जड़ों से जुड़े, आकाश की ओर

Sep 18, 2026 - 08:30
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जड़ों से जुड़े, आकाश की ओर

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जड़ों से जुड़े, आकाश की ओर

◆ डॉ. विवेकानंद उपाध्याय

 भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम और समृद्धतम संस्कृतियों में से एक है। यह केवल खान-पान, वेशभूषा या त्योहारों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण जीवन-दर्शन है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' अर्थात् पूरा विश्व एक परिवार है और 'सत्यम् शिवम् सुन्दरम्' जैसे शाश्वत सिद्धांत इसी दर्शन की नींव हैं। यह संस्कृति हमें सहिष्णुता, सम्मान, त्याग और कर्तव्य का पाठ पढ़ाती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता विविधता में एकता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भाषा, भोजन, वेशभूषा और संगीत बदल जाता है, पर अतिथि-सत्कार, परिवार का सम्मान और बड़ों के प्रति आदर का भाव एक जैसा रहता है। यहाँ मनाया जाने वाला हर त्योहार केवल उल्लास का अवसर नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के अटूट संबंध का उत्सव है।

योग, आयुर्वेद और अध्यात्म ने आज पूरी दुनिया को भारत की ओर आकर्षित किया है। यह संस्कृति तोड़ना नहीं, जोड़ना सिखाती है। लेकिन आज इस महान विरासत की सबसे बड़ी उत्तराधिकारी युवा पीढ़ी एक चौराहे पर खड़ी है, जहाँ एक ओर हजारों वर्ष पुरानी परम्पराएँ हैं और दूसरी ओर वैश्वीकरण और डिजिटल क्रांति की तेज रफ्तार दुनिया। आज का युवा वैश्विक नागरिक है। उसके हाथ में मौजूद मोबाइल में पूरी दुनिया सिमटी हुई है। सोशल मीडिया, पाश्चात्य फिल्में और उपभोक्तावादी संस्कृति ने उसके सोचने और जीने के तरीके को गहराई से बदला है। कई बार आधुनिकता की अंधी दौड़ में वह अपनी ही संस्कृति को पिछड़ा हुआ समझने की भूल कर बैठता है। अंग्रेजी बोलना आधुनिकता का प्रतीक और अपनी मातृभाषा में बात करना संकोच का विषय समझा जाने लगा है। फास्ट फूड का आकर्षण घर के बने सात्विक भोजन पर भारी पड़ रहा है।

संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवारों में बदल रहे हैं, जिसके कारण दादा-दादी की गोद में सुनी जाने वाली कहानियों से मिलने वाले संस्कार कहीं खोते जा रहे हैं। रील और लाइक्स की होड़ में धैर्य, गंभीर चिंतन और मानवीय संबंध कमजोर होते जा रहे हैं। यह एक वास्तविक संकट है कि हम तकनीक का उपयोग तो कर रहे हैं, पर धीरे-धीरे उसके अधीन भी होते जा रहे हैं। परन्तु यह कहना कि युवा पीढ़ी पूरी तरह अपनी संस्कृति से विमुख हो गई है, सच्चाई का केवल आधा हिस्सा है। सिक्के का दूसरा पहलू कहीं अधिक आशावादी और प्रेरणादायक है। आज का युवा ही है जो जिम से अधिक योग को अपना रहा है और उसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना रहा है। वही युवा संस्कृत के मंत्रों और श्लोकों को सोशल मीडिया पर लोकप्रिय बना रहा है। देशभर में उभरते लोक संगीत और शास्त्रीय नृत्य के फ्यूजन बैंड, हैंडलूम और खादी को गर्व के साथ फैशन के रूप में अपनाना और अपने गाँव, अपनी बोली तथा अपनी जड़ों की कहानियों पर यूट्यूब चैनल शुरू करना, यह सब नया भारत का युवा ही कर रहा है। वह अपनी संस्कृति को संग्रहालय में रखी किसी प्राचीन वस्तु की तरह नहीं देखता, बल्कि उसे जीने योग्य और गर्व करने योग्य जीवनशैली के रूप में प्रस्तुत कर रहा है।

वह परम्परा को आँख बंद करके नहीं अपनाता, बल्कि तर्क, विज्ञान और गर्व के साथ अपनाता है। उसके लिए संस्कृति बोझ नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है। इसलिए आवश्यकता अतीत और भविष्य में से किसी एक को चुनने की नहीं, बल्कि दोनों के बीच सुंदर संतुलन साधने की है। आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को काटना नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को और मजबूत करके आकाश को छूना है। इस संतुलन को बनाने के लिए हम सभी को मिलकर काम करना होगा। संस्कारों की पहली पाठशाला परिवार ही है, इसलिए परिवार को बच्चों को कहानियों, त्योहारों के वास्तविक महत्व और अपनी मातृभाषा से जोड़ना होगा। उन्हें यह समझाना होगा कि बड़ों के पैर छूना पिछड़ापन नहीं, बल्कि कृतज्ञता और सम्मान का भाव है। वहीं हमारी शिक्षा प्रणाली में भी तकनीक के साथ-साथ नैतिक शिक्षा और भारतीय ज्ञान परम्परा को शामिल करना होगा, ताकि जब युवा को यह पता चले कि शून्य का आविष्कार और योग का ज्ञान भारत ने दुनिया को दिया है, तो उसका आत्मविश्वास और बढ़े। अंत में सबसे बड़ी जिम्मेदारी स्वयं युवा की है। उसे यह समझना होगा कि वैश्विक बनने के लिए अपनी पहचान मिटाना आवश्यक नहीं है। अपनी संस्कृति को जानना और अपनाना ही उसे दुनिया की भीड़ में सबसे अलग और विशेष बनाता है। भारतीय संस्कृति कोई ठहरा हुआ तालाब नहीं, बल्कि बहती हुई अविरल नदी है जो हर युग में नया रूप लेती है और स्वयं को और समृद्ध करती है। युवा पीढ़ी उस नदी की नई, तेजस्वी धारा है। यदि यह धारा अपनी विरासत के संस्कारों और मूल्यों से जुड़ी रही, तो यह न केवल भारत को, बल्कि पूरे विश्व को एक नई और सकारात्मक दिशा दे सकती है। हमें ऐसा युवा तैयार करना है जो केवल पश्चिम की नकल न करे, बल्कि जिसके पास भारतीय आत्मा और वैश्विक दृष्टि दोनों हों।

 *(वरिष्ठ स्तम्भकार, असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान, देवरिया, उत्तर प्रदेश)*

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SuragBureau

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