Article : क्या यह मोदी राज के अंत की शुरूआत है?
क्या यह मोदी राज के अंत की शुरूआत है?
(आलेख : राजेंद्र शर्मा)
सड़कें अगर खामोश हो जाती हैं, तो संसद आवारा हो जाती है! जनतंत्र के भारतीय अभ्यास से निकली इस जानी-मानी कहावत के हिसाब से संसद के मानसून सत्र के पहले दिन, 20 जुलाई के 'संसद मार्च' ने, जो प्रचंड रूप से युवाओं का संसद मार्च साबित हुआ, संसद और वास्तव में तो सरकार के नकेल डालने के जनतंत्र के लिए बहुत ही जरूरी काम की शुरूआत कर दी है। सरकार और उसके सारे तंत्र के ही नहीं, खुद इस मार्च का आह्वान करने वालों के भी सारे अनुमानों को पीछे छोड़ते हुए, लाखों की संख्या में छात्र, युवा और अन्य जनतंत्र की परवाह करने वाले सुबह से ही इस संसद मार्च में शामिल होने के लिए जंतर-मंतर की तथा संसद की ओर जाने वाले सभी रास्तों पर जमा हो गए। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि परंपरागत अर्थ में 'मार्च' जैसा कुछ व्यवस्थित प्रयास संभव ही नहीं था, क्योंकि हर तरफ लोग ही लोग थे। और थे असाधारण रूप से बड़ी संख्या में पुलिस बल। और जहां यह उल्लेखनीय है कि यह विशाल जनसमूह, परंपरागत अर्थों में चाहे राजनीतिक नहीं हो, फिर भी जंतर-मंतर पर महीने भर से जारी मुसलसल धरने तथा तीन हफ्ते से जारी प्रख्यात शिक्षाविद, वैज्ञानिक तथा सामाजिक कार्यकर्ता, सोनम वांगचुक और वामपंथी छात्रों की भूख हड़ताल के जरिए उठाए जा रहे मुद्दों के साथ काफी मुखर तथा आवयविक जुड़ाव के चलते, पूरी तरह से अनुशासित तथा शांतिपूर्ण था, वहीं यह भी उल्लेखनीय है कि हजारों की संख्या में दिल्ली पुलिस के अलावा अर्द्घ-सैनिक बलों की सारे हरबे-हथियारों के साथ सामान्यत: डरावनी तैनाती का, युवाओं की इस फौज के मन में शायद ही कोई डर था।
इसी का नतीजा था कि जब अमित शाह के निर्देश पर पुलिस बलों ने आंसू गैस के गोलों से लेकर, लाठी चार्ज के नाम पर सैंकड़ों निहत्थे प्रदर्शनकारियों की घेर कर बर्बर पिटाई तक के जरिए, इस विशाल जनसमूह को तितर-बितर कर भगाने की कोशिश की, उसने राजधानी में संसद पर किसी भी प्रदर्शन पर सबसे भीषण दमनचक्र का रिकार्ड तो बना दिया, जिसमें सौ से ज्यादा घायल तो राजधानी के सिर्फ दो केंद्र सरकार के अस्पतालों में ही उपचार के लिए भर्ती कराए गए थे। इनमें एक छात्रा की हालत तो इतनी खराब है कि उसे वेंटीलेटर पर रखा जा रहा है। लेकिन, यह सारा दमनचक्र भी जंतर-मंतर, कनॉट प्लेस तथा संसद के गिर्द के शेष इलाके को देर रात तक भी, प्रदर्शनकारियों से पूरी तरह से खाली नहीं कर पाया। यहां तक कि धरने के जिस मुख्य मंच को तथा उसके नजदीक के वामपंथी छात्र संगठनों के उप-मंचों को, प्रदर्शनकारियों पर अपनी चढ़ाई के क्रम में पुलिस ने पूरी तरह से तोड़-फोड़ दिया था और इलाके पर अपने पूरे कब्जे का ऐलान कर दिया था, देर शाम तक वहां एक बार फिर प्रदर्शनकारी जमा हो चुके थे और मंच की फौरी मरम्मत के साथ, धरने के जारी रहने की घोषणा की जा चुकी थी। इससे पहले, सोनम वांगचुक की संसद मार्च पर पुलिस दमन के खिलाफ अस्पताल में अपना आमरण अनशन आगे जारी रखने की घोषणा आ चुकी थी। देर रात को सीपीआई (एम) महासचिव, एमए बेबी समेत कई नेता व सांसद भी वहीं धरने में शामिल होकर, धरने की निरंतरता पर मोहर लगा चुके थे। दूसरी ओर, जैसी कि उम्मीद की जा रही थी, मानसून सत्र के पहले ही दिन, दोनों सदनों में विपक्षी नेताओं ने जोर-शोर से युवाओं की मांगों के और उनके संसद मार्च पर बर्बर पुलिस दमन के मुद्दों का उठाया।
और जैसा कि मोदी राज में कायदा ही बन गया है, सरकार ने तथा उसके इशारे पर सभापतियों ने इस मुद्दे पर फौरन चर्चा कराने से इंकार कर दिया, पहले ही दिन संसद की कार्रवाई इस हंगामे के चलते बार-बार स्थगित करनी पड़ी। एक और संबंधित घटना विकास में, जिसमें बहुत ज्यादा अर्थ पढ़ना शायद अभी जल्दबाजी ही होगी, जंतर-मंतर पर महीने भर से चल रहे धरने तथा भूख हड़ताल के अस्तित्व और युवाओं के आंदोलन को मोदी सरकार ने कम से कम पहचाना तो सही। मोदी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री और पूर्व-भाजपा अध्यक्ष, जेपी नड्डा से कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने उनके सरकारी आवास पर मुलाकात की और उन्हें मार्च का पांच सूत्री मांगपत्र दिया। सभी जानते हैं कि इस मार्च का आह्वान, नीट पर्चा लीक सहित केंद्रीयकृत परीक्षाओं में गड़बड़ियों समेत, विशेष रूप से सार्वजनिक शिक्षा की बढ़ती दुर्दशा की जिम्मेदारी के प्रतीक में रूप में, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर जंतर-मंतर पर महीने भर से जारी धरने की ओर से किया गया था। धरने के दूसरे सप्ताह से सोनम वांगचुक तथा वामपंथी छात्र नेताओं के भूख हड़ताल शुरू करने से आंदोलन में और तेजी आई। प्रधान के इस्तीफे समेत एनटीए के भंग किए जाने आदि पांच मांगों को लेकर, कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा जंतर-मंतर पर जारी धरने की ओर से एक मांगपत्र भी जारी किया गया था, जिसे व्यापक समर्थन मिला। वामपंथी छात्र संगठन एसएफआई, आईसा तथा एआईएसएफ, छात्रों-युवाओं के सबसे ज्वलंत मुद्दों को विचार के केंद्र में लाने के प्रयास की अभिव्यक्ति के रूप में, इस नवगठित पार्टी के आंदोलनात्मक कार्यक्रम के साथ शुरूआत से ही जुड़े रहे थे, जबकि युवाओं, मजदूरों, किसानों, महिलाओं आदि के जनसंगठनों की एकजुटता उसे हासिल रही थी।
नीट पेपर लीक की बाईस लाख छात्रों को सीधे और उसके फौरन बाद सीबीएसई परीक्षा कापी जांच की इससे कुछ ही कम छात्रों को प्रभावित करने वाली गड़बड़ियों ने, परीक्षा व्यवस्था तथा शिक्षा मंत्रालय की घोर अक्षमताओं को उजागर करने के साथ ही, शिक्षा व्यवस्था के तेजी से बढ़ते संकट की ओर पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया था। मोदीशाही द्वारा शिक्षा के बाजारीकरण, केंद्रीकरण तथा सांप्रदायीकरण के लिए दरवाजे चौपट खोले जाने से, यह संकट बहुत ही तेजी से बढ़ रहा है। और रोजगार के बढ़ते संकट के साथ जुड़कर यह, युवाओं के भविष्य के लिए एक खौफनाक संकट का रूप ले लेता है। शिक्षा व रोजगार के जुड़वां संकट के संदर्भ में, नीट पेपर लीक के बाद से ही वामपंथी व अन्य छात्र व युवा संगठनों ने और विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने भी, देश भर में अभियान छेड़ रखा था। विपक्षी राजनीतिक पार्टियों में भी वामपंथ के अलावा सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी, कांग्रेस ने इस मुद्दे पर खासतौर पर पहल की थी। लोकसभा में विपक्ष के नेता, राहुल गांधी इस अभियान में विशेष रूप से रुचि ले रहे थे। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग भी इसी अभियान में से निकली थी। बहरहाल, कॉकरोच जनता पार्टी ने जब अपनी पहली मैदानी कार्रवाई के लिए इसे केंद्रीय मुद्दा बनाया, उसे सोशल मीडिया आदि डिजिटल माध्यमों से जुड़ी नयी पीढ़ी के बीच विशेष रूप से समर्थन आधार हासिल होने से, इस मुद्दे को जिस तरह देश की राजनीति के केंद्र में लाना और मोदीशाही को उसकी भारी विफलताओं के लिए घेरना संभव हुआ, इससे पहले संभव नहीं था। 20 जुलाई के संसद मार्च ने बलपूर्वक इस सच्चाई को उजागर कर दिया है और इस सच्चाई को और पुख्ता भी कर दिया है। यह संयोग ही नहीं है कि एक आमतौर पर सत्ता पक्ष समर्थक रुख अपनाने वाले, बहुसंस्करणीय हिंदी दैनिक ने अपनी सुर्खी में रेखांकित किया है कि, "2012 के अभया प्रकरण के पूरे 14 साल बाद राजधानी में इतना बड़ा प्रदर्शन हुआ है।
" 20 जुलाई के संसद मार्च से ठीक पहले, संसद मार्च के दौरान और संसद मार्च के बाद भी, विपक्षी पार्टियों ने व्यवहार में, इस युवा उबाल का पूरी तरह से साथ देने की ही तत्परता दिखाई दी है। यहां तक कि शिक्षा के ही मुद्दे पर अपना स्वतंत्र अभियान चला रही, मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के रुख में शुरूआत में कुछ हिचक दिखाई भी दे रही थी, तो वह संसद मार्च तक आते-आते कमोबेश दूर हो चुकी थी। राहुल गांधी तथा प्रियंका गांधी समेत, कांग्रेस के अनेक नेताओं का संसद मार्च के अगले ही दिन, युवाओं पर पुलिस के जोर-जुल्म के खिलाफ प्रधानमंत्री के आवास पर विरोध धरना देना, इसी का संकेतक है। फिर भी, जंतर-मंतर धरने के एक महीने के दौरान, सत्ताधारी संघ-भाजपा के प्रचार तंत्र ने जिस तरह विपक्ष को और खासतौर पर कांग्रेस को, इस नयी ऊर्जा के खिलाफ खड़ा करने की कोशिशें की हैं, विपक्षी ताकतें उन्हें अपने नुकसान की कीमत पर ही अनदेखा कर सकती हैं।
परंपरागत राजनीति से भिन्नता, कॉकरोच जनता पार्टी जैसी परिघटनाओं की विशिष्ट शक्ति है, उसे अपना विरोधी बनाकर मोदीशाही के पाले में धकेलने के बजाय, विपक्ष को उसके साथ सहयोग के तरीके निकालने होंगे। तभी वह भारतीय धर्मनिरपेक्ष, जनतंत्र की रक्षा के अपने संघर्ष के साथ, इस नयी सामने आ रही युवा ऊर्जा को जोड़ सकेगा। वामपंथी पार्टियों तथा अन्य विपक्षी पार्टियों की भी पहल पर, देश के अनेक हिस्सों में 20 जुलाई के संसद मार्च के समर्थन में और उस पर पुलिस जुल्मों के खिलाफ, जो जोरदार प्रदर्शन हुए हैं, उनसे मोदीशाही को अवश्य चिंता होगी। मोदीशाही को शायद इससे भी ज्यादा चिंता इससे होगी कि 20 जुलाई के संसद मार्च के दिन, उसके संसद के गिर्द काफी बड़े इलाके में फोन-इंटरनैट-बंद करने के बावजूद, थोड़ी देरी से ही सही, उसकी पुलिस की कलंक गाथा, सारी दुनिया ने देखी है और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने विस्तार से दिखाई है, जिससे गोदी मीडिया के जरिए सच्चाई को दबाने के उसके पूरे उद्यम की उपयोगिता काफी घट जाती है। यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों तक की इस ओर नजर गयी है। ह्यूमन राइट्स वॉच की डिप्टी एशिया डायरेक्टर का बयान इसका गवाह है। विभिन्न देशों में इस दमन के खिलाफ उल्लेखनीय विरोध प्रदर्शन भी हुए हैं। युवाओं के आक्रोश से मोदीशाही ने राहत की सांस ली भी नहीं होगी, तब तक पश्चिम से किए जा रहे व्यापार समझौतों से आशंकित किसान बार्डर पर आ पहुंचे हैं। इस सबसे पहले, खासतौर पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तथा आम तौर पर उत्तरी भारत में, गैर-यूनियन-बद्घ मजदूरों का अपनी दयनीय कार्यस्थितियों के खिलाफ लगभग स्वत:स्फूर्त विस्फोट सामने आया था। लगता है कि अपनी विभाजनकारी राजनीति से लेकर, मीडिया पर मुकम्मल नियंत्रण तक के बल पर, मोदीशाही ने आम देशवासियों की बढ़ती बदहाली को लीप-पोत कर छुपाने का जो बंदोबस्त किया था, वह लीपा हुआ अब दरक रहा है और हर तबका अपनी दुर्दशा की कहानी के साथ सामने आ रहा है। क्या यह मोदी राज के अंत की शुरूआत नहीं है? *(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)