संसदीय भाषा से महरूम होती राजनीति
संसदीय भाषा से महरूम होती राजनीति
मनुष्य एक सामाजिक ही नहीं बल्कि एक राजनीतिक प्राणी भी है। केवल राजनीतिक प्राणी ही नहीं अपितु एक आध्यात्मिक प्राणी भी है। राजनीतिक क्षेत्र में संसदीय भाषा का प्रयोग अपरिहार्य है,वरना प्रजातंत्र का स्वरूप ही बदल जाएगा। संसद में पक्ष और प्रतिपक्ष दो ही होते हैं किंतु प्रतिपक्ष को विरोधी कहना सर्वथा अनुचित है। यदि प्रतिपक्ष किसी बात से असहमत है तो उसको गद्दार कहना नैतिकता की गिरावट ही कहा जाएगा। ऐसा कहने से तो देश का एक बहुत बड़ा वर्ग गद्दार की श्रेणी में आ जाएगा। प्रतिशोध की राजनीति प्रजातंत्र को एक विद्रूप रूप प्रदान करती है जो आज पूरे देश में चल रही है।
सी बीआई या ईडी के नाम पर जिस तरह से प्रतिपक्ष को दबाया जा रहा है वह स्वस्थ राजनीति के लिए सर्वथा अनुचित है। किसी विशिष्ट वर्ग को जाति या मजहब के नाम पर टारगेट करना स्वस्थ प्रजातंत्र का प्रतीक नहीं है। दल बनेंगे और बिगड़ेंगे किन्तु स्वस्थ प्रजातंत्र रहना चाहिए। भारतवर्ष विविध संस्कृतियों का देश है किंतु पूरा भारतवर्ष एक सूत्र में अनुबंधित है। नफरत की लाठी टूटनी चाहिए, लालच का खंजर का परित्याग करना चाहिए और पूरे भारत को प्रेम के सूत्र में अनुबंधित होना चाहिए, अन्यथा की स्थिति में प्रतिशोध के बाद प्रतिशोध चलता रहेगा और भारत की सुंदर तस्वीर विकृत रूप में बदल जाएगी। 'ठोंको,' 'मारो','पीटो ' टकला' 'पप्पू ' 'बन्दर ' ' कठमुल्ले ' तथा ' 'विधवा 'जैसे शब्दों का प्रयोग स्वस्थ प्रजातंत्र में कदापि शोभा नहीं देता है। भारतवर्ष की पावन भूमि पर एक ओर मंदिर तो दूसरी ओर मस्जिद है, एक ओर गिरजाघर तो दूसरी तरफ गुरुद्वारा है यह दृश्य विश्व की धरती पर अतुलनीय है। लगभग 10000 वर्षों से जिन जातियों और जन जातियों का दमन हुआ है उनको आरक्षण के माध्यम से लगभग 500 वर्ष का समय अपने उन्नयन एवं उत्थान के लिए मिलना ही चाहिए। जब ईडब्ल्यूएस आरक्षण लागू हुआ तो भारतवर्ष के किसी कोने में किसी प्रकार की हिंसा एवं रक्तपात नहीं हुआ,किन्तु मुझे याद है कि जब पिछड़ों, दलितों को आरक्षण देने की बात आई तो भारत की सड़कों पर एक व्यापक आंदोलन, आगजनी एवं रक्तपात हुआ था। आखिर क्यों? जिसका जो हक है उसको हर हालत में मिलना ही चाहिए। आज 'हम दो,हमारे दो ' तक ही भारतवर्ष का सामाजिक,आर्थिक एवं राजनीतिक ताना-बाना सीमित रह गया है।
आज जो हमारे साथ है वह पवित्र है और जो हमारे साथ नहीं है वह भ्रष्ट है इस तरह की विचारधारा से भारत वर्ष कमजोर पर कमजोर होता जा रहा है। जिस प्रकार बसंत प्रकृति का श्रृंगार करती है, उसी प्रकार संत लोग संस्कृति का श्रृंगार करते हैं,किंतु आज संत लोग भी राजनीति में बढ़कर हिस्सा ले रहे हैं और कभी-कभी इतने जहरीले स्टेटमेंट देते हैं जिससे भारत माता का वक्ष रक्तरंजित हो जाता है। विरोध केवल विरोध के लिए नहीं,अपितु विकास के लिए होना चाहिए।आज देश एकाधिकार एवं निरंकुशता की तरफ बढ़ता जा रहा है। भारतवर्ष की अधिकांश शक्तियां चुनिंदा हाथों की कठपुतली सी बनती जा रही हैं। न्याय की मूर्ति को ही इस अशुद्ध वातावरण को शुद्ध करने के लिए आगे आना होगा। शांति का मार्ग ही प्रगति एवं उन्नति की तरफ जाता है और युद्ध का मार्ग सीधा शमशान। पत्रकार बंधुओ के लिए भी देश की एकता एवं अखंडता के लिए निष्पक्ष लेखन करना होगा। भारत की तकदीर का निर्माण करने वाले शिक्षकों को आज महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करना होगा। एक विशेष समुदाय के अंदर भय, त्रास एवं आतंक का जो माहौल है उससे भारत कमजोर होता जा रहा है और बाहरी शक्तियां इसी पल इंतजार कर रही हैं। आज मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, लोकसभा स्पीकर, राज्य सभा स्पीकर और देश के मुख्य न्यायाधीश और प्रतिपक्ष के वरिष्ठ नेताओं के प्रति कुछ सिरफिरे लोग बेहूदी भाषा का प्रयोग करने में पीछे नहीं रहते हैं, जो सर्वथा अनुचित, अशोभनीय, अमर्यादित, निंदनीय एवं आलोचनीय है।
आज हम सब प्रण लें कि ऐसे नादान लोगों के कारण भारतवर्ष की एकता एवं अखंडता को खंड-खंड होने के लिए नहीं छोड़ सकते हैं। उनका उनकी ही भाषा में नहीं, किन्तु संसदीय भाषा में मुखर विरोध होना चाहिए। 'वसुधैव कुटुंबकम ' एवं 'सर्वे भवंतु सुखिना सर्वे संतु निरामया' जैसे मूल्यों को मानने वाले यदि प्रतिशोध की राजनीति करेंगे तो उनके उपर्युक्त उद्घोष आत्मप्रवंचना के अतिरिक्त और कुछ नहीं। लेखक प्रोफेसर सनिल कुमार पूर्व अध्यक्ष उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड