चीनी की मिठास पर महंगाई की कड़वाहट, आखिर क्यों बढ़ रहे हैं इसके दाम?

Aug 23, 2026 - 20:53
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चीनी की मिठास पर महंगाई की कड़वाहट, आखिर क्यों बढ़ रहे हैं इसके दाम?

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चीनी की मिठास पर महंगाई की कड़वाहट, आखिर क्यों बढ़ रहे हैं इसके दाम?

-सुनील कुमार महला

देश में चीनी की कीमतों में इन दिनों काफी बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है और चीनी के प्रति किलो के दाम 60 रुपए प्रति किलो या इससे ज्यादा तक पहुंच गये हैं। इस क्रम में यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि चीनी की कीमतों में अचानक हुई बढ़ोतरी चिंता का विषय जरूर है, लेकिन फिलहाल स्थिति बहुत गंभीर नहीं है।इस संबंध में यहां पर पाठकों को बताता चलूं कि त्योहारी सीजन को देखते हुए सरकार ने 31 अक्तूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। इससे बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। अच्छी बात यह भी है कि सरकार ने जमाखोरी और कालाबाजारी रोकने के लिए भंडारण सीमा भी सख्त की है।

आखिर क्यों बढ़ रही चीनी की कीमतें:- यहां पर यह सवाल जरूर उठता है कि जब देश में चीनी की कमी नहीं है, तो कीमतें इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही हैं। इसके पीछे गन्ने के उत्पादन में कमी, गन्ने का अधिक हिस्सा इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होना या गन्ने की खेती का पर्याप्त विस्तार न होना जैसे कारण हो सकते हैं। वास्तव में देश में चीनी उत्पादन में कमी,खराब मौसम और कम बारिश,त्योहारी सीजन में मांग बढ़ना,भंडार में कमी और जमाखोरी की आशंका,वैश्विक बाजार में आपूर्ति का दबाव तथा गन्ने से इथेनॉल बनाने की नीति को भी चीनी कीमतों की चर्चा में प्रमुखता मिली है, जिसके कारण चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि मौजूदा कीमत वृद्धि का मुख्य कारण इथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन नहीं है। गाड़ियों में इथेनॉल का इस्तेमाल भी एक कारण ?

पाठक जानते होंगे कि हमारे देश में गाड़ियों में इथेनॉल का इस्तेमाल मुख्यतः पेट्रोल में मिलाकर किया जा रहा है। इसे इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (ईबीपी) कहा जाता है। हमारे देश में स्थिति की बात करें तो ई-20 पेट्रोल यानी 20% इथेनॉल तथा 80% पेट्रोल अब भारत में पेट्रोल का प्रमुख मानक मिश्रण है। जानकारी के अनुसार वर्ष 2025-26 में औसत इथेनॉल मिश्रण लगभग 20% तक पहुंच गया है।अप्रैल 2026 से बीएस-VI वाहनों के लिए ई-20 उत्सर्जन मानकों को पूरा करना अनिवार्य किया गया है। वास्तव में, इथेनॉल मिश्रण का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, विदेशी मुद्रा बचाना, किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराना और कार्बन उत्सर्जन घटाना है। सरकार के अनुसार ईबीपी कार्यक्रम से अब तक लगभग ₹1.97 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा बचत हुई है। संक्षेप में कहें तो हमारे देश भारत पेट्रोल वाहनों को धीरे-धीरे इथेनॉल आधारित ईंधन की ओर ले जा रहा है। आज की स्थिति में ई-20 सामान्य पेट्रोल व्यवस्था का हिस्सा है। ऐसे में कृषि और पेट्रोलियम मंत्रालय को मिलकर इन पहलुओं की समीक्षा जरूर करनी चाहिए। इथेनॉल की बढ़ती मांग को देखते हुए गन्ने का उत्पादन भी बढ़ाना जरूरी है, ताकि चीनी और इथेनॉल दोनों की जरूरत पूरी हो सके और किसानों को भी बेहतर लाभ मिले।

हमारे देश में चीनी उत्पादन:- बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि भारत दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक देशों में है। 2025-26 चीनी सत्र में भारत का चीनी उत्पादन लगभग 306 लाख टन (3.06 करोड़ टन) रहने का अनुमान है, जो शुरुआती अनुमान से करीब 11 प्रतिशत कम है। उत्पादन में कमी का असर घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ा है। इस बीच, इथेनॉल उत्पादन के लिए भी गन्ने से प्राप्त चीनी का एक हिस्सा इस्तेमाल किया जाता है और हाल फिलहाल कमी को देखते हुए सरकार ने घरेलू आपूर्ति बनाए रखने के लिए, जैसा कि ऊपर भी इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं कि, शुल्क-मुक्त चीनी आयात की अनुमति भी दी है। उक्त संदर्भ में यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि देश में गेहूं, चावल, सब्जी, फल और दूध जैसे कई खाद्य पदार्थों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ी है। लेकिन दाल और खाद्य तेल के मामले में अभी भी आयात पर निर्भरता है। दालों की बढ़ती मांग और खाद्य तेल की लगभग आधी जरूरत ही देश में पूरी होना चिंता का विषय है। इसलिए सरकार को केवल मौजूदा महंगाई नियंत्रित करने पर ही नहीं, बल्कि इन आवश्यक खाद्य पदार्थों का उत्पादन बढ़ाने पर भी ध्यान देना चाहिए। अंत में कुल मिलाकर यही कहूंगा कि चीनी का मौजूदा संकट बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन सरकार को समय रहते सतर्क रहना होगा। जमाखोरी और कालाबाजारी पर कड़ी नजर के साथ अफवाहों को रोकना भी जरूरी है, क्योंकि कई बार अफवाहों के कारण भी बाजार में अनावश्यक महंगाई बढ़ जाती है। साथ ही, लोगों को भी जरूरत के मुताबिक ही खरीदारी और खपत करनी चाहिए। इस संबंध में चीनी के विकल्पों को भी तलाश किया जाना चाहिए। वास्तव में, गुड़,शहद,खजूर या खजूर का पेस्ट (मिठाइयों, शेक, बेकिंग और लड्डू आदि में उपयोगी),नारियल/पाम शुगर तथा फलों की प्राकृतिक मिठास (केला, खजूर, सेब आदि का इस्तेमाल) इसके विकल्प हो सकते हैं।

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SuragBureau

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