स्क्रीन से परे: हमारे सोशल मीडिया जीवन की छिपी सच्चाइयाँ

Dec 17, 2024 - 08:01
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स्क्रीन से परे: हमारे सोशल मीडिया जीवन की छिपी सच्चाइयाँ

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स्क्रीन से परे: हमारे सोशल मीडिया जीवन की छिपी सच्चाइयाँ

विजय गर्ग

सोशल मीडिया जीवन को अधिक जुड़ा हुआ और दिलचस्प बनाने का एक उपकरण है, यह परिवार और दोस्तों की योग्यता और सफलता को आंकने का पैमाना नहीं है जब से सोशल मीडिया हमारे जीवन में घुसा है, हमने इसे अपने जीवन से जुड़ी चीज़ों को प्रदर्शित करने की जगह बना लिया है। हम अपनी डिजिटल दीवारों को मील के पत्थर, यादों, मुस्कुराहट और दुखों से रंगते हैं। यह जीवन के विविध रंगों का एक जीवंत कोलाज है, फिर भी हम जो पोस्ट करते हैं वह अक्सर वास्तविकता का एक क्यूरेटेड संस्करण होता है। मुस्कुराहट उज्ज्वल है, प्यार गहरा है, छुट्टियाँ अधिक भव्य हैं, और दिल टूटना अधिक नाटकीय है।

लेकिन फ़िल्टर की गई पूर्णता के इस लिबास के पीछे, कच्चा और अनफ़िल्टर्ड सच अक्सर दुनिया की नज़रों से छिपा हुआ चुपचाप छिपा रहता है। एक महीने के लिए, मैंने अपनी छुट्टियों की तस्वीरें पोस्ट कीं - प्राचीन परिदृश्य, खुशनुमा भोजन और स्टाइलिश गेटअप - जिससे यह आभास हुआ कि मैं पृथ्वी पर सबसे खुश और भाग्यशाली व्यक्ति था। बाहर से ऐसा लग रहा था जैसे जीवन आनंद और संतुष्टि का एक सहज चित्रपट है। लेकिन हर पोस्ट के पीछे एक व्यक्तिगत लड़ाई चुपचाप लड़ी जा रही थी। जबकि मेरी टाइमलाइन बेलगाम खुशी बिखेर रही थी, मैं एक कठिन स्वास्थ्य चुनौती का समाधान करने के लिए खुद पर काम कर रहा था। जब मेरी वास्तविकता उथल-पुथल भरी थी तो मैंने ख़ुशहाल तस्वीरें पोस्ट करना क्यों चुना? क्या मैं नाटक कर रहा था? क्या मैं सत्यापन चाह रहा था? नहीं, मैं खुद को आश्वस्त करने की कोशिश कर रहा था। मैं अपने आप को याद दिला रहा था कि खुशी मौजूद है, सुंदरता और खुशी के क्षण अभी भी मेरे जीवन में विराम लगाते हैं। वे पोस्ट छल नहीं थे; वे जीवनरेखा थे। ख़ुशी की झलकियाँ जिनसे मैं जुड़ा रहा जब मैंने अपने भीतर के तूफ़ान को पार किया। और उन पलों को साझा करते हुए, मैं उन लोगों तक आशा की किरणें पहुंचाने की भी उम्मीद कर रहा था जो अनदेखी लड़ाइयां लड़ रहे होंगे। ये सोशल मीडिया का दोहरापन है. हम जो हँसी देखते हैं वह भेष में आँसू हो सकती है। भव्य समारोह चिंता में डूबा हो सकता है।

सार्वजनिक रूप से बहाए गए आँसू प्रभाव के लिए गढ़े जा सकते हैं। जो प्रामाणिक प्रतीत होता है वह कृत्रिम हो सकता है; जो चीज़ लापरवाह दिखती है उस पर बोझ की परत चढ़ सकती है। यही कारण है कि हमें दूसरों को उनके प्रोफाइल पर जो दिखता है उसके आधार पर उनका मूल्यांकन नहीं करना चाहिए। लोग अपने संघर्षों को छिपाकर ख़ुशहाल तस्वीरें क्यों पेश करते हैं? यह जरूरी नहीं कि यह धोखा हो या दूसरों को गुमराह करने की इच्छा हो। कभी-कभी, यह आशा को जीवित रखने का एक तरीका है। जब जीवन की चुनौतियाँ भारी पड़ जाती हैं, तो ख़ुशी का अनुमान लगाना एक स्व-पूर्ण भविष्यवाणी की तरह महसूस हो सकता है। खुशी साझा करके, भले ही वह पहुंच से बाहर हो, हम उसे प्रकट करने का प्रयास करते हैं। हम अपने आप से कहते हैं कि खुशी कोई भ्रम नहीं है - यह निकट है और हमारी मुट्ठी में है। हम इसे दूसरों के लिए भी करते हैं. सोशल मीडिया नकारात्मकता, तुलना और परेशान करने वाली खबरों से भरी एक अंधेरी और जबरदस्त जगह हो सकती है। सौंदर्य, प्रेम और हास्य के क्षणों को साझा करके, हम उन लोगों को सकारात्मकता की छोटी खुराक प्रदान करते हैं जिन्हें इसकी आवश्यकता हो सकती है।

लेकिन यहीं जाल है. जब हम दूसरों के जीवन को सोशल मीडिया के चमकदार चश्मे से देखते हैं, तो हम तुलना के गड्ढे में गिरने का जोखिम उठाते हैं। हम अपने स्वयं के जीवन को दूसरों के प्रतीत होने वाले आदर्श जीवन के मुकाबले मापते हैं और आश्चर्य करते हैं कि हम कहाँ गलत हो गए। हम ईर्ष्यालु, द्वेषपूर्ण या अपर्याप्त महसूस करते हैं। लेकिन यह तुलना अनुचित है—क्योंकि यह अधूरी जानकारी पर आधारित है। आप सोशल मीडिया पर जो देखते हैं वह एक हाइलाइट रील है, कोई डॉक्यूमेंट्री नहीं। अपनी पर्दे के पीछे की वास्तविकता की तुलना किसी और की सावधानी से चुनी गई हाइलाइट्स से करना अपने आप को अनावश्यक पीड़ा के लिए तैयार करना है। तो, हमें सोशल मीडिया पर स्पष्टता और दयालुता के साथ कैसे संपर्क करना चाहिए? सबसे पहले, बिना ईर्ष्या के दूसरों की ख़ुशी में हिस्सा लें। उनकी खुशियाँ मनाएँ जैसे आप चाहते हैं कि वे आपकी खुशियाँ मनाएँ। उनकी ख़ुशी को एक अनुस्मारक बनने देंअच्छी चीजें संभव हैं, भले ही वे अभी तक आपके जीवन में नहीं आई हों। दूसरा, कठिन समय में बिना निर्णय किए सहायता प्रदान करें। यदि कोई अपना संघर्ष साझा करता है, तो उसे कमज़ोर करने या ख़ारिज करने की इच्छा का विरोध करें। उनके शब्दों के पीछे उनके द्वारा व्यक्त किये गए दर्द से कहीं अधिक गहरा दर्द हो सकता है।

सहानुभूति प्रदान करें, धारणाएँ नहीं। स्थिर उपस्थिति बनें जो उन्हें याद दिलाए कि वे अकेले नहीं हैं। अंत में, सोशल मीडिया को ही लें - यह जीवन को अधिक जुड़ा हुआ, अधिक रोचक और कभी-कभी अधिक मज़ेदार बनाने का एक उपकरण है। यह मूल्य, सफलता या खुशी का पैमाना नहीं है।

■ मैथ प्रॉब्लम को सॉल्व करेगा इंटेलिजेंट बैक्टीरिया !

विजय गर्ग

कोलकाता के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे इंटेलिजेंट बैक्टीरिया को तैयार किया है, जो गणित की समस्याओं को सॉल्व कर सकता है। आइए इसके बारे में जानते हैं। कोलकाता के साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स में कम करने वाले सिंथेटिक बायोलॉजिस्ट संग्राम बाग ने एक बड़ी सफलता पा ली है। उन्होंने एक इंटेलिजेंट बैक्टीरिया बनाया है। ये बैक्टीरिया किसी नंबर में प्राइम नंबर की पहचान कर सकता है। साथ ही अल्फाबेट्स में वॉवल की पहचान कर सकता है। ये भारत के लिए बड़ी सफलता है। आइए इस बैक्टीरिया के बारे में जानते हैं। कंप्यूटिंग करने वाले बैक्टीरिया साहा इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर फिजिक्स में काम करने वाले संग्राम बाग ने लैब में ऐसे बैक्टीरिया को तैयार किया है, जो यह तय कर सकता है कि दी गई कोई संख्या प्राइम नंबर है या कोई अल्फाबेट स्वर है। संग्राम ने बताया कि पहले ये केवल 'मनुष्यों या कंप्यूटरों द्वारा किया जा सकता था, लेकिन अब जेनेटिक इंजीनियर से तैयार किए गए बैक्टीरिया भी यही कर रहे हैं। बता दें कि बैक्टीरिया सिंगल सेल के बने होते हैं, मगर वे अपने आसपास के वातावरण के लिए संवेदनशील होते हैं और प्रतिक्रिया भी देते हैं। वहीं बहुकोशिकीय जीव जैसे डॉल्फिन, चिम्पांजी, ऑक्टोपस, कौवे और मनुष्य को बुद्धिमान जीवों में गिना जाता है। इनमें करोड़ों ब्रेन न्यूरॉन्स होते हैं। बैक्टीरिया में जेनेटिक सर्किट बाग की टीम ने बताया कि उन्होंने बैक्टीरिया में 'जेनेटिक सर्किट' पेश किए, जिन्हें रासायनिक प्रेरकों ( केमिकल सब्सटेंस, जिसका अलग-अलग प्रभाव पड़ता है) के कॉम्बिनेशन से एक्टिव किया जा सकता था। इसके बाद टीम ने बैक्टीरिया को अलग-अलग इंजीनियर सर्किट के साथ मिलाकर एक सॉल्यूशन में बैक्टीरिया के 'कंप्यूटर' बनाए, जो आर्टिफिशियल न्यूरॉन्स नेटवर्क की तरह व्यवहार करते थे।

इस सेटिंग में इंजीनियर बैक्टीरिया का हर प्रकार एक 'बैक्टोन्यूरॉन' था और बैक्टोन्यूरॉन के कॉम्बिनेशन बिल्कुल बहुकोशिकीय जीव की तरह गणित पर प्रतिक्रिया कर रहे थे । मेडिकल साइंस में विकास टीम ने सितंबर में नेचर केमिकल बायोलॉजी में अपनी फाइंडिंग की रिपोर्ट की । इस पेपर ने सिंथेटिक बायोलॉजिस्ट जीवों में नई क्षमताओं की इंजीनियरिंग करने वाले एक्सपर्ट के बीच रुचि पैदा की है। कोच्चि के सी.वी. जे. सेंटर फॉर सिंथेटिक बायोलॉजी एंड बायो मैन्युफैक्चरिंग के एग्जीक्यूटिव डाय पवन धर ने कहा कि हम एक नए युग में प्रवेश कर चुके हैं जहां बैक्टीरिया को केमिकल कॉन्वर्सेशन के जरिए मैथ प्रॉब्लम को हल करने के लिए प्रोग्राम किया जा सकता है। आगे उन्होंने कहा कि इन बैक्टीरियल कंप्यूटर्स के आने से फार्मास्युटिकल इंडस्ट्री, मेडिकल साइंस और बायो मैन्युफैक्चरिंग फील्ड में विकास हो सकता है।

■ अंतरिक्ष बुहारने की जरूरत 

दुनिया के एक मशहूर कारोबारी और टेस्ला तथा एक्स (पूर्व में ट्विटर) के मालिक की दूरसंचार कंपनी 'स्टारलिंक इंटरनेट सर्विसेज' फिलहाल करीब सौ देशों को इंटरनेट सेवाएं दे रही है। इस कंपनी की बातचीत भारत से भी चल रही है। उम्मीद है कि यह देश के दूरदराज क्षेत्रों में भी तेज और सस्ती इंटरनेट सेवाएं देने में प्रतिद्वंद्वी कंपनियों से होड़ करेगी। आज इंटरनेट तमाम सुविधाओं का वाहक बन गया है, इसकी बदौलत जो डिजिटल क्रांति आई है, उसने कई कामकाज आसान कर दिए हैं। अब तो कृत्रिम बुद्धिमता की तकनीक भी इसी इंटरनेट के कंधे पर सवार होकर नए गुल खिला रही है। मगर इसी इंटरनेट के रास्ते कई फर्जीवाड़े भी हो रहे हैं। इनसे पूरी दुनिया परेशान है। एक समस्या इसकी वजह से पैदा हो रहे मानसिक प्रदूषण और डेटा के रूप में जन्म ले रहे कचरे की है, जिस पर ज्यादा विचार नहीं हो रहा है। मगर यह इंटरनेट अब अंतरिक्ष में कचरे की भरमार का कारक भी बन गया है। यानी दूरसंचार क्रांति धरती पर ही अनेक तरह का कबाड़ पैदा नहीं कर रही है, बल्कि अंतरिक्ष में जिन उपग्रहों की बदौलत इंटरनेट हम तक पहुंच रहा है, वे भी समस्याएं बढ़ा रहे हैं। अंतरिक्ष में कचरा कोई नई समस्या नहीं है।

सितारों के निर्माण की प्रक्रिया में बहुत सारा कचरा पहले ही हमारे नजदीकी अंतरिक्ष में मौजूद रहा है। उसके खतरे पहले से कायम हैं। पर जब से अंतरिक्ष इंसानी गतिविधियों का केंद्र बना है, वहां इस कचरे ने और ज्यादा खतरनाक रूप धर लिया है। हम जिस इंटरनेट पर आज इतने ज्यादा निर्भर हो गए हैं, उसे हम तक पहुंचाने के एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल हो रहे उपग्रह अंतरिक्षीय कबाड़ की बड़ी वजह बन गए हैं। ये उपग्रह अंतरिक्ष में मुख्यतः दो स्थानों पर हैं। एक तो पृथ्वी की निचली कक्षाओं में, जहां खासतौर से अकेले 'स्टारलिंक' ने अब तक 6764 उपग्रह पहुंचा दिए हैं। इनमें से 6714 काम कर रहे हैं, जबकि शेष कबाड़ होकर चक्कर काट रहे हैं। 'स्टारलिंक' की मदद करने वाली एलन मस्क की ही एक और कंपनी 'स्पेसएक्स' की योजना आगामी वर्षों में 42 हजार उपग्रह और भेजने की है, ताकि दुनिया में चप्पे-चप्पे तक इंटरनेट पहुंचाया जा सके। 'स्टारलिंक' ने वर्ष 2019 में अपना पहला दूरसंचार उपग्रह अंतरिक्ष में भेजा था। इसके अगले पांच साल में ही उसके उपग्रहों की संख्या साढ़े छह हजार पार गई। अंतरिक्ष की ऊपरी कक्षाओं में भारत समेत दुनिया के कई देशों के 3135 संचार उपग्रह पहले से ही हैं। अभी तक का आकलन कहता है कि पृथ्वी की निचली कक्षाओं में 14 हजार से ज्यादा उपग्रह मौजूद हैं, जिनमें से करीब 3500 निष्क्रिय यानी कबाड़ हो चुके हैं। इस कबाड़ पर नजर रखने वाली अमेरिकी संस्था 'स्लिंगशाट एअरोस्पेस' का कहना है कि ये निष्क्रिय उपग्रह कचरा बन गए हैं।

 इसके अलावा तमाम अन्य अंतरिक्षीय गतिविधियों से हमारे करीबी अंतरिक्ष में बारह करोड़ से ज्यादा छोटे-बड़े मलबे के टुकड़े तेजी से चक्कर काटने लगे हैं। असल में, इसके खतरे दो तरह के हैं। एक जितनी बड़ी संख्या में नए उपग्रह विभिन्न उद्देश्यों के लिए अंतरिक्ष में छोड़े जा रहे हैं, अचानक किसी दिन वहां मौजूद कचरा उनके रास्ते में आ सकता है और पूरे मिशन को खत्म कर सकता है। दूसरे, जिस तरह की भीड़ पृथ्वी की निचली कक्षा में हो गई है, वहां चक्कर काटते उपग्रहों से ही इस कचरे का विनाशकारी आमना-सामना हो सकता है। कोई देश यह नहीं बताता कि उसके किस उपग्रह का मकसद क्या है और वह आखिर कितने उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ने वाला है। इसकी वजह यह है कि इन उपग्रहों के दोहरे उपयोग सैन्य और नागरिक दोनों ही हैं। सिर्फ सरकारें नहीं, निजी कंपनियां भी कारोबारी हितों के मद्देनजर इनसे जुड़ी जानकारियां नहीं बताती हैं। ऐसी स्थितियों का परिणाम क्या हो सकता है, इसकी एक नजीर इसी वर्ष जून और अगस्त में मिली थी। जून में एक रूसी उपग्रह विस्फोट के साथ फट गया, तो अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए उससे छिटके कचरे की जद में आने का खतरा पैदा हो गया। इसके बाद अगस्त में अंतरिक्ष में काफी ऊंचाई पर पहुंचा एक चीनी राकेट फटा तो उसके टुकड़े मलबे की शक्ल में अंतरिक्ष में फैल गए। • वर्ष 2021 में चीन ने संयुक्त राष्ट्र की अंतरिक्ष संस्था को बताया कि एलेन मस्क की कंपनी 'स्पेसएक्स' की ही एक इकाई 'स्टारलिंक इंटरनेट सर्विसेज' के उपग्रह दो बार चीन के अंतरिक्ष स्टेशन के बहुत पास आ गए थे।

पहली जुलाई और 21 अक्तूबर 2021 को हुई इन घटनाओं को लेकर चीन ने काफी नाराजगी दिखाई थी। संयुक्त राष्ट्र के अंतरिक्ष मामलों के दफ्तर की वेबसाइट के मुताबिक 'स्पेसएक्स' के उपग्रहों के बेहद नजदीक आ जाने की स्थिति को देखते हुए चीन के अंतरिक्ष स्टेशन में किसी टक्कर से बचने की उपायों को लागू कर दिया था, जिससे इसका कामकाज प्रभावित हुआ था। मसला अकेले चीन के लिए नहीं है। ऐसे मामलों पर नजर रखने वाली वेबसाइट 'स्लिंगशाट' का आकलन है कि पृथ्वी की निचली कक्षा में उपग्रहों के अत्यधिक नजदीक आ जाने की घटनाओं में एक साल के अंदर ही 17 फीसद का इजाफा हुआ है। चूंकि इस निचली कक्षा में 'स्टारलिंक' के उपग्रहों का बोलबाला है, इसलिए इसकी मूल कंपनी 'स्पेसएक्स' को टक्कर रोकने वाले कई उपाय खुद करने पड़ते हैं। दूसरी अंतरिक्ष एजेंसियों को भी ऐसे उपाय करने पड़ रहे हैं। जैसे यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का कहना है कि बीते एक साल में उसके उपग्रहों को टकराव रोकने के लिए औसत से तीन या चार गुना ज्यादा उपाय करने पड़े हैं। प्राकृतिक गतिविधियों पर हमारा कोई वश नहीं, लेकिन मानवीय गतिविधियों के कारण अंतरिक्ष में पैदा हो रहे कचरे की रोकथाम कुछ अर्थों में जरूर संभव है। इस बारे में संयुक्त राष्ट्र के एक पैनल का सुझाव है कि इंसानी गतिविधियों से अंतरिक्ष में पैदा हो रहे कबाड़ को रोकने के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों को एक साथ लाकर कोई तालमेल बनाया जाए। मगर समस्या यह है कि ज्यादातर देश अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों को लेकर गोपनीयता बरतते हैं। निजी अंतरिक्ष एजेंसियां भी तकनीक के चोरी होने के भय से आंकड़े साझा नहीं करतीं ।

इसके अलावा चूंकि लंबी दूरी की बहुराष्ट्रीय मिसाइलों के निर्माण और जासूसी के काम में उपग्रहों का इस्तेमाल अंतरिक्ष संबंधी कार्यक्रमों से सीधे जुड़े होते हैं, इसलिए इन कार्यक्रमों का सटीक डेटा सार्वजनिक नहीं किया जाता। एक दूसरे पर अविश्वास की इस स्थिति में कोई बदलाव तभी संभव है, जब संयुक्त राष्ट्र इसमें दखल दे। जाहिर है कि जब तक ऐसा नहीं होता, अपने घर को भीतर से बुहारने वाली और सारा कचरा दरवाजे के बाहर ठेलने वाली मानव सभ्यता के लिए अंतरिक्ष की बिगड़ती सेहत एक समस्या ही बनी रहेगी।

■ शिक्षा में इंटरैक्टिव शिक्षण की परिवर्तनकारी भूमिका

 यह आधुनिक दृष्टिकोण सिर्फ शिक्षण रणनीतियों में बदलाव नहीं है बल्कि भविष्य के कार्यबल की गतिशील मांगों के लिए छात्रों को तैयार करने की दिशा में एक छलांग है तकनीकी प्रगति और एआई के एकीकरण के साथ शिक्षा का परिदृश्य महत्वपूर्ण रूप से विकसित हुआ है, जिससे इंटरैक्टिव शिक्षण एक पसंदीदा दृष्टिकोण बन गया है। क्योंकि इंटरएक्टिव लर्निंग जुड़ाव, आलोचनात्मक सोच और दीर्घकालिक स्मृति को बढ़ावा देती है, इससे ज्ञान को अधिक अच्छी तरह से आत्मसात करना संभव हो जाता है। यह निस्संदेह पारंपरिक दृष्टिकोण पर एक सुधार है, जो ज्यादातर रटने पर जोर देता है और काफी हद तक पाठ्यपुस्तक-आधारित तकनीकों पर निर्भर करता है। आज के गतिशील वातावरण में आवश्यक योग्यताएँ इंटरैक्टिव सीखने के लिए बेहतर अनुकूल हैं। पारंपरिक शिक्षण दृष्टिकोण का उपयोग करके ज्ञान को निष्क्रिय रूप से अवशोषित करने से सतही शिक्षा प्राप्त होती है, जो अंततः प्रतिकूल होती है। राष्ट्रीय प्रशिक्षण प्रयोगशालाओं के शोध के अनुसार, पढ़ने और व्याख्यान जैसी निष्क्रिय सीखने की तकनीकों में याद रखने की दर केवल 5-10 प्रतिशत है। इंटरएक्टिव लर्निंग का आगमन: इंटरैक्टिव लर्निंग द्वारा एक अधिक व्यावहारिक दृष्टिकोण प्रदान किया जाता है, जो प्रौद्योगिकी, टीम वर्क और वास्तविक दुनिया की समस्या-समाधान को जोड़ता है।

 इससे जुड़ाव बढ़ता है और प्रतिधारण बढ़ता है। डिजिटल उपकरण, परियोजना-आधारित शिक्षा और समूह चर्चा सभी इस दृष्टिकोण के दायरे में शामिल हैं। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार, इंटरैक्टिव कक्षाओं के छात्रों ने परीक्षाओं में पारंपरिक व्याख्यान देने वाले छात्रों से 6 प्रतिशत बेहतर प्रदर्शन किया। यहां कुछ तरीके दिए गए हैं जिनसे इंटरैक्टिव शिक्षण दृष्टिकोण पारंपरिक रणनीतियों से बेहतर काम करते हैं: 1. बढ़ी हुई अवधारण: राष्ट्रीय प्रशिक्षण प्रयोगशालाओं के शोध के अनुसार, अभ्यास-दर-करने और समूह चर्चा जैसी सक्रिय सीखने की रणनीतियों में उच्च अवधारण दर थी, जो 50 से 75 प्रतिशत तक थी। छात्र व्यावहारिक अनुभवों के माध्यम से एसटीईएम सिद्धांतों को सीधे लागू कर सकते हैं। अमेरिकन सोसाइटी फॉर इंजीनियरिंग एजुकेशन के शोध के अनुसार, जिन विद्यार्थियों ने इंटरैक्टिव एसटीईएम गतिविधियों में भाग लिया, उन्होंने मानक निर्देश प्राप्त करने वालों की तुलना में बहुत अधिक सीखा। 2. आलोचनात्मक सोच को प्रोत्साहित करना: इंटरैक्टिव शिक्षण छात्रों को अन्य दृष्टिकोणों की जांच करने और प्रश्न पूछने की अनुमति देकर रचनात्मकता और आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देता है। मैकिन्से एंड कंपनी के शोध के अनुसार, इंटरैक्टिव शिक्षण वातावरण छात्रों की व्यस्तता को बढ़ाते हुए और उत्पादक सामाजिक संपर्क को बढ़ावा देते हुए महत्वपूर्ण सोच और प्रतिबिंब को बढ़ावा देता है। छात्र जुड़ाव का एक और व्यापक तरीका गेमिफिकेशन है, जो चुनौतीपूर्ण मुद्दों से निपटने के लिए छात्रों के प्रोत्साहन को बढ़ाता है और गहन सीखने की अनुमति देता है।

3. वास्तविक-विश्व अनुप्रयोग: परियोजना-आधारित शिक्षा, जो शिक्षा को वास्तविक दुनिया के मुद्दों से जोड़ती है और व्यावहारिक संदर्भों में जानकारी की प्रयोज्यता को बढ़ाती है, इंटरैक्टिव शिक्षा का एक महत्वपूर्ण तत्व है। एडुटोपिया के 2022 के शोध के अनुसार, पारंपरिक तकनीकों का उपयोग करके अध्ययन करने वाले छात्रों के विपरीत, प्रोजेक्ट-आधारित कार्यक्रमों में भाग लेने वाले छात्रों ने वास्तविक जीवन की परिस्थितियों में जानकारी के बेहतर अनुप्रयोग का प्रदर्शन किया। 4. भविष्य के लिए तैयार: अधिक आकर्षक और प्रासंगिक निर्देश के माध्यम से, इंटरैक्टिव शिक्षण छात्रों को पारंपरिक तरीकों की तुलना में बाधाओं को अधिक प्रभावी ढंग से दूर करने में सक्षम बनाता है। अनिश्चित और लगातार बदलते समय के लिए छात्रों को शिक्षित करने के लिए, शिक्षा को समस्या-समाधान, टीम वर्क और आज के प्रतिस्पर्धी श्रम में लचीलेपन जैसी क्षमताओं पर जोर देना चाहिए।बाज़ार। इंटरएक्टिव दृष्टिकोण भी प्रेरणा को बढ़ावा देते हैं और टीम वर्क को प्रोत्साहित करते हैं, जो छात्रों को उनकी संचार और टीम वर्क क्षमताओं को निखारने में सहायता करता है। EdTechXGlobal के अनुसार, वैश्विक एडटेक बाज़ार 2025 तक $404 बिलियन तक बढ़ने की उम्मीद है।

जो छात्र इंटरैक्टिव शिक्षण तकनीक का उपयोग करते हैं वे न केवल अकादमिक रूप से बेहतर प्रदर्शन करते हैं बल्कि वास्तविक दुनिया में समस्याओं से निपटने के लिए भी बेहतर तैयार होते हैं। विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब [4) Story डाकिया बाबू विजय गर्ग "अम्मा!.आपके बेटे ने मनीआर्डर भेजा है।" डाकिया बाबू ने अम्मा को देखते अपनी साईकिल रोक दी। अपने आंखों पर चढ़े चश्मे को उतार आंचल से साफ कर वापस पहनती अम्मा की बूढ़ी आंखों में अचानक एक चमक सी आ गई.. "बेटा!.पहले जरा बात करवा दो।" अम्मा ने उम्मीद भरी निगाहों से उसकी ओर देखा लेकिन उसने अम्मा को टालना चाहा.. "अम्मा!. इतना टाइम नहीं रहता है मेरे पास कि,. हर बार आपके बेटे से आपकी बात करवा सकूं।" डाकिए ने अम्मा को अपनी जल्दबाजी बताना चाहा लेकिन अम्मा उससे चिरौरी करने लगी.. "बेटा!.बस थोड़ी देर की ही तो बात है।" "अम्मा आप मुझसे हर बार बात करवाने की जिद ना किया करो!" यह कहते हुए वह डाकिया रुपए अम्मा के हाथ में रखने से पहले अपने मोबाइल पर कोई नंबर डायल करने लगा.. "लो अम्मा!.बात कर लो लेकिन ज्यादा बात मत करना,.पैसे कटते हैं।" उसने अपना मोबाइल अम्मा के हाथ में थमा दिया उसके हाथ से मोबाइल ले फोन पर बेटे से हाल-चाल लेती अम्मा मिनट भर बात कर ही संतुष्ट हो गई। उनके झुर्रीदार चेहरे पर मुस्कान छा गई। "पूरे हजार रुपए हैं अम्मा!" यह कहते हुए उस डाकिया ने सौ-सौ के दस नोट अम्मा की ओर बढ़ा दिए। रुपए हाथ में ले गिनती करती अम्मा ने उसे ठहरने का इशारा किया.. "अब क्या हुआ अम्मा?" "यह सौ रुपए रख लो बेटा!" "क्यों अम्मा?" उसे आश्चर्य हुआ।

"हर महीने रुपए पहुंचाने के साथ-साथ तुम मेरे बेटे से मेरी बात भी करवा देते हो,.कुछ तो खर्चा होता होगा ना!" "अरे नहीं अम्मा!.रहने दीजिए।" वह लाख मना करता रहा लेकिन अम्मा ने जबरदस्ती उसकी मुट्ठी में सौ रुपए थमा दिए और वह वहां से वापस जाने को मुड़ गया। अपने घर में अकेली रहने वाली अम्मा भी उसे ढेरों आशीर्वाद देती अपनी देहरी के भीतर चली गई। वह डाकिया अभी कुछ कदम ही वहां से आगे बढ़ा था कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा.. उसने पीछे मुड़कर देखा तो उस कस्बे में उसके जान पहचान का एक चेहरा सामने खड़ा था। मोबाइल फोन की दुकान चलाने वाले रामप्रवेश को सामने पाकर वह हैरान हुआ.. "भाई साहब आप यहां कैसे?. आप तो अभी अपनी दुकान पर होते हैं ना?" "मैं यहां किसी से मिलने आया था!.लेकिन मुझे आपसे कुछ पूछना है।" रामप्रवेश की निगाहें उस डाकिए के चेहरे पर टिक गई.. "जी पूछिए भाई साहब!" "भाई!.आप हर महीने ऐसा क्यों करते हैं?" "मैंने क्या किया है भाई साहब?" रामप्रवेश के सवालिया निगाहों का सामना करता वह डाकिया तनिक घबरा गया। "हर महीने आप इस अम्मा को भी अपनी जेब से रुपए भी देते हैं और मुझे फोन पर इनसे इनका बेटा बन कर बात करने के लिए भी रुपए देते हैं!.ऐसा क्यों?"

रामप्रवेश का सवाल सुनकर डाकिया थोड़ी देर के लिए सकपका गया!. मानो अचानक उसका कोई बहुत बड़ा झूठ पकड़ा गया हो लेकिन अगले ही पल उसने सफाई दी.. "मैं रुपए इन्हें नहीं!.अपनी अम्मा को देता हूंँ।" "मैं समझा नहीं?" उस डाकिया की बात सुनकर रामप्रवेश हैरान हुआ लेकिन डाकिया आगे बताने लगा... "इनका बेटा कहीं बाहर कमाने गया था और हर महीने अपनी अम्मा के लिए हजार रुपए का मनी ऑर्डर भेजता था लेकिन एक दिन मनी ऑर्डर की जगह इनके बेटे के एक दोस्त की चिट्ठी अम्मा के नाम आई थी।" उस डाकिए की बात सुनते रामप्रवेश को जिज्ञासा हुई.. "कैसे चिट्ठी?.क्या लिखा था उस चिट्ठी में?" "संक्रमण की वजह से उनके बेटे की जान चली गई!. अब वह नहीं रहा।" "फिर क्या हुआ भाई?" रामप्रवेश की जिज्ञासा दुगनी हो गई लेकिन डाकिए ने अपनी बात पूरी की.. "हर महीने चंद रुपयों का इंतजार और बेटे की कुशलता की उम्मीद करने वाली इस अम्मा को यह बताने की मेरी हिम्मत नहीं हुई!.मैं हर महीने अपनी तरफ से इनका मनीआर्डर ले आता हूंँ।" "लेकिन यह तो आपकी अम्मा नहीं है ना?" "मैं भी हर महीने हजार रुपए भेजता था अपनी अम्मा को!. लेकिन अब मेरी अम्मा भी कहां रही।" यह कहते हुए उस डाकिया की आंखें भर आई। हर महीने उससे रुपए ले अम्मा से उनका बेटा बनकर बात करने वाला रामप्रवेश उस डाकिया का एक अजनबी अम्मा के प्रति आत्मिक स्नेह देख नि:शब्द रह गया.......

 विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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SuragBureau

Surag Bureau पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और स्थानीय व राष्ट्रीय मुद्दों पर समाचार लेखन करते हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना हैं।

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