खुली किताब

Aug 21, 2025 - 08:37
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खुली किताब

खुली किताब

हम जिस बात की चिंता करते देखे-सुने जाते हैं क्या वे हमारी वास्तविक चिंताएं हैं? यह सवाल इसलिए कि अगर ये चिंताएं वास्तविक होतीं तो हम उस चिंता की जड़ को सामने देख कर उसके पेड़ बन जाने व उसके फलने-फूलने का इंतजार नहीं करते। इन दिनों हर कोई कृत्रिम मेधा यानी 'एआइ' की चिंता करता दिख जाएगा। इसी समय हमारे बीच फैसला आता है कि देश का शीर्ष शिक्षा बोर्ड अब दसवीं की परीक्षा 'खुली किताब' से लेगा। इसके पहले भी शिक्षा को लेकर बहुत तरह के फैसले हुए हैं जिसे लेकर आम लोगों के बीच न्यूनतम बहस हुई है। शिक्षा वैसे भी आम लोगों से जुड़ा मुद्दा है लेकिन इससे जुड़ी बहसें खास अकादमिक तबके तक ही सिमट जाती हैं। ताजा फैसला नई शिक्षा नीति का हिस्सा है।

पर इस शिक्षा नीति की समग्रता पर ही कितनी बात हुई है ? अब हमारी शिक्षा नीति का पूरा लक्ष्य गुणवत्ता से ज्यादा संख्या पर है। आम भाषा में कहें तो इसका मतलब है शिक्षितों का आंकड़ा बढ़ाना। हम दुनिया को बता सकें कि हमारे यहां किसी तरह की अशिक्षा नहीं है। किसी भी देश की शिक्षा नीति वहां के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हालात का आईना होती है । फिलहाल ज्यादा से ज्यादा बच्चों को किसी तरह 'पास' कर देने की नीति समाज में किसी तरह का ढांचागत बदलाव नहीं ला सकते हैं । अभी तो यह हाल हो गया है कि अगर बच्चा फेल करने के लिए बहुत मेहनत करेगा तभी वह फेल हो सकता है। वरना अब शिक्षकों के हाथ में बहुत सारी शैक्षणिक तकनीक है। आंतरिक मूल्यांकन भी इसी संतुलन बिठाने की तकनीक बन चुका है, जिसमें कभी पूरे के पूरे अंक दे दिए जा सकते हैं। अब बात है खुली किताब से परीक्षा देने की। किताब ने क्या सीख दी, यह जानने के लिए किताब को बंद करना होगा। किताब बंद करने के बाद ही हमारा दिमाग सोचेगा कि किताब में क्या, क्यों, कैसा और कितना था। बात तोता रटंत विद्या की नहीं, बात विषयवस्तु को आत्मसात करने की है। किताब में चीजें इसलिए पढ़ाई जाती हैं ताकि किताब बंद होने पर आप उन चीजों का मंथन कर सकें। हिंदी की किताब में 'हवा हूं, हवा मैं बसंती हवा हूं' पढ़ने के बाद कोई बच्चा क्या चल रही बसंती हवा के बारे में सोचेगा ? क्या वह अन्य मौसमों की हवा और बसंती हवा के बीच में सच फर्क करेगा? वह यह सब तभी करेगा जब उसे कोई ऐसा मिले जो उसे उस कविता को जीवन की गतिविधि की तरह पढ़ाए। स्कूल से निकल कर, बाहर की हवा में पहुंच कर वह बसंती हवा की खुराक ले सके। बड़ी जनसंख्या और आर्थिक विषमताओं वाले हमारे देश में शिक्षा और स्कूलों के अंकों का अंतर अनुशासनात्मक संबंध है। स्कूल के अंक मतलब नौकरी। अब अगर परीक्षा के अंकों के लिए किताबें पढ़ने व समझने की जरूरत नहीं रहे तो फिर कितने बच्चों को उनके माता-पिता सिर्फ ज्ञान अर्जित करने के लिए किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित कर पाएंगे ? कितने अभिभावक यह सोच पाएंगे कि सिर्फ परीक्षा में अंकों के लिए ही किताबें पढ़नी जरूरी नहीं हैं?

एक बेहतर नागरिक बनने के लिए हमें किताबें पढ़नी चाहिए और उसमें लिखी चीजें हमारे स्मरण में रहनी चाहिए। स्कूल का काम सिर्फ परीक्षाएं लेना नहीं, बल्कि सिखाना है। किताबों का काम सिर्फ परीक्षाएं पास करवाना नहीं बल्कि मानवीय मूल्यों की शिक्षा देना है। पढ़े गए का मूल्यांकन ही परीक्षा है। क्या हम उस पीढ़ी तक पहुंच गए हैं जो किताबों के पन्ने खुले होने के बावजूद सही उत्तर तक नहीं पहुंच पाएगी ? खुली किताब पर एक खुली बहस तो हो जानी चाहिए। विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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