषासन ने की मनमानी, सरकार ने मेला मार्गषीर्श को किया है राजकीय मेला। जहाँ कलम के सिपाहियों का सत्कार एक रचनात्मक पहल है।

तुलसी जन्मभूमि में शूकरक्षेत्र महोत्सव 2023 के राजकीय मेला मार्गशीर्ष वार्षिक अमृत कुम्भ, के समापन पर नगर पालिका परिषद, सोरों द्वारा मेला मजिस्ट्रेट के अनुमोदन से तीर्थ के उदीयमान कलम के सिपाहियों (पत्रकारों) का सामूहिक सत्कार किया गया। यह एक अच्छी पहल है। ऐसे कार्यक्रमों से पारदर्शिता आयेगी। शूकरक्षेत्र महोत्सव, सोरों 2023 में सम्मानित सभी पत्रकारों का हृदय से अभिनन्दन हुआ।

 यह सम्मान कलम की धार को मजबूती के साथ सामाजिक सरोकारों पर प्रहार करेगा। (माला-शॉल, स्मृति चिन्ह) कुंद नहीं होने देगा। कलम की तेज धार हर धारा को चीरकर नीर-क्षीर कर देती है। भले ही मंच से आयोजकों (नगरपालिका) ने महोत्सव में जनसरोकार से जुड़े पहलुओं को सुझाव देने के बाद भी नजर अंदाज किया, उन गलतियों की औपचारिक क्षमा मांग ली। लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ पत्रकारिता के पत्रकारों का सम्मान लोकतंत्र का, जागरूक पहरुओं का सम्मान है।

 स्वस्थ समाज का सच्चा आईना यही पत्रकारिता ही है। अभिनन्दन! कलम के सिपाहियों का सत्कार, कलम की पैनी धार का सत्कार। इलेक्ट्रॉनिक-प्रिंट मीडिया के सम्मानित सभी 30 पत्रकार बन्धुओं को बधाई। प्रत्येक कार्यक्रम उपरांत समीक्षा का विधान है। विशेषकर संघ परिवार में। मेला सम्पन्न हुआ, तो मेला की भी समीक्षा होनी चाहिए। कहाँ तक मेला प्रशासन ने सफलता पाई या घोर मनमानी का शिकार हुआ मेला।

कतिपय रायचन्द, माटूचन्द, भाटचन्द, ज्ञानचन्द बनने का ढोंग कर रहे हैं, क्योंकि उनकी आर्थिकी से सरोकार है। एक कहावत है- “गंजे को नाखून न दे, नहीं तो खुजला कर सिर घायल कर लेगा।” ऐसे ही ज्ञानचंदों ने, अतीत में जाएँ तो ज्ञात होता है कि आजादी से पहले कैसे परस्पर दो नगरपालिका अध्यक्ष को लड़ाया गया। इन्हीं ज्ञानचंदों ने पंडित जी की चेयरमैनी छीनी। अतः आज महती अत्यावश्यकता है जागरूक नागरिक बन लोकतंत्र में लोकसेवक को उसके कर्तव्याकर्तव्य का बोध कराते रहना। देश का चैकीदार भी समय समय पर देश की जनता का मन्तव्य लेते रहते हैं।

चाहे ‘मन की बात’ हो या ‘चुनाव सुधार।’ मेला प्रशासन की मनमानी के कुछ उदाहरण हैं, जिनसे सीख लेनी चाहिए:- शूकरक्षेत्र महोत्सव, 2023 के आयोजन हेतु उत्तर प्रदेश सरकार से आये 20 लाख रूपये का सदुपयोग जनसरोकारों के साथ कितना हुआ, जन-मन (जनता-जनार्दन/देवतुल्य कार्यकर्ता) मेला पांडाल में हुए कार्यक्रमों से कितना जुडे,सरकार ने धनराशि तीर्थ हित में (जनता का मेला है इस वास्ते) आवण्टित की,मनमानी, मौजमस्ती को नहीं। 20 दिसम्बर, 2023 से गट्टा,बुरादा के अलाव कितनी जगह जले, 20 लाख रूपये जनता के टैक्स के हैं, इसका लेखा जोखा का ब्यौरा ?

पत्रकार सत्कार का बजट मेला मजिस्ट्रेट ने कितना रखा एवं समाचार पत्रों में दिए गए मेला के विज्ञापनों के मानक एवं उन पत्रों की प्रामाणिकता ? यह सभी यक्ष प्रश्न ? कलम का पैनापन सामाजिक सरोकारों को और अधिक मुखरित करेगा। तुलसी तथा तीर्थ की आवाज हैं हमारे कलमकार। ऐसे सम्मानों से प्रोत्साहन तो मिलता ही है, ऊर्जा भी। लेकिन जिम्मेदारी, जबाबदेही चैगुनी बढ़ जाती है। सोशल मीडिया विश्वभर में हमारे तीर्थ के उदीयमान पत्रकारों को गम्भीरता से देखती तथा सुनती है।

कलम की धार वेगबती गङ्गा जी की धारा की तरह अपार ऊर्जा से लबरेज हो, इसी शुभेच्छा के साथ। 05 जनवरी 2024 को पत्रकार सम्मेलन सायं वेला में होना नगरपालिका के निमंत्रण पर पूर्व नियोजित बिना संयोजक के छपा कार्यक्रम था। मध्यान्ह काल में पत्रकार सम्मेलन सम्मान सम्मेलन में बदल दिया गया।

शिव विवाह आदि तो निर्धारित थे ही नहीं। गङ्गा, वराह, तुलसी, पुरोहित, धर्म संसद, जैसे कार्यक्रमों की दूर दूर तक अनुपस्थिति रही। लगता है समूचा मेला प्रशासन नोसिखिया जैसा था। एकाध को छोड़ सभी कार्यक्रमों का संयोजक पालिका बन गयी क्यों ? ताकि अकेले ही मलाई खाई जा सके। सरकार ने बजट दिया 20 लाख का। 62 लाख का पालिका का ठेका अलग उठा।

फिर कार्यक्रमों की अफरा-तफरी क्यों हुई। एक महीने पहले मेरेराम ने 40 सुझाव दिए गए, बिना संयोजकों के कुछ ही नाम मात्र को कार्यक्रम क्यों हुए? जनमानस का जुड़ाव क्यों नहीं हुआ? कुछ ज्ञानचंद सोशल मीडिया में जनता से जुड़ने की अपील करते पाए गए। हड़बड़ी में मेला अव्यवस्था की भेंट क्यों चढ़ा? स्म्क् समय से पहले क्यों उतर गईं? तुलसी,रत्नावली, नरहरि पाठशाला, अन्य ऐतिहासिक धरोहरों की साज-सज्जा क्यों नहीं हुई ।

मेला प्रशासन द्वारा प्रकाशित कार्ड में 20 दिसम्बर, 2023 से 05 जनवरी, 2024 तक 17 दिवसीय मेला में कुल 09 दिन कार्यक्रम निर्धारित छपे, बाकी दिनों में मेला मण्डपम (पांडाल) का उपयोग क्या हुआ? क्या शेष दिन खाली पाण्डाल आयोजकों की असफलता बयाँ नहीं करता। आखिर, ये मनमानी क्यों? सरकार जनता द्वारा, जनता के लिए, जन कल्याण निमित्त है। सरकारी धन आम आदमी के टैक्स का है। उसका सदुपयोग हो, वह कलमकार देखें।

सम्भवतः पत्रकार सम्मेलन न कर, पत्रकार सम्मान समारोह करके लगभग 30 पत्रकारों को शॉल, आदि से पुरस्कृत किया गया, ताकि कल को कोई उँगली न उठाएं। वाह, जनता की मानेंगे भी नहीं, करेंगे भी नहीं, केवल मनमानी करने को शहर ने नहीं चुना। सबमें, और आपमें अंतर दिखना चाहिए? सब धान 27 सेर नहीं हैं। काल की गति तेज है देश का चैकीदार जितना चैकन्ना है, देश के जागरूक नागरिक भी उतने ही सतर्क।

24 घण्टे बिजली की आपूर्ति में अँधेरा कायम नहीं रह सकता। अगली बोर्ड मीटिंग में निर्वाचित सभासदों को 62 लाख ठेका तथा 20 लाख सरकार कीओर सेआगत धनराशि का एक नम्बर का हिसाब किताब लेना चाहिए। दूध का दूध, पानी का पानी। सतर्कता आयोग, आरटीआई पारदर्शिता के लिए ही हैं। शूकरक्षेत्र महोत्सव, सोरों अपनी गरिमा के अनुरूप भव्य-दिव्य हो एक मास पूर्व मेला प्रशासन को सुझाव दिए थे।

सभी सुझावों पर पानी क्यों फेरा गया । काश, जनहित में मान लिया होता, अमल में लाये होते। पाठकों के संज्ञान हेतु सूच्य है कि सन् 1997 में आदरणीय श्री उमेश सिन्हा जी, जिलाधिकारी एटा की अध्यक्षता में “शूकरक्षेत्र महोत्सव, सोरों वार्षिक कुम्भ रू मेला मार्गशीर्ष” का आयोजन दिव्यता व भव्यता के साथ हुआ था। समूचे महोत्सव की रचना, कल्पना, क्रियारूप मेरे राम (संयोजक) द्वारा हुआ था। भगवान वराह की प्राकट्य स्थली शूकरक्षेत्र सोरों आदि तीर्थ है, जहाँ आदि तथा भागीरथी गङ्गा जी विद्यमान हैं।

गोस्वामी तुलसीदास जी की पावन जन्मभूमि है। भारत का सबसे प्राचीन मेला है जिसे सरकार ने राजकीय प्रांतीय मेला हेतु 20 लाख रूपये की धनराषि अवमुक्त की है। राशि का समुचित सदुपयोग हो, मेला अपनी गरिमा के अनुकूल हो। 1997 में जिला कोष से 2 लाख, 40 हजार रुपये की धनराशि श्री सिन्हा जी ने महोत्सव हेतु आवंटित की थी। श्री गिरीशचन्द्र कमठान जी के सम्पादन में “सूकरक्षेत्र समाचार” का महोत्सव विशेषांक का विमोचन भी किया गया था।

तव से अनवरत 26 वर्षों से “शूकरक्षेत्र महोत्सव, सोरों” की रचना होती है। 2001 में मुख्यमंत्री श्री राजनाथसिंह जी ने तीर्थ सूची में लाकर तीर्थ को मान्यता दी, वहीं श्री जगमोहन जी, केंद्रीय पर्यटन मंत्री, भारत सरकार व श्री रामप्रसाद कमल उत्तर प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री ने पंचक्रोशी परिक्रमा हेतु 80 लाख की राशि अवमुक्त की थी। 2021 में शूकरक्षेत्र सोरों तीर्थ सूची की व 2020 में प्रान्तीय मेला की शासन से अधिसूचना निर्गत हुई। जिसके अंतर्गत 20 लाख मेला हेतु निर्गत हुए हैं।

2022 में “शूकरक्षेत्र महोत्सव, सोरों” के रजत महोत्सव में श्री उमेश सिन्हा जी व श्री सुरेश चन्द्रा जी को आना था, अपरिहार्य कारण से न आ सके। नगर पालिका परि0, शूकरक्षेत्र सोरों में “शूकरक्षेत्र महोत्सव, सोरों” की पुरानी फाईल आज भी है। “शूकरक्षेत्र महोत्सव, सोरों” 2023 में श्री उमेश सिन्हा जी, श्री सुरेश चन्द्रा जी व डॉ0 दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ आयुश मंत्री, उत्तर प्रदेश से सहभागिता हेतु संवाद जारी रहा, पर इस सन्दर्भ में मेला प्रशासन की घोर उदासीनता रही।

वार्षिक कुम्भ: मेला मार्गशीर्ष, शूकरक्षेत्र महोत्सव, सोरों” को सफल बनाने हेतु कतिपय सुझाव दिए थे, जो मेला प्रशासन ने मनमानी के चलते नकार दिये। शूकरक्षेत्र महोत्सव” का उद्घाटन तीर्थ विकास को समर्पित होता, श्रीरामचरितमानस सम्मेलन, विद्वत संगोष्ठी, पत्रकार सम्मेलन, लेजर लाइट शो, पुरोहित सम्मेलन, महिला सशक्तिकरण सम्मेलन, लोक कला सम्मेलन (लोक संसद), छात्र युवा सम्मेलन, नशा मुक्ति सम्मेलन, गो रक्षा सम्मेलन, पर्यावरण सम्मेलन, स्वच्छता सम्मेलन, कवि सम्मेलन (व्रजभाषा, संस्कृत केन्द्रित), संस्कृत सम्मेलन, साज सज्जा, रंगोली, मेहंदी, अंत्याक्षरी आदि प्रतियोगिताएँ, पंचक्रोशी परिक्रमा का लाइव प्रसारण, शाही स्नान का प्रसारण्, सूचना कार्यालय से मीडिया को प्रत्येक पर्व की सर्वोत्तम कवरेज, जन-सहभागिता की मुहिम जनजागरण हेतु विभिन्न कार्यक्रमों के संयोजक नियुक्त हों, मेलाधिकारी द्वारा प्रतिदिन मोनिटरिंग, गोस्वामी तुलसीदास स्मारक हरिपदी घाट, तुलसी जन्म स्थान मन्दिर मौ0 योगमार्ग, सीताराम मन्दिर, तुलसीदास-नन्ददास संगीत शिक्षा स्थल, नरहरि पाठशाला मौ0 चैधरियान, रत्नावली जन्म स्थान मौ0 बदरिया मुरली मनोहर मन्दिर, रत्नावली समाधि स्मारक दूधेश्वर मन्दिर लहरा रोड़ योगमार्ग, रत्नावली चैक तोलकपुर चुंगी बदरिया, नन्ददास जन्म स्थान ग्राम श्यामसर, तुलसीदास जी की माता हुलसी जन्म स्थान ग्राम तााली आदि की साज-सज्जा कराना व हाईली डेकोरेशन, तीर्थ के प्रमुख धर्मस्थलों, मन्दिरों जिनमें योगेश्वर, भूतेश्वर, चक्रेश्वर, मनकामेश्वर, नीमेश्वर, कटरेश्वर, लहरेश्वर, बनखण्डेश्वर, सूर्य कुण्ड, बाछरू, भूरी देवी, बटकुनाथ मन्दिर, पंच महाशक्ति मन्दिर, चैतन्य महाप्रभु की बैठक आदि स्थलों का ऐतिहासिक महत्व है। सभी पर डेकोरेशन, हरिपदी गंगाजी के चारों ओर तथा द्वारिकाधीश मन्दिर, नगर के प्रमुख चैराहों पर भी डेकोरेशन करायी जाती तथा पर्यटन विभाग स्थान चिन्हित करके तीर्थ के दर्शनीय स्थलों की सूची पट्टिका लगायी जाती, लेजर लाइट शो में धार्मिकता दिखनी चाहिए थी।

मेला ग्राउण्ड में लगने वाले साउण्ड से प्रातः-सायं गंगा आरती का प्रसारण होता। मेले में फूहड़पन व अष्लीलता से बचा जाता, सभी संयोजकों के चयन में तथा कार्यक्रम सम्पादन में पारदर्शिता रखी जाती। मेले के दौरान मांस एवं शराब की बिक्री शासन से प्रतिबन्धित है उसका पालन किया जाता। नागा-साधुओं के शाही स्नान पर सफाई का विशेष अभियान चलाकर सफाई की व्यवस्था की जाती। जिले के सभी शिक्षा संस्थान मेला से जुडें ऐसी भावना।

गङ्गा रक्षा सम्मेलन आदि होते। शासन से निर्गत धन का सदुपयोग होता ताकि अगले वर्ष 50 लाख आवें तभी तीर्थो के विकास से ही भारत का विकास सम्भव होगा । इस आशय का पत्र स्वस्तिमति सुधा वर्मा आईएएस,जिलाधिकारी कासगंज के द्वारा माननीय मंत्री पर्यटन श्री जयवीर सिंहको तथा श्री मुकेश मेश्राम, प्रमुख सचिव, पर्यटन/संस्कृति,श्री कौशलराज शर्मा , निदेशक/अध्यक्ष, धर्मार्थ कार्य निदेशालय,वाराणसी, दूसरा पत्र श्री संजीव कुमार, सदर मेलाधिकारी, श्री रामेश्वर दयाल महेरे, अध्यक्ष, नगरपालिका परि0, अधिशासी अधिकारी, नगरपालिका परि0,शूकरक्षेत्र सोरों को मेल एवं व्हाटसव द्वारा भेजे थे।

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SuragBureau

Surag Bureau पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और स्थानीय व राष्ट्रीय मुद्दों पर समाचार लेखन करते हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना हैं।

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