भारत का 77वाँ गणतंत्र दिवस : संविधान, उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ
भारत का 77वाँ गणतंत्र दिवस : संविधान, उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ
26 जनवरी 1950 वह दिन है जब भारत का संविधान लागू हुआ था और इसी दिन भारत एक गणतंत्र राष्ट्र बना। इससे पूर्व 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान को अंगीकार किया गया था। इस बार अर्थात् वर्ष 2026 में भारत अपना 77वाँ गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो 26 जनवरी 1950 वह ऐतिहासिक दिन था जब भारत एक संप्रभु, समाजवादी, लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के रूप में विश्व पटल पर स्थापित हुआ। गणतंत्र (रि-पब्लिक) का अर्थ है-एक ऐसी शासन व्यवस्था, जिसमें सत्ता का स्रोत जनता होती है और सरकार लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा चुनी जाती है। गणतंत्र में शासन का सर्वोच्च पद प्राचीनकाल की भांति किसी राजा या महाराजा के पास नहीं होता, बल्कि इसमें संविधान ही सर्वोपरि होता है। वास्तविक अर्थों में, गणतंत्र का मतलब यही है कि संविधान वह मूल कानून है, जो नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों को निर्धारित करता है।
सरल शब्दों में कहा जाए तो गणतंत्र वह व्यवस्था है, जहाँ जनता का शासन कानून और संविधान के माध्यम से चलता है। संविधान का अर्थ है-देश का सर्वोच्च कानून, जिसके ऊपर कोई व्यक्ति, सरकार या संस्था नहीं होती। यही कारण है कि संविधान को देश को चलाने वाली नियम-कानूनों की सर्वोच्च पुस्तक कहा जाता है। पाठकों को जानकारी होगी कि भारतीय संविधान विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। यह स्पष्ट करता है कि देश कैसे चलेगा, सरकार कैसे बनेगी और कैसे कार्य करेगी, नागरिकों के मूल अधिकार और कर्तव्य क्या होंगे तथा देश में न्याय, समानता और स्वतंत्रता कैसे सुनिश्चित की जाएगी। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि जिस देश में संविधान सुरक्षित है, वहाँ लोकतंत्र भी सुरक्षित रहता है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि भारतीय संविधान के निर्माणकर्ता और संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर थे तथा भारतीय संविधान का मूल आधार लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्याय, समानता और स्वतंत्रता है। गणतंत्र दिवस 2026 की मुख्य थीम व उपलब्धियां:- इस वर्ष गणतंत्र दिवस 2026 की मुख्य थीम ‘150 वर्ष : वंदे मातरम्’ रखी गई है। अर्थात् इस बार देश के राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' की रचना के 150 वर्ष पूरे होने का उत्सव मनाया जा रहा है। यह थीम बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ को सम्मान देती है, जो हमारे देश की संस्कृति, इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम की भावना को अभिव्यक्त करती है।
इसके अतिरिक्त वर्ष 2026 के समारोह की दूसरी महत्वपूर्ण थीम ‘विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत’ है, जिसका उद्देश्य वर्ष 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के संकल्प को प्रदर्शित करना है। इस वर्ष गणतंत्र दिवस परेड की एक विशेष उपलब्धि यह है कि पहली बार यूरोपीय संघ के शीर्ष नेताओं को संयुक्त रूप से मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा तथा यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन इस अवसर पर भारत आएंगे। यह आमंत्रण भारत-यूरोपीय संघ (ईयू) संबंधों की बढ़ती मजबूती का प्रतीक है। यूरोपीय संघ यूरोप के 27 देशों का एक आर्थिक-राजनीतिक समूह है, जो आपसी सहयोग, व्यापार, अर्थव्यवस्था, शांति, लोकतंत्र, मानवाधिकारों और सीमा-रहित यात्रा जैसे विषयों पर साझा निर्णय लेता है। गणतंत्र दिवस 2026 की एक और खास बात यह है कि भारतीय सेना पहली बार कर्तव्य पथ पर एक नया ‘बैटल ऐरे फॉर्मेशन’ प्रस्तुत करेगी। इसके साथ ही दर्शक दीर्घाओं के नाम अब नेताओं के बजाय भारत की प्रमुख नदियों के नाम पर रखे गए हैं, जो वीवीआईपी संस्कृति के अंत और जन-प्रधान लोकतंत्र की भावना को दर्शाता है। उभरती हुई अर्थव्यवस्था है भारत:- बहरहाल, आज भारत वैश्विक मंच पर लगातार उभरती हुई एक बड़ी शक्ति बन चुका है। वर्तमान में भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। जनवरी 2026 के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार, भारत ने नॉमिनल जीडीपी के मामले में जापान को पीछे छोड़ते हुए यह गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। भारत की अर्थव्यवस्था लगभग 4.18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के पार पहुँच चुकी है और यह दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था बनी हुई है। क्रय शक्ति समानता (पीपीपी) के आधार पर भारत पहले से ही विश्व में तीसरे स्थान पर है। अब भारत का अगला लक्ष्य जर्मनी को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनना है, जिसके 2027-28 तक साकार होने की पूरी संभावना है।
यह आर्थिक प्रगति मज़बूत घरेलू उपभोग, बुनियादी ढाँचे में भारी निवेश और डिजिटल क्रांति के कारण संभव हुई है। गणतंत्र के समक्ष विद्यमान प्रमुख चुनौतियां:- हालाँकि, 76 वर्ष पूरे करने के बावजूद आज भारतीय गणतंत्र के समक्ष कई गंभीर चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। वास्तव में कोई भी गणतंत्र तभी जीवित रहता है जब उसके नागरिक जागरूक और सजग हों। यह अत्यंत चिंताजनक है कि वर्तमान समय में हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण होता जा रहा है। संवाद, सहमति और असहमति की स्वस्थ परंपरा कमजोर पड़ रही है। मतभेद को देशद्रोह और आलोचना को विरोध मानने की प्रवृत्ति किसी भी लोकतंत्र के लिए घातक है। यह बहुत दुखद है आज संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाए जा रहे हैं। न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका और मीडिया जैसी संस्थाओं पर दबाव और पक्षपात के आरोप गणतंत्र की नींव को चुनौती देते हैं। धर्म, जाति, भाषा और विचारधारा के आधार पर बढ़ता सामाजिक ध्रुवीकरण राष्ट्रीय एकता और भाईचारे को कमजोर करता है। नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं पर दबाव, राजनीति का अपराधीकरण, धनबल का बढ़ता प्रभाव, मीडिया और सोशल मीडिया की चुनौतियाँ-जैसे फेक न्यूज़, ट्रोल संस्कृति और प्रोपेगैंडा भी लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरे हैं। इसके साथ ही अमीर और गरीब के बीच बढ़ती खाई, सामाजिक न्याय की चुनौतियाँ और नागरिक कर्तव्यों-जैसे मतदान, कर भुगतान, पर्यावरण संरक्षण और संवैधानिक मर्यादा-के प्रति बढ़ती उदासीनता गणतंत्र को कमजोर करती है।आर्थिक दृष्टि से भी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार घरेलू बचत में कमी आई है, परिवारों की बचत घट रही है और कर्ज पर निर्भरता बढ़ी है, जो आर्थिक स्थिरता के लिए चिंता का विषय है। आवश्यकता इस बात की है कि आर्थिक असमानता कम की जाए और मध्यम वर्ग के लिए शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और सस्ता बनाया जाए।
राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक चुनौतियों की बात करें तो सीमा विवाद-विशेषकर चीन और पाकिस्तान के साथ-साइबर सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषय आज गणतंत्र के सामने बड़े और अहम मुद्दे हैं। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि आज गणतंत्र को सबसे अधिक आवश्यकता संविधान के अक्षरों को ही नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को समझने और जीने की है। सजग नागरिक, स्वतंत्र संस्थाएँ, नैतिक राजनीति और सहिष्णु समाज-इन्हीं के माध्यम से भारतीय गणतंत्र सुरक्षित रहेगा। तभी हम प्रगति और उन्नयन की दिशा में आगे बढ़ते हुए अपने भारत को वास्तव में 'सपनों का भारत' बना सकेंगे।
सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।