एटा में स्कूल–पब्लिशर गठजोड़ का खेल: 50 पन्नों की किताब 400 में, अभिभावकों की जेब पर डाका
एटा में स्कूल–पब्लिशर गठजोड़ का खेल: 50 पन्नों की किताब 400 में, अभिभावकों की जेब पर डाका
◆ आर. पी.माथुर
एटा। शहर में शिक्षा के नाम पर एक बड़ा खेल सामने आ रहा है, जिसमें कुछ निजी स्कूल, पब्लिशर और चुनिंदा किताब दुकानदारों की मिलीभगत से अभिभावकों को खुलेआम आर्थिक रूप से निचोड़ा जा रहा है। आरोप है कि महज 40–50 पन्नों की साधारण पुस्तिकाएं 300 से 400 रुपये तक में बेची जा रही हैं, जबकि उनकी वास्तविक लागत बेहद कम होती है। यह पूरा तंत्र इस तरह काम करता है कि अभिभावकों के पास विरोध का कोई विकल्प ही नहीं बचता। सूत्रों के मुताबिक, कई स्कूल अपने नाम से या अपने निर्देश पर पब्लिशरों से खास किताबें छपवाते हैं। इन किताबों का कंटेंट भी अक्सर सामान्य या इंटरनेट से लिया गया होता है, लेकिन उन पर स्कूल का नाम और लोगो लगाकर उन्हें “अनिवार्य” बना दिया जाता है।
इसके बाद इन किताबों को शहर के कुछ तय दुकानदारों के पास ही उपलब्ध कराया जाता है। अभिभावकों को स्पष्ट निर्देश होता है कि वे किताबें केवल इन्हीं दुकानों से खरीदें, अन्यथा बच्चे की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है। शहर में जिन स्कूलों के नाम इस पूरे प्रकरण में चर्चाओं में आ रहे हैं, उनमें सेंट पाल्स, असीसी कॉन्वेंट, लिमरा इंटरनेशनल और ट्यूलिप स्कूल जैसे नाम प्रमुख रूप से लिए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन अभिभावकों के बीच इन संस्थानों को लेकर असंतोष लगातार बढ़ रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे खेल में मोटा कमीशन तय होता है। जानकारों का कहना है कि किताब की कीमत का लगभग 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा कमीशन के रूप में बंटता है। इसमें स्कूल प्रबंधन, पब्लिशर और दुकानदार सभी की हिस्सेदारी होती है। यानी जो किताब 50–60 रुपये में आसानी से तैयार हो सकती है, उसे कई गुना कीमत पर बेचा जा रहा है। अभिभावकों की मजबूरी इस सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत बन गई है। एक अभिभावक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “हम जानते हैं कि यह गलत है, लेकिन बच्चों की पढ़ाई के कारण हम विरोध नहीं कर पाते। अगर किताब नहीं खरीदेंगे तो बच्चे को क्लास में परेशानी होगी।” यही डर स्कूलों के लिए कमाई का जरिया बन गया है।
यही नहीं, कई अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रशासन अप्रत्यक्ष रूप से दबाव बनाता है कि निर्धारित दुकानों से ही किताबें खरीदी जाएं। कुछ मामलों में तो बच्चों को क्लास में अलग-थलग तक किया जाता है, जिससे माता-पिता मजबूरी में महंगी किताबें खरीदने को विवश हो जाते हैं। इस मामले में प्रशासन और शिक्षा विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ऐसा लगता है जैसे जिम्मेदार अधिकारी आंखों पर पट्टी बांधकर बैठे हैं। विभागीय उदासीनता के कारण स्कूल प्रबंधन के हौसले और बुलंद हो गए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह का व्यवसायीकरण न केवल अभिभावकों पर आर्थिक बोझ डाल रहा है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता पर भी असर डाल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब स्कूलों का फोकस पढ़ाई से ज्यादा कमाई पर हो जाए, तो शिक्षा का उद्देश्य ही खत्म हो जाता है। जरूरत इस बात की है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो।
सरकार को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए कि कोई भी स्कूल अभिभावकों को किसी विशेष दुकान से किताब खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। साथ ही, किताबों की कीमत और गुणवत्ता पर भी नियंत्रण होना चाहिए। यदि समय रहते इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद जरूरी है, ताकि अभिभावकों का भरोसा बना रहे और बच्चों का भविष्य सुरक्षित रह सके।