जीवन पद्धति के लिये सकारात्मक ऊर्जा स्त्रोत : अनूप चन्द्र श्रीवास्तव

आगरा। ऊर्जा स्त्रोत और कर्त्तव्य बोध करवाती है 'श्रीमद भगवत गीता'। अमृता विद्या- एजुकेशन फॉर इम्मोर्टालिटी और छांव फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में "जीवन में गीता की भूमिका ("Role of Gita in Life" )" चर्चा का आयोजन फतेहाबाद रोड स्थित ‘शीरोज हैंग आऊट’ में किया गया। चर्चा के दौरान अतिथि वक्ता के रूप में आये एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के महाप्रबंधक (इंजीनियरिंग), एएआई श्री अनूप चंद्र श्रीवास्तव ने ‘श्रीमद भगवत गीता’ को केवल एक धार्मिक या अध्यात्मिक ग्रंथ के रूप में न लेकर जीवन को एक सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर कर्त्तव्य बोध करवाने वाला ग्रंथ बताया।
उन्होंने कहा कि ‘ श्रीमद भगवत गीता ‘भारतीय संस्कृति का अभिन्न भाग ही नहीं मानव मात्र को कर्त्तव्य करने करते रहने को प्रेरित करने वाला दर्शन है।भारत में युग क्रम के अनुसार सतयुग,त्रेता ,द्वापर और कलयुग आदि चार भागों में विभक्त किया जाता है।महाभारत द्वापर युग की घटना है,महाभारत के दौरान कर्तव्य पथ से विमुख होते अर्जुन को कर्तव्य बोध कराने को युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र में महाभारत शुरू होने से पूर्व दिये गये उपदेश हैं। उन्होंने कहा कि ‘श्रीमद भगवत गीता’ के रूप में प्रचारित ये उपदेश योगीराज श्री कृष्ण ने सारथी के रूप में अर्जुन को दिये थे। महाभारत के भीष्म पर्व के 25 वें अध्याय में ये वर्णित हैं। कृष्ण-द्वैपायन व्यास ,जो स्वयं महाभारत की कथा का हिस्सा रहे थे, इसके लेखक हैं जिन्होंने ,कथाओं के अनुसार, गणेश भगवान को सभी श्लोक बोले और उन्होंने उनको लिखा। 1,00,000 श्लोकों के साथ यह अभी तक लिखी गई सबसे बड़ी कथा है।
श्रीमद भागवत गीता मौजूदा दौर में और भी अधिक प्रासंगिक हो गई है,विषमताओं से भरपूर नित नई चुनौतियां जनजीवन की दिनचर्या का भाग हैं।पलायन वर्तमान में भी एक विकल्प के रूप में मौजूद है,किंतु देश,समाज और पारिवारिक दायित्वों का सकारात्मक निर्वाहन समाज प्रति श्रेष्ठ भूमिका है और ‘श्रीमद भागवत गीता’ इसके लिये श्रेष्ठतम मार्गदर्शी है। हर्ष और आनंद की बात है कि व्यक्तिगत जीवन में गीता के दर्शन पर अटूट विश्वास करने वाले महाप्रबंधक (इंजीनियरिंग), एएआई श्री अनूप चन्द्र श्रीवास्तव हमारे बीच में हैं और एयरपोर्ट अथॉरिटी के एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट के लिये कार्यरत हैं।अपनी तमाम आधिकारिक व्यस्तओं के बावजूद ‘गीता पर्चाय ‘अभियान के लिये समय निकाल लेते हैं।श्री श्रीवास्तव ने पूछने पर एक जानकारी में बताया कि एक गीता में उनकी अटूट आस्था है,इसे केवल अध्यात्म या धर्म से ही न जोड कर जीवन दर्शन मानते हैं। सामान्यत:रविवार या अवकाश दिनांक पर ही ‘गीता पर्याय ‘ अभियान के तहत सत्संग और संगोष्ठी करते हैं।2018 से इस कार्य में जुटे हैं। बीई (सिविल), एमई (एनवीआई), एमबीए (एचआर) जैसी उच्च तकनीकी शिक्षा से शिक्षित श्री श्रीवास्तव के जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अभिन्न है,तर्क और जिज्ञासाओं स्वाभाविक मानव वृत्ति मानकर सहजता से लेते हैं।
सहिष्णुता और सहअस्तित्व की अवधारणा में विश्वासी श्री श्रीवास्तव का मानना है,गीता की शिक्षाओं हर किसी के लिये बेहद महत्वपूर्ण हैं,बस उन्हें सही संदर्भ में समझने की जरूरत है। वह बताते हैं कि ‘गीता’ एक ऐसी पुस्तक है जो उन प्रबंधन, प्रथाओं के परिप्रेक्ष्य में अंतर्दृष्टि प्रदान करती है जिसका अनुसरण सफल व्यवसायियों, व्यावसायिक अधिकारियों और यहां तक कि आम नागरिकों द्वारा भी किया जाता है। उनका मानना है कि हमारे ऋषि, कवियों, विचारकों ने गीता की शिक्षाओं को किसी न किसी रूप में छुआ है। यही कारण है कि भारत में और भारत के बाहर कई प्रबंधन स्कूलों में, गीता पाठ्यक्रम सामग्री के रूप में शामिल है। कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण के दिये गये उपदेश सामायिक नहीं सर्वकालीन प्रेरक हैं, वह कहते हैं कि जब भी गीता की शिक्षाओं बारे में चर्चा करते हैं तो उन्हें हमेशा लगता है कि जनसाधारण का अचेतन रूप से आस्तिक है और अध्यात्म में उसकी प्रवृत्ति है।गीता अहंकार को दमित करती है यह दैनिक जीवन में कितना महत्वपूर्ण है।
जब व्यक्ति का अहंकार को नियंत्रित हो जाता है तो जीव में स्वत: ही खुशहाली आने लगती है। पूर्व में श्री अनूप चन्द्र श्रीवास्तव प्रतिभागियों द्वारा उठाए गए सवालों के जवाब दिए गए हैं। सिविल सोसायटी के जर्नरल सैकेट्री अनिल शर्मा और छांव फाऊंडेशन के आशीष शुक्ला ने उम्मीद जताई कि श्री श्रीवास्तव का अभियान अपने आप में एक आदर्श है,इसके लक्ष्य और सकारात्मक पक्ष को दृष्टिगत उम्मीद है कि कर्तव्य निर्वहन के प्रति अगर लोग जागरूक हो गये तो निश्चित रूप में अपने आप मे यह एक बडी राष्ट्र सेवा होगी। ★ श्रीमद भगवत गीता _ श्रीमद भगवत गीता भारतीय महाकाव्य महाभारत से संस्कृत श्लोकों का एक संग्रह है। श्रीमद भगवत गीता महाभारत के भीष्म पर्व के 25 वें अध्याय से शुरू होती है। भगवत गीता में कृष्ण और अर्जुन के बीच की बातचीत को चित्रित किया गया है। इसमें योद्धा अर्जुन जब अपने रिश्तेदारों को उसके सामने लड़ने के लिए तैयार देखता है तो वह कुटुम्ब मोह के कारण घबरा जाता है। उसने लड़ाई लड़ने का विचार छोड़ दिया और अपने मित्र और सारथी कृष्ण को आत्मसमर्पण कर दिया कि वह क्या करे। तब कृष्ण ने उन्हें खड़े होने और लड़ने के लिए निर्देशित किया और उन्हें एक बहुत ही गुप्त प्रवचन दिया जो बहुत गहन है। पूरे प्रवचन को श्रीमद भगवत गीता के रूप में जाना जाता है।
इस प्रवचन में कृष्ण ने अर्जुन को तीन योगों (विधियों) के बारे में बताया जो कि है 1. कर्मयोग 2. ज्ञानयोग 3. भक्तियोग। ये तीन विधियां निर्वाण के मार्ग हैं। यदि कोई इनमें से किसी एक विधि का अभ्यास करता है, तो वह भौतिक संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है, जो प्रकृति में नश्वर है और सर्वोच्च इकाई से जुड़ता है, जो अमर है और हर जगह मौजूद है। श्रीमद भगवत गीता में 18 अध्याय हैं जिनमें 700 श्लोक हैं। आज के कार्यक्रम में- नवाबउद्दीन, एम यू कुरैशी, सईद शाहीन हाश्मी, अमल शर्मा, डी के तायल, फरमान ,दीप्ति भार्गव, ज्योति खंडेलवाल,विधु दत्ता , कांति नेगी, ज्योति अग्रवाल, ब्रिग विनोद दत्ता, शिवदयाल शर्मा, दीपक प्रहलाद अग्रवाल, एस रमन, राजीव सक्सेना, अनुपम चतुर्वेदी, चंदना तिवारी, संगीता, रोमी चौहान, जैस्मिन कौर, डॉ महेश धाकड़, डॉ विजय शर्मा, आदि उपस्थित रहे. अमृता विद्या- एजुकेशन फॉर इम्मोर्टालिटी के सचिव अनिल शर्मा ने कार्यक्रम का संचालन किया और छाँव फाउंडेशन के राम भरत उपाध्याय ने धन्यवाद दिया।