10 अगस्त : बोलने और सड़क पर उतरने का दिन
10 अगस्त : बोलने और सड़क पर उतरने का दिन
(आलेख : बादल सरोज)
इतिहास में ऐसे समय आते हैं, जब देश और जनता को, वर्तमान और भविष्य को बचाने के लिए बोलना जरूरी होता है। भारत के इतिहास में आज का समय ऐसा ही समय है। दिल्ली के जंतर मंतर पर युवक-युवतियों ने सिर्फ संघर्ष का नया व्याकरण ही नहीं रचा है, प्रतिरोध की नयी भाषा और संवाद की नयी वर्तनी भी गढ़ी है। मोदी-अमित शाह की पुलिस की बर्बरता के बावजूद शांतिपूर्ण विरोध, उसकी रचनात्मकता ने तानाशाही के दिनों-दिन फैलते मकड़जाल को महज पांच दिनों में जिस तरह से तार-तार किया है, वह भारतीय राजनीति के इतिहास का सुनहरा अध्याय तथा भविष्य के लिए उम्मीद जगाने वाला सराहनीय काम है। और यह बात सिर्फ दिल्ली भर की बात नहीं, देश के दो सौ से ज्यादा शहरों ने भी युवा पीढ़ी का उबाल देखा है। मगर हमला सिर्फ युवाओं पर नहीं है। इस वक़्त देश पर काबिज अडानी, अम्बानी के इशारों पर काम करने वाले और अमरीका के राष्ट्रपति की गीदड़ भभकियों से डरने वाली मोदी सरकार के हमलों के निशाने पर पूरा देश, भारत की पहचान, लोकतंत्र और संविधान खतरे में है।
वर्ष 2014 में इनके सत्ता में आने के बाद से देश और उसकी जनता का विराट बहुमत हिस्सा जिस तरह के मुश्किल से मुश्किलतर होते हालात से गुजर रहा है, उसकी कोई सीमा नहीं है। कुछ मुट्ठी भर घरानों और उनके चाकरों, कहारों और ढिंढोरचियों को छोड़कर आबादी का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है, जिसके साथ नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व और भाजपा की अगुआई वाली सरकार ने दगा न की हो, जिसे ठगा न हो। मजदूर-किसान और मेहनतकश अवाम को तो जैसे इसने तबाह और बर्बाद करने की ही ठान ली है। एक मनुष्य के रूप में जिन्दा रहने के लिए जरूरी भोजन, आवास, स्वास्थ्य और रोजगार उसकी पहुँच से बाहर होते जा रहे हैं। इंसान का जीवन जीने के लिए जरूरी शिक्षा और लोकतांत्रिक अधिकार, क़ानून विधान से चलने वाला राज, यहाँ तक कि स्वतंत्र राष्ट्र के स्वतंत्र नागरिक की पहचान माने जाने वाले मानवाधिकार तक मोदी सरकार के निशाने पर हैं। लोकतांत्रिक देश के लोगों को नागरिक से प्रजा में बदला जा रहा है। कार्पोरेटी साम्प्रदायिक हुक्मरान इस देश और उसके नागरिकों का आज और आने वाला कल ही अन्धकार में नहीं डुबोना चाहते, बल्कि सैकड़ों वर्षों, कई युगों के संघर्षों और उनमें दी गयी कुर्बानियों से हासिल रौशनी को भी बुझा देना चाहते हैं। मजदूर-किसानों से तो जैसे मोदी सरकार ने दुश्मनी ही ठान ली है।
किसानों की आमदनी दो गुना करने का दावा किया और खेती-किसानी बर्बाद कर दी, मजदूरों को बेहतरी के सपने दिखाए और चार श्रम संहिताओं की बेड़ियों में जकड़ दिया, खेत मजदूरों सहित ग्रामीण श्रमिकों के पहले से ही बदहाल हाल को और ज्यादा बेहाल कर दिया, हर साल दो करोड़ रोजगार देने का झांसा दिया और पहले से मौजूद करोड़ों रोजगार ख़त्म करते हुए भविष्य में नए रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावनाए ही समाप्त कर दी। भविष्य के जागरूक नागरिक तैयार करने वाले विश्वविद्यालयों को दमघोंटू यातनागृहों में तब्दील करने की तो जैसे परियोजना ही शुरू कर दी है। यह सब करते हुए, इन्हीं के साथ महिलाओं सहित समाज के वंचित और पहले से ही शोषित हिस्सों दलितों, पिछड़ों को कुख्यात मनु की यंत्रणाओं वाले युग में वापस पहुंचाने की कुटिल साजिशें तेज से तेजतर की जा रही हैं। ‘न खाऊँगा न खाने दूंगा’ का झांसा देकर आये इस कुनबे ने भ्रष्टाचार की अब तक की सारी सीमाएं लांघ दी हैं। अयोध्या के राम मंदिर में हुई हजारों करोड़ की लूट इसकी बानगी है। रक्षा सौदों से लेकर जमीन की लूट तक ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जहां घपले और बेईमानियाँ नहीं हुई हों। जो आज तक नहीं हुआ, वह भी इस बीच हुआ है – न्यायपालिका को भी मातहत और भ्रष्टाचार का जरिया बनाने की तकलीफदेह मिसालें भी सामने आई हैं। कारपोरेट पूँजी की गोद में बैठे साम्प्रदायिक हिंदुत्व ने अपनी शुरुआत धार्मिक, भाषाई, नस्लीय हर तरह के अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहरीली नफरत से की थी। आज वह मुहिम एक जड़, कूपमंडूक, अपढ़ और मुट्ठीभर लोगों के कठोर नियंत्रण वाले सामाजिक राजनीतिक ढाँचे की स्थापना करने के खतरनाक मंसूबे तक आ गयी है। हजारों वर्षों का हासिल दांव पर है। जिसका हिन्दू या किसी भी पंथ या परम्परा से दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं है, वह हिंदुत्ववादी साम्प्रदायिकता कारपोरेट की गंदी और आपराधिक पूँजी के साथ मिलकर सिर्फ जनता को ही त्रास नहीं दे रही, यह भारत की पहचान यहाँ तक कि उसकी अवधारणा के लिए ही खतरा पैदा कर रही है।
यह समय एक चुनौतीपूर्ण समय है। चुनौतियों का सामना उनसे लड़कर, उस लड़ाई में जनता के मेहनतकश हिस्सों और देशभक्त नागरिकों को जोड़ने के प्रयास तेज करके ही किया जा सकता है। मौजूदा नीतियों को बदलने के साथ उन वैकल्पिक नीतियों को लागू कराने के लिए जगाने, एकजुट करने, संघर्ष में उतारने का प्रयास कर रहे हैं। सिर्फ युवा और महिलायें ही नहीं, देश के मजदूर-किसान संगठन ठीक यही काम कर रहे हैं। ऐतिहासिक किसान आन्दोलन ने एक बार नहीं, दो-दो बार हुक्कामों के घुटने टिकवाये हैं, एक के बाद एक हुई मजदूरों की हड़तालों ने हुकूमत को हिलाया है : यह आशाजनक बात है कि अब ये सब – भारत के निर्माता और उसका भविष्य –सब मिलकर लड़ने की दिशा में बढ़ रहे हैं। गांधी, डॉ. अम्बेडकर, भगत सिंह के संग्रामों से हासिल भारत को बचाना है, इसे उनके सपनों के अनुरूप बनाना है, तो उनके दिखाए संघर्षों के रास्ते पर भी चलना होगा। उन्होंने जिस बुलंद आवाज में अंग्रेजों -- भारत छोडो' का नारा दिया था, उससे भी ज्यादा तेज आवाज में 'अडानी, अम्बानी के दलालों, अमरीका से डरने वालो, देश को बांटने वालो -- भारत छोडो' का नारा बुलंद करना होगा। देश के मजदूर और किसान संगठनों ने अपनी लड़ाई के अगले और नए चरण का एलान किया है। इस चरण में स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण दिन 9 अगस्त के 'भारत छोड़ो' आन्दोलन को एक बार फिर नए हालात में मनाने का आव्हान किया गया है। अगस्त की 9 तारीख को रविवार का अवकाश होने की वजह से इसे 10 अगस्त को मनाया जाएगा। संयुक्त किसान मोर्चा और ट्रेड यूनियनों के साझे मंच के 28 और 29 जुलाई को हुए दो कामयाब सम्मेलनों ने दिल्ली से जो आव्हान किया है, वह 10 अगस्त को देश भर में लाखों मेहनतकशों द्वारा अपने आपको गिरफ्तारियों के लिए प्रस्तुत करने के रूप में दिखेगा। इस रोज कश्मीर से कन्याकुमारी, कटक से अटक तक पूरा देश 'अडानी,अम्बानी के दलालों, अमरीका से डरने वालो, देश को बांटने वालों -- भारत छोड़ो' के नारे से गूंजेगा।
यह समय हिचक छोड़ने, दूसरों के निकलने का इन्तजार करना बंद करने, अपने मकानों और दुकानों से निकलने, बर्बादी लाने वाले तानाशाह बेईमानों से लड़ने का समय है। *(लेखक 'लोकजतन' के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।
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