थाना/कोतवाली खरीद सकते हैं लेकिन जनता को न्याय नहीं दे सकते कोतवाल
थाना/कोतवाली खरीद सकते हैं लेकिन जनता को न्याय नहीं दे सकते कोतवाल
? थाना खरीदे, मगर न्याय क्यों नहीं मिलता?
? एक सच्चाई जो हमें झकझोरनी चाहिए
✍️ राम प्रसाद माथुर
आजकल एक कहावत आम हो चली है — "थानेदार पैसा देकर कुर्सी तक पहुंचता है, फिर वसूली में लग जाता है।" विडंबना देखिए, जो कुर्सी जनता की सेवा के लिए होती है, वह अब कमाई का जरिया बन चुकी है। सवाल उठता है — क्या थाने / कोतवाली अब 'न्याय के मंदिर' नहीं, 'नौकरी की मंडी' बन गए हैं? जब थानेदारी एक बोली पर बिकने लगे, तो फिर उससे ईमानदारी और निष्पक्षता की उम्मीद करना एक मज़ाक बन जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी इलाकों तक, यह आम धारणा बन गई है कि थानेदार की नियुक्ति "सिफारिश और सुविधा शुल्क" से होती है। और जब किसी पद की कीमत चुकाई जाती है, तो उसकी भरपाई कहां से होती है — यह कोई रहस्य नहीं।
★ ग़लत पर अंकुश क्यों नहीं?**
पुलिस महकमे की पहली ज़िम्मेदारी है — कानून का पालन और ग़लत कार्यों पर अंकुश। लेकिन जब थाने का मुखिया ही अपराधियों से मिला बैठा हो, तो आम आदमी की सुनवाई कौन करेगा? शिकायतकर्ता को बार-बार चक्कर कटवाए जाते हैं, जबकि रसूखदारों के दरवाज़े पर तुरंत कार्रवाई होती है। आए दिन ख़बरें आती हैं — बलात्कार पीड़ित की FIR दर्ज नहीं हुई, ज़मीन कब्ज़ा मामले में पुलिस मौन रही, मारपीट के केस में उल्टा पीड़ित को ही आरोपी बना दिया गया। ये घटनाएं अपवाद नहीं रहीं — ये अब दिनचर्या बन चुकी हैं।
★ प्रशासन सो क्यों रहा है?**
जब आम जनता का विश्वास पुलिस से उठने लगे, तो लोकतंत्र की नींव हिलती है। सरकारें बदलती हैं, नारे बदलते हैं, लेकिन थानों की तस्वीर वही रहती है। पुलिस सुधारों की बातें होती हैं, लेकिन उन पर अमल शायद ही कभी दिखता है। कभी-कभी लगता है — थानेदारी अब "सेवा नहीं, सत्ता" का प्रतीक बन चुकी है।
★ क्या समाधान है?
1. **पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया**: थानेदार की पोस्टिंग पूरी तरह से योग्यता और रिकॉर्ड के आधार पर होनी चाहिए — न कि धन या सिफारिश से। 2. **सामाजिक निगरानी समितियां**: हर थाने में आम जनता की निगरानी समिति हो जो पुलिस के कार्यों का आकलन करे। 3. **FIR की अनिवार्यता**: यदि कोई पुलिसकर्मी FIR दर्ज करने से इनकार करता है, तो उसके खिलाफ स्वतः संज्ञान लिया जाए। 4. **डिजिटल ट्रैकिंग**: शिकायतों की ऑनलाइन निगरानी होनी चाहिए, जिससे जवाबदेही तय की जा सके।
★ अंत में...** थानेदार कुर्सी तो खरीद लेता है, लेकिन क्या वह उस कुर्सी की गरिमा को समझ पाता है? क्या उसे यह याद रहता है कि उसकी वर्दी पर जनता का विश्वास टिका है? अब समय आ गया है कि हम केवल पुलिस से सवाल न पूछें — बल्कि सरकारों, प्रशासनिक व्यवस्था और खुद समाज से भी जवाब मांगें। वरना एक दिन ऐसा आएगा, जब थाने सिर्फ 'सौदेबाज़ी' के अड्डे बन जाएंगे — और न्याय, एक सपना रह जाएगा।
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