Etah News : पत्रकारों को बदनाम कर रहे हैं प्रशासन के मुंहलगे स्टिंगर

Etah News : पत्रकारों को बदनाम कर रहे हैं प्रशासन के मुंहलगे स्टिंगर

Jan 18, 2026 - 20:06
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Etah News : पत्रकारों को बदनाम कर रहे हैं प्रशासन के मुंहलगे स्टिंगर

पत्रकारों को बदनाम कर रहे हैं प्रशासन के मुंहलगे स्टिंगर

पत्रकारों का सम्मान करने में अग्रणी अधिकारी पीयूष मोर्डिया वरिष्ठ आईपीएस, प्राचार्या डॉ रजनी पटेल, विशाल सिंह आईएएस और अरविन्द मिश्र का नाम उल्लेखनीय है।

मदन गोपाल शर्मा 

एटा। जनपद में कुछ दिनों पूर्व राशन माफिया का एक वीडियो वायरल हुआ, कुछ स्टिंगरों ने राशन से भरे वाहन का स्टिंग आपरेशन किया तो, संरक्षण दे रहे दूसरे स्टिंगर को राशन माफिया ने फोन कर राशन को पकड़ने वालों के नाम बताए। संरक्षण दे रहे स्टिंगर ने पकड़ने वालों की कमजोरी बता दी। फलस्वरूप राशन माफिया स्टिंगरों को धमकाकर गाली गलौज करते हुए गाड़ी को भगा ले गया। पूरे जनपद में यह घटना चर्चा में रही कि राशन माफिया के राशन को पकड़ने वाले पत्रकार नहीं, स्टिंगर थे और राशन माफिया को संरक्षण देने वाले भी पत्रकार नहीं, स्टिंगर ही हैं जो पत्रकारिता का चोला ओढ़कर पत्रकारों को बहुत से तरीकों से बदनाम करने में लगे हुए हैं। प्रशासन के अधिकारी और राजनीतिक व्यक्ति इन्हें संरक्षण देकर पत्रकारों को बदनाम करने में सहयोग कर रहे हैं।

जनता भी पत्रकारों और स्टिंगरों का भेद नहीं समझ पा रही है। पत्रकार वह है जो अपने समाचार पत्र में भ्रष्टाचार, अनियमितताओं, प्रशासनिक कमियों का समाचार प्रकाशित कर उन व्यवस्थाओं में सुधार करने का प्रयास करता है उसका उद्देश्य धन उगाही का नहीं होता, क्योंकि समाचार प्रकाशित होने के बाद अनियमितता उजागर हो जाती है, जबकि स्टिंगरों का उद्देश्य सिर्फ मौके पर ही आदान-प्रदान कर मामले को रफा-दफा करना होता है। इस प्रकार पत्रकार और स्टिंगर दोनों का कार्य और उद्देश्य भिन्न होता है। पत्रकार जनहित को निजी स्वार्थ से ऊपर रखते हुए घटना को उजागर करता है वहीं स्टिंगर समाज विरोधी कार्यों को समाप्त करने के लिए नहीं बल्कि उनसे धन प्राप्त करने के बाद घटना को ही जमींदोज करने का काम करते हैं ताकि समाज विरोधी कार्य में उनकी संलिप्तता उजागर न हो सके। कुछ अधिकारियों के द्वारा विगत कई वर्षों से यह परम्परा डाल दी गई है कि जब भी प्रशासन कोई कार्यक्रम कराता है तो उसमें पत्रकारों को कार्यक्रम के समाचार संकलन के लिए आमंत्रित नहीं करता, समाचार प्रकाशित कराने के लिए मनचाहा प्रेस नोट बना कर सूचना विभाग को भेज दिया जाता है जिसे अक्सर सभी समाचार पत्रों के प्रतिनिधि प्रशासन के सहयोग की भावना से अपने अपने समाचार पत्रों में प्रकाशित कर देते हैं।

समाचार प्रेषण से लेकर समाचार प्रकाशन तक में पत्रकारों को इसलिए उपेक्षित किया जाता है कि पत्रकार आयेंगे तो कार्यक्रम के हर पहलू को देख कर समाचार प्रकाशित करेंगे। पत्रकारों को आमंत्रित किया जाएगा तो उनके मुताबिक सम्मान जनक व्यवस्था और व्यवहार भी करना पड़ेगा। इन सब समस्याओं से बचने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों ने स्टिंगरों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है जिसका प्रशासन को यह फायदा है कि बिना बुलाए आ जाते हैं, उनके अधिकारी बाइट के नाम पर जो कहते हैं वह फेसबुक और वॉट्स अप ग्रुपों पर चल जाता है, जिससे लगता है कि उनका व्यापक प्रचार प्रसार हो गया है जबकि हकीकत यह है कि प्रशासन का कोई भी समाचार किसी न्यूज चैनल पर नहीं चलता। प्रशासनिक समाचारों के प्रकाशन की कमी को पूरा, एटा जनपद में सिर्फ वह पत्रकार ही करते हैं जो समाचार पत्रों के प्रतिनिधि हैं। फिर भी जनपद की पत्रकारिता दिनों दिन मृतप्राय होती जा रही है।

जनपद में भारत सरकार और प्रदेश सरकार की कठिन नियमावली का पालन कर समाचार पत्रों का प्रकाशन करने वाले प्रकाशक, सम्पादक, मान्यता प्राप्त और सक्रिय पत्रकार स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। सरकार की नियमावली का पालन करने वाले पत्रकार प्रशासनिक कार्यक्रमों में बगैर आमंत्रित किए जाने से परहेज करते हैं। वहीं स्टिंगरों के रूप में पत्रकारों की भूमिका निर्वाह कर रही भीड़, प्रशासनिक कार्यक्रमों में बिना बुलाए पत्रकारों की कमी को पूरा कर रही है। जनपद में किसी भी चैनल द्वारा इन स्टिंगरों की विधिवत नियुक्ति नहीं है फिर भी नामी गिरामी चैनलों के लेटर पैड पर बना हुआ नियुक्ति पत्र जिला सूचना अधिकारी के कार्यालय में जमा करा दिया जाता है। बहुत से चैनल तो बंद भी हो चुके हैं फिर भी उन्हीं चैनलों की माइक आईडी लिए कुछ स्टिंगर घूम रहे हैं। इन स्टिंगरों के कामों पर नजर डाली जाए तो जनपद में जुआ, शराब, सट्टा, अवैध वसूली, कमजोर और गरीबों की जमीन और दुकानों पर कब्जा और प्लाटिंग, माफियाओं से महीनेदारी, स्तरहीन प्राईवेट अस्पतालों का संचालन करने वालों को संरक्षण देने के अतिरिक्त, बिस्तर पर चैन की नींद सो रहे अधिकारियों को जगाने से लेकर बिस्तर बिछा कर सुलाने की जिम्मेदारी स्टिंगर ही बखूबी निर्वहन कर रहे हैं।

स्टिंगरों के लिए न कोई नियम है, न कोई कायदा। 100-200 रूपए की माइक आईडी बनाकर पत्रकार बन जाते हैं और पत्रकारिता का जनाजा निकालना शुरू कर देते हैं। अधिकांश स्टिंगर अधिकारियों के साथ सेल्फी और कार्यक्रमों में फोटो खींच कर धन के बदले जनता के काम कराने का ठेका ले रहे हैं। यह नहीं बताया जा सकता कि उन अधिकारियों तक कितना हिस्सा पहुंच रहा है। कुछ सांसद और विधायकों की चाटुकारिता कर अवैध कारोबार चला रहे हैं। इस सबके लिए किसी शैक्षिक योग्यता की बाध्यता नहीं है जिसका लाभ उठाकर कक्षा 8 से लेकर अनपढ़ तक स्टिंगर बनकर जनता और अधिकारियों में पत्रकार कहलाने लगे हैं। कुछ दिनों पूर्व जिनकी औकात सिर्फ साईकिल लायक थी आज वे महंगी कारें और बड़ी कोठियों के मालिक बन गये हैं। जुआ, शराब, सट्टा आदि समाज विरोधी कार्य करने वाले लोगों को अराजक तत्व कहा जाता है, वही लोग स्टिंगर के रूप में माइक आईडी लेकर जनपद के उच्च पदस्थ अधिकारियों के सामने घंटों बैठकर आम आदमी को यह दिखाने में सफल हो जाते हैं कि फलां पत्रकार अधिकारी के बहुत नजदीक है फिर उसकी दूसरी दुकान चलने लगती है। कुछ वर्ष पूर्व तक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी पत्रकारों और सम्पादकों से मिलने के लिए लालायित रहते थे क्योंकि उन्हें सही मायने में पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों से ही उनके कार्य क्षेत्र की उचित जानकारी मिलती थी।

ऐसे अधिकारी ईमानदार पत्रकारों को बहुत सम्मान देते थे। आज भी गिने चुने अधिकारी हैं जो समाचार पत्रों के पत्रकारों और सम्पादकों का सम्मान करने में कोताही नहीं बरतते और उन्हें सम्मानित व्यक्तियों का सम्मान करने में अपने वरिष्ठ आईएएस और आईपीएस अधिकारी होने का अभिमान आड़े नहीं आता। यूं तो मेरी पत्रकारिता के लम्बे कार्यकाल में बहुत से अधिकारियों से सम्पर्क हुआ, यहां सभी के नाम का उल्लेख किया जाना सम्भव नहीं है। गत तीन चार वर्ष पूर्व से जिन अधिकारियों की कार्यशैली और पत्रकारों का सम्मान करने के तरीके ने मुझे प्रभावित किया है उनमें, सर्वप्रथम नाम अलीगढ़ में डीआईजी के पद पर तैनात रहे श्री पीयूष मोर्डिया जी का नाम लेना उचित समझता हूं, जिन्होंने अपने कार्यालय में मुलाकात के बाद अपनी कुर्सी से उठकर गेट तक पत्रकारों को छोड़ने का सम्मान प्रदान किया। श्री मोर्डिया जी द्वारा सम्मान दिए जाने के तरीके ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह कितने संस्कारशील और धैर्यवान अधिकारी हैं जिन्होंने पुलिस विभाग की कमियों को बताने वाले पत्रकारों को भी उचित सम्मान से भी अधिक सम्मान दिया जिसको बयां करने में, मैं अपने शब्दों को बहुत तुच्छ समझ रहा हूं। दूसरा नाम वीरांगना अवंतीबाई लोधी स्वशासी चिकित्सा महाविद्यालय एटा के प्राचार्य पद पर कार्यरत रहीं डॉ रजनी पटेल का है जिनके द्वारा मेरे प्रति किए गए व्यवहार और सम्मान से मैं स्वयं को ऋणी समझता हूं।

वर्तमान में सूचना निदेशक के पद पर तैनात आईएएस अधिकारी विशाल सिंह का सम्मान जनक व्यवहार भी उल्लेखनीय है जिन्होंने अपना पदभार ग्रहण करने के कुछ दिन बाद अपने सामने खड़े होकर मांग पत्र देने वाले प्रकाशकों और सम्पादकों के सम्बन्ध में अपने अधीनस्थों को निर्देशित किया। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था कीजिए जिससे इन कलम के सिपाहियों को मेरे सामने खड़ा न होना पड़े। उन्होंने सभी प्रकाशकों और सम्पादकों को आश्वस्त किया कि हम ऐसी व्यवस्था कर रहे हैं कि आपको विज्ञापन अपने जनपद में ही मिले, विज्ञापन के लिए लखनऊ तक न आना पड़े। उन्होंने सच में ऐसी ही व्यवस्था के लिए सभी जनपदों के जिलाधिकारी और मंडलों के आयुक्तों को पत्र प्रेषित किया है किंतु वह पत्र जिलाधिकारी ने जिला सूचना अधिकारी को प्रेषित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। उस पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं हुई। सूचना निदेशालय में ही अपर निदेशक के पद पर तैनात श्री अरविन्द मिश्र जी को सद्व्यवहार की प्रतिमूर्ति कहा जा सकता है। वह सभी प्रकाशकों और सम्पादकों को सहज भाव से संतुष्ट कर रहे हैं। उच्च पदस्थ अधिकारियों के द्वारा सभी मनीषियों का सम्मान उनके कार्य क्षेत्र और उनकी उपयोगिता को देख कर करना चाहिए। अपने पद की वरिष्ठता को देखते हुए जनपद की योग्य विभूतियों को उपेक्षित करना उचित नहीं लगता। सामर्थ्यवान के द्वारा अपने से कमजोर का सम्मान करना, सामर्थ्यवान की यश कीर्ति में वृद्धि कर सकता है। वरना हर बलवान तो, सज्जन पुरूषों को अपमानित करने में आत्ममुग्ध होता ही है।