CHC शमशाबाद में प्रसूताओं के पोषण पर सवाल: रूखी रोटी, समय से पहले छुट्टी और अव्यवस्थाओं के आरोप
CHC शमशाबाद में प्रसूताओं के पोषण पर सवाल: रूखी रोटी, समय से पहले छुट्टी और अव्यवस्थाओं के आरोप
फर्रुखाबाद/शमशाबाद । सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) शमशाबाद में प्रसव के बाद प्रसूताओं को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं और पोषण आहार को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। स्थानीय लोगों और सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि अस्पताल में भर्ती महिलाओं को शासन की निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं कराया जा रहा है। आरोप यह भी है कि प्रसव के बाद आवश्यक चिकित्सकीय निगरानी की अवधि पूरी होने से पहले ही महिलाओं को छुट्टी दे दी जाती है। ग्रामीणों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है। आरोप है कि जहां शासन की ओर से प्रसूता महिलाओं को दूध, फल, दाल, दलिया एवं अन्य पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने के निर्देश हैं, वहीं सीएचसी में कई महिलाओं को केवल सूखी रोटी और आलू की सब्जी देकर औपचारिकता पूरी की जा रही है।
कुछ मामलों में छोटे बिस्कुट के पैकेट या सीमित मात्रा में दूध दिए जाने की भी बात कही जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि नवजात को स्तनपान कराने वाली माताओं को पर्याप्त पोषण न मिलने से उनकी सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। सूत्रों के अनुसार, पोषण आहार के लिए मिलने वाले बजट के सही उपयोग पर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कागजों में व्यवस्थाएं पूरी दिखाई जाती हैं, जबकि धरातल पर सुविधाएं बेहद सीमित हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि सुरक्षित मातृत्व कार्यक्रम के तहत प्रसूता और नवजात को प्रसव के बाद आवश्यक अवधि तक चिकित्सकीय निगरानी में रखा जाना चाहिए, लेकिन कई महिलाओं को कथित तौर पर 10 से 12 घंटे के भीतर ही घर भेज दिया जाता है। लोगों का कहना है कि कई बार महिलाओं की शारीरिक स्थिति पूरी तरह सामान्य भी नहीं होती, फिर भी उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है। कुछ परिजनों ने डिस्चार्ज प्रक्रिया में भी पारदर्शिता न होने की शिकायत की है। इसके अलावा सरकारी एंबुलेंस सुविधा को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि कई परिवारों को निजी वाहनों से घर लौटना पड़ता है। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि प्रसव सेवाओं के नाम पर गरीब परिवारों से अवैध धनराशि की मांग की जाती है। इन आरोपों की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। उन्होंने जिलाधिकारी और मुख्य चिकित्सा अधिकारी से पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराकर वास्तविक स्थिति सामने लाने तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करने की मांग की है।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)