राष्ट्रीय सम्मेलनः समकालीन, समय, समाज और सरोकारों पर मंथन

Mar 31, 2026 - 16:01
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राष्ट्रीय सम्मेलनः समकालीन, समय, समाज और सरोकारों पर मंथन
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राष्ट्रीय सम्मेलनः समकालीन, समय, समाज और सरोकारों पर मंथन

 - डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग की ओर से प्रो यशवंत वीरोदय के संयोजकत्व में राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन संपन्न। - वक्ताओं, प्रतिनिधियों और शोधकर्ताओं ने की समकालीन समय, समाज और साहित्यः विमर्श, संवेदना, दिव्यांगता पुनर्वास एवं सामाजिक दायित्व विषय पर चर्चा लखनऊ। डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग क ओर से “समकालीन समय, समाज और साहित्यः विमर्श, संवेदना, दिव्यांगता पुनर्वास एवं सामाजिक दायित्व” विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन हुआ। विवि परिसर स्थित कृत्रिम अंग एवं पुनर्वास केंद्र सभागार में दिनभर चले शैक्षणिक सत्रों के बाद समापन सत्र में आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में साहित्य और समाज के विविध आयामों पर गहन विमर्श देखने को मिला।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश के राज्य दिव्यांगजन आयुक्त प्रो. हिमांशु शेखर झा ने कहा कि दिव्यांगजन केवल सहानुभूति के नहीं, बल्कि समान अवसर और सम्मानजनक भागीदारी के अधिकारी हैं। हमें यह समझना होगा कि समावेशी समाज केवल नीतियों से नहीं, बल्कि सोच और व्यवहार के परिवर्तन से निर्मित होता है। शिक्षा, साहित्य और सामाजिक संस्थाएं इस परिवर्तन की धुरी हैं। यदि हम दिव्यांगजनों को मुख्यधारा में लाने के लिए ठोस और निरंतर प्रयास करें, तो वे समाज के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। साहित्यकारों और शिक्षाविदों की जिम्मेदारी है कि वे अपने लेखन और कार्यों के माध्यम से इस संवेदनशीलता को समाज में व्यापक रूप से स्थापित करें। दिव्यांगजन को अवसर मिलने पर हर क्षेत्र में विश्व में देश का मान बढ़ा रहे हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री विद्या विन्दु सिंह ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति ऐतिहासिक रूप से जटिल रही है।

आधुनिक समय में महिलाओं ने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं, फिर भी सामाजिक दृष्टिकोण में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है। साहित्य हमेशा से समाज का दर्पण रहा है और इसने महिलाओं के संघर्ष, संवेदना और सशक्तिकरण की यात्रा को अभिव्यक्त किया है। आज जरूरत है कि हम साहित्य के माध्यम से लैंगिक समानता, सम्मान और संवेदनशीलता के मूल्यों को और अधिक सशक्त करें, ताकि एक संतुलित और न्यायपूर्ण समाज का निर्माण हो सके। विशिष्ट अतिथि दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग उत्तर प्रदेश के उप निदेशक डॉ. अमित कुमार राय ने कहा कि दिव्यांगता को केवल एक शारीरिक या मानसिक स्थिति के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संरचनाओं और दृष्टिकोण से भी गहराई से जुड़ा विषय है। सरकार द्वारा अनेक योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन इनका वास्तविक लाभ तभी संभव है जब समाज में सकारात्मक सोच और सहयोग की भावना विकसित हो। हमें दिव्यांगजनों के लिए न केवल अवसर प्रदान करने हैं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए आवश्यक संसाधन और वातावरण भी उपलब्ध कराना है।

साहित्य और शिक्षा इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह विश्वविद्यालय ज्वलंत उदाहरण है। किस तरह से यहां सभी बच्चे एक की क्लास में एक साथ एक समान रूप से शिक्षा ग्रणह कर रहे हैं। विशिष्ट अतिथि लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. कालीचरण स्नेही ने कहा कि दलित और आदिवासी समुदाय लंबे समय से सामाजिक और आर्थिक विषमताओं का सामना कर रहे हैं। इन वर्गों की समस्याओं को समझने और उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए केवल नीतिगत प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि सामाजिक चेतना का जागरण भी जरूरी है। साहित्य इस चेतना को जागृत करने का सशक्त माध्यम है। लेखकों और कवियों को चाहिए कि वे अपने सृजन के माध्यम से हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज को बुलंद करें और समाज में समानता एवं न्याय के मूल्यों को स्थापित करें। विशिष्ट अतिथि बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. राम पाल गंगवार ने कहा कि वर्तमान समय में अस्मिता का प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। कई समुदाय अपनी पहचान और अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। साहित्य इन संघर्षों का दस्तावेज भी है और मार्गदर्शक भी। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि साहित्य केवल अभिव्यक्ति का माध्यम न रहकर सामाजिक परिवर्तन का उपकरण बने। अस्मिता के सम्मान और विविधता के स्वीकार के बिना कोई भी समाज प्रगतिशील नहीं हो सकता। शकुन्तला विवि में भाषा संकाय के अधिष्ठाता प्रो. वी.के. सिंह ने कहा कि जब साहित्य, शिक्षा और सामाजिक मुद्दे एक मंच पर आते हैं, तो एक व्यापक और सार्थक संवाद स्थापित होता है।

विश्वविद्यालय का प्रयास है कि ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों और शोधार्थियों को न केवल ज्ञान मिले, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उनकी समझ भी विकसित हो। *यह रहे प्रमुख आकर्षण* सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विद्वानों ने व्याख्यान व्याख्यान दिए, शोधकर्ताओं ने शोध पत्रों की प्रस्तुतियां दी। इनमें न्यू जर्सी अमेरिका से अंतरराष्ट्रीय हिन्दी समिति न्यू जर्सी चैप्टर के अध्यक्ष रामबाबू गौतम, नॉर्वे से आए भारतीय-नॉर्वेजियन सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम के अध्यक्ष डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ व थाइलैंड के चार शोधकर्ता शामिल रहे। युवा शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए विशेष अकादमिक सत्र आयोजित किए गए। प्रतिभागियों को सहभागिता/प्रस्तुति प्रमाण-पत्र वितरित किए गए। *अजब हालात बनते जा रहे हैं अब सियासत में... सुनाकर लूटी वाहवाही* -हंसी, व्यंग्य और संवेदना से गूंज उठा कवि सम्मेलन, श्रोताओं ने ठहाकों और तालियों से गूंजा सभागार समापन सत्र में आयोजित कवि सम्मेलन में जब मंच सजा तो शब्दों की ऐसी रंगीन बौछार हुई कि श्रोता कभी हंसी से लोटपोट हुए तो कभी गहरे भावों में डूब गए। समसामयिक मुद्दों, महंगाई, प्रेम और राजनीति पर कवियों ने अपनी तीखी और चुटीली पंक्तियों से माहौल को जीवंत बनाया। संचालन कर रहे कवि पंकज प्रसून ने महंगाई पर तंज कसते हुए पेट्रोल और गैस सिलेंडर को ‘खजाना’ बताते हुए ऐसी पंक्तियां सुनाईं कि पंडाल ठहाकों से गूंज उठा।

“पेट्रोल पंप पर मेरी टंकी जो फुल हुई, ऐसा लगा कि जख्म पुराना हो सिल गया...” तिजोरी से भी ज़्यादा, अब हिफ़ाज़त इसकी करनी है, सिलेंडर क्या मिला, जैसे कि ख़ज़ाना हो मिल गया... सुनाकर श्रोताओं को हंसाया। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि कालीचरण स्नेही ने विमर्श परक कविताओं का पाठ किया। उन्होंने आ उतरे लै लेखनी,लिखने को जगपीर, बदलेंगे हम एक दिन दुनिया की तस्वीर, तप अनुभव की आंच में,पी जगती का ताप, करत उजागर लेखनी ,सदियों का संताप..सुनाई। वहीं शिखा श्रीवास्तव ने “न पूछो प्यास मिट्टी की, जो बरसें प्रेम की बूंदें, चटकती भूमि के भीतर मिलन की भोर हो जाए...” सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। अभिश्रेष्ठ तिवारी ने “ सब अपने हादसों पे शेर कहना चाहते है, मैं शेर कहता था और हादसा बनाता था...” सुनाया। मानक मुकेश ने व्यंग्य का तड़का लगाते हुए सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों पर चुटीले अंदाज में कटाक्ष किया।

उन्होंने “सुबह को रात, रात को कह साँझ रहे हैं, तलवार हवाओं में लिए भांज रहे हैं, प्रेशर में जिनके रहता है पूरा ही महकमा, वो घर की रसोई में कुकर माँज रहे हैं...” सुनाकर जमकर तालियां बटोरी। राजनीतिक व्यंग्य की धार लेकर मंच पर आए अशोक झंझटी ने वर्तमान सियासत पर करारा प्रहार किया। उनकी “अजब हालात बनते जा रहे हैं अब सियासत में, गधे मिलजुल पंजीरी खा रहे हैं अब सियासत में, कहीं पर धर्म का छाता, कहीं मज़हब की चादर है, यही ओढ़े बिछाये जा रहे हैं अब सियासत में…पंक्तियों पर सभागार तालियों से गूंज उठा।