शून्यता का प्रकाश

Apr 19, 2025 - 07:32
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शून्यता का प्रकाश

मनुष्य का अस्तित्व एक गूढ़ रहस्य है, जिसे समझने का प्रयास उसने युगों से किया है। हम जितना इस रहस्य को सुलझाने की कोशिश करते हैं, उतना ही यह और गहरा होता जाता है । हमारे भीतर एक असीम शून्यता है, जिसे हम अक्सर डर के रूप में देखते हैं, लेकिन वास्तव में यही शून्यता हमारे होने की पहचान है। जब हम स्वयं को किसी भी विशेषता, किसी भी पहचान से मुक्त कर देते हैं, तभी हम अपने वास्तविक स्वरूप में आते हैं।

यह विचार सुनने में विरोधाभासी लगता है, लेकिन यही जीवन का सबसे मौलिक सत्य है- कुछ भी नहीं होना, वास्तव में कुछ होना है। जब हम अपने अस्तित्व को बाहरी चीजों से जोड़ते हैं, तो हम अनजाने में स्वयं को सीमाओं में बांध लेते हैं । हम यह मान लेते हैं कि हमारी पहचान हमारे नाम, पद, रिश्तों, उपलब्धियों और भौतिक वस्तुओं में निहित है। मगर जब हम इन सबसे मुक्त होकर स्वयं को देखते हैं, तो हमें अनुभव होता है कि हम केवल बाहरी पहचान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हम अनंत हैं। हमारे भीतर एक व्यापक आकाश है, जो हर सीमा से परे है। यह आकाश तभी प्रकट होता है, जब हम अपने मन को समस्त पूर्वाग्रहों, आकांक्षाओं और अहंकार से रिक्त कर देते हैं । यह शून्यता कोई अभाव नहीं, बल्कि अनंत संभावनाओं से भरी हुई अवस्था है। भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में इस शून्यता को महत्त्व दिया गया है। योग और ध्यान की विधियां इसी ओर इशारा करती हैं- मन को शून्य बनाओ, विचारों के भार मुक्त हो जाओ और तब तुम अपने वास्तविक स्वरूप को जान पाओगे । बौद्ध धर्म में 'शून्यवाद' की अवधारणा भी इसी ओर संकेत करती है कि जब तक मनुष्य स्वयं को 'कुछ' मान कर चल रहा है, तब तक वह बंधनों में है, लेकिन जब वह स्वयं को 'कुछ भी नहीं' मानता, तब ही वह सच्ची मुक्ति प्राप्त करता है।

 इसका तात्पर्य यह नहीं कि व्यक्ति का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, बल्कि वह सीमित 'मैं' से निकल कर असीमित 'हम' में परिवर्तित हो जाता है। जीवन में जो कुछ भी नया जन्म लेता है, वह पहले शून्यता में ही विद्यमान होता है। जब कोई कलाकार एक नई रचना करता है, तो वह पहले अपनी चेतना को विचारों की भीड़ से मुक्त करता है। जब कोई कवि कविता लिखता है, तो वह पहले स्वयं को शब्दों के बोझ से खाली करता | जब कोई ऋषि ध्यान में बैठता है, तो वह पहले अपने मन को समस्त विचारों से मुक्त करता है । यह शून्यता ही निर्माण की पहली अवस्था है। अगर हमारा मन पहले से ही विचारों और धारणाओं से भरा होगा, तो उसमें कोई नया विचार जन्म नहीं ले सकता। इसलिए, 'कुछ नहीं होना' सृजन का पहला चरण है। यह विचार केवल व्यक्तिगत स्तर पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक और वैश्विक स्तर पर भी लागू होता है। जब समाज स्वयं को एक निश्चित पहचान में सीमित कर लेता है, तो वह संकीर्णता में फंस जाता है। जब कोई राष्ट्र स्वयं को किसी विशेष संस्कृति या परंपरा तक सीमित कर लेता है, तो वह अपनी व्यापकता को खो देता है । इसी कारण महान सभ्यताएं तब तक फली फूलीं, जब तक वे बाहरी प्रभावों के लिए खुली रहीं, लेकिन जैसे ही वे अपने को पूर्ण मानने लगीं, वैसे ही उनका पतन शुरू हो गया।

इतिहास गवाह है कि जो भी समाज स्वयं को 'कुछ' मान कर चलता है, वह स्थिर हो जाता है और धीरे - धीरे समाप्त हो जाता है। मगर जो समाज स्वयं को 'कुछ नहीं' मान कर परिवर्तनशील रहता है, वही अनंत काल तक जीवित रहता है। व्यक्तिगत जीवन में भी यह नियम लागू होता है। जब हम अपने अहंकार से मुक्त हो जाते हैं, तभी हम सच्चे आनंद का अनुभव कर पाते हैं । अहंकार हमें सीमित करता है, जबकि शून्यता हमें अनंत विस्तार देती है । यह अहंकार ही है जो हमें दूसरों से तुलना करने पर मजबूर करता है। हम सोचते हैं कि हमें अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति से आगे निकलना है और अपने से निम्न व्यक्ति से ऊपर बने रहना है। लेकिन यह पूरी सोच ही त्रुटिपूर्ण है । जब हम इस तुलना से बाहर निकल आते हैं, तब हमें यह अनुभव होता है कि हम स्वयं में पूर्ण हैं, हमें किसी प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता नहीं । यह विचार हमारे दैनिक जीवन में भी लागू होता है। जब हम किसी विषय में विशेषज्ञ बनना चाहते हैं, तो हमें पहले अपने पूर्वाग्रहों को छोड़ना पड़ता है। जब कोई वैज्ञानिक नई खोज करता है, तो वह पुराने सिद्धांतों को पहले चुनौती देता | जब कोई विद्यार्थी नया ज्ञान प्राप्त करता है, तो उसे पहले अपने पुराने ज्ञान को छोड़ना पड़ता । यह 'शून्यता' की प्रक्रिया हर जगह देखी जा सकती है। प्रकृति भी हमें यही सिखाती है। जब कोई वृक्ष पुराने पत्तों को गिरा देता है, तभी उसमें नए पत्ते आते हैं।

जब नदी अपने बहाव में रुक जाती है, तो वह सड़ने लगती है, लेकिन जब वह अपने जल को बहाती रहती है, तो वह निर्मल बनी रहती है। हम एक ऐसे दौर में हैं, जहां हर व्यक्ति स्वयं को किसी न किसी रूप में परिभाषित करने में लगा हुआ है। सोशल मीडिया पर हर कोई अपनी पहचान बनाने में जुटा है, लेकिन इस प्रक्रिया में वे अपने वास्तविक स्वरूप को भूलते जा रहे हैं। यह पहचान बनाने की लालसा ही हमारे भीतर असंतोष को जन्म देती है। हम दूसरों की नजरों में 'कुछ' बनने की कोशिश करते हैं, लेकिन इस प्रयास में हम अपने वास्तविक स्वरूप से दूर होते जाते हैं। अगर हम इस दौड़ से बाहर निकलकर अपने भीतर झांकें, तो हमें अनुभव होगा कि हमें कुछ बनने की जरूरत ही नहीं, क्योंकि हम पहले से ही पूर्ण हैं।

विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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