दान का अलिखित संविधान

Oct 28, 2023 - 11:20
Updated: 3 years ago
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दान का अलिखित संविधान

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दान का अलिखित संविधान

A कहते है कि धन शुद्ध रूप से हमारे पास आये और ऐसे वितरित हो कि एक हाथ से दूसरे हाथ को भी मालूम नहीं हो । क्योंकि इस तरह से दिया हुआ दान आत्मतोष की अनुभूति प्रदान करता है ।

कुछ समय पहले किसी ने मुझे एक बात के प्रसंग में कहा कि एक धनवान आदमी को मालूम पड़ा कि इसके घर में सिर्फ एक पुरुष थे जिनकी कुछ समय पहले मृत्यु हो गयी थी अभी कोई कमाने वाला नहीं है परिवार की स्थिति सही नहीं है उसने तुरन्त बिना बोले हर महीने खर्च के रुपये भेजने शुरू कर दिये और बोला कि खर्च में कमी हो तो और बोल देना ।

 सचमुच में शुद्ध मन से दिये हुए दान से अपरिग्रह व अनासक्ति कि भावना का विकास होता हैं । इंसान का जीवन अच्छे कर्मों से मिलता है | इंसानियत की खासियत से ही जीवन खिलता है| अच्छा स्वभाव एक विशेष पहचान बनाता है |

सब के दिलों में वह खास जगह दिलाता है । स्वभाव संग सुंदरता का प्रभाव इतना ही दर्शाता है जैसे कीमती तौफे को खूबसूरती से सजाकर भेंट किया जाता है। इंसान खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है ? ऐसा नहीं है कि इंसान भाग्य लेकर आता है और कर्म लेकर जाता है ।

हम समय-व्यसन-पद-क़षाय-बुराई आदि किसी का भी त्याग करे तो हमें आत्मतोष का अनुभव होगा लेकिन यदि हम ज्ञान-ध्यान-त्याग व परोपकार के शुद्ध आध्यात्मिक उपक्रम को व्यवहार पक्ष संघ-समाज उत्थान में दान के अर्जन से सहयोगी बनेगे तो आत्मतुष्टि होगी। वैसे भी देने के लिये दान सर्वश्रेष्ठ है । क्योंकि वास्तव में मन से दिए दान से हमे हार्दिक सन्तोष मिलता है जो बहुत बड़ा आत्मतोष है । हालाँकि देखा जाए तो दान है परन्तु सामाजिक कर्तव्य का यह पवित्र अलीखित संविधान हैं ।इसीलिए दानदाता सदा ही महान कहलाता है। प्रदीप छाजेड़ ( बोरावड़)

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SuragBureau

Surag Bureau पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और स्थानीय व राष्ट्रीय मुद्दों पर समाचार लेखन करते हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना हैं।

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