भारत के श्रमिकों को नई ताकत
भारत के श्रमिकों को नई ताकत
पीआईबी । 2025 में भारत ने श्रमिकों के लिए लंबे समय से चली आ रही बाधाओं को दूर कर औपचारिक अर्थव्यवस्था में अधिशेष श्रम को अवशोषित करने का मार्ग प्रशस्त किया। स्वतंत्रता के बाद से चले आ रहे कठोर श्रम कानूनों ने उद्योगों को श्रम-गहन निवेश से रोका, लेकिन चार श्रम संहिताओं और विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) से अब शहरी-ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में औपचारिक रोजगार संभव हुआ। चीन, वियतनाम और इंडोनेशिया ने 1990-2000 के दशक में श्रम कानूनों को सरल बनाकर बड़े पैमाने पर विनिर्माण में श्रमिकों को अवशोषित किया, जबकि भारत ने अनुमतियों और दंडों का जाल बुन लिया। अब 29 कानूनों को चार संहिताओं में समेटकर भारत ने अनुपालन सरल किया, श्रमिक सुरक्षा बरकरार रखी और भर्ती लचीलापन बढ़ाया।
ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा से विकसित भारत-रोजगार मिशन ने उत्पादकता से जोड़ा, बुआई-कटाई में 60 दिन का विराम दिया। छोटी विनिर्माण इकाइयों को अब एकल पंजीकरण, लाइसेंस और रिटर्न से राहत मिली; निरीक्षण सुविधा-उन्मुख हुए और छोटी गलतियों पर आपराधिक दायित्व समाप्त। मजदूरी सुरक्षा, लिंग समानता, गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा और प्रवासी श्रमिकों की पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित। औपचारिक भर्ती अब जोखिम नहीं, बल्कि आत्मविश्वास का कदम। ₹4 करोड़ पूंजी पार करने पर अब ₹10 करोड़ तक छोटी कंपनी का दर्जा; एमएसएम निवेश सीमा 2.5 गुना और टर्नओवर 2 गुना बढ़ी। पीएफओ ने पूर्व श्रमिकों को बिना पुरानी दायित्व के एकबारगी नामांकन, 12 माह पात्रता और 75% निकासी सरल की, औपचारिकता तेज की।
मनरेगा ने गरीबी घटी लेकिन स्थायी संपत्ति नहीं बनाई और बुआई में श्रम संकट बढ़ाया। विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका मिशन अधिनियम-2025 ने 125 दिन गारंटी बढ़ाई, बुआई-कटाई में 60 दिन विराम, जल सुरक्षा, ग्रामीण आधारभूत संरचना, आजीविका और आपदा न्यूनीकरण पर फोकस। सभी संपत्तियां विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण आधारभूत ढांचा स्टैक में एकीकृत। स्वतंत्रता के बाद पहली बार श्रम नीति भविष्योन्मुखी बनी, श्रम को नियंत्रण नहीं वृद्धि का साझेदार बनाया।