मुख्य न्यायाधीश के लिए एक खुला खत : विष्णु नागर
राजनैतिक व्यंग्य-समागम
*1. मुख्य न्यायाधीश के लिए एक खुला खत : विष्णु नागर*
मुख्य न्यायाधीश जी, आप किसी और देश, किसी और समय, किसी और ग्रह के वासी तो नहीं हैं? लगता तो कुछ ऐसा ही है। फिर मुझे अभी तक यह भ्रम क्यों था कि आप भारतीय हैं और हमारे इस समय में रह रहे हैं। अगर यह मेरा भ्रम हो, तो आप इसे कृपया दूर कीजिए। भारत के इस सामान्य नागरिक को -- जिसे पता नहीं कि वह भारतीय नागरिक माना जाता है या नहीं -- उसे माफ भी कर दीजिए! मैं उस दिन कुछ अधिक ही भ्रम में पड़ गया था, जब आपने दिल्ली पुलिस और अन्य अर्द्धसैनिक बलों द्वारा 21 जुलाई को छात्रों पर किए गए बर्बर लाठीचार्ज के विडियो देखने से साफ इंकार कर दिया था कि हमारे पास फालतू समय नहीं है। हमारा वक्त बर्बाद मत कीजिए। क्षमा कीजिए माई लॉर्ड, आपका समय तो आज ही है और आज ही उसे 'बर्बाद' या आबाद करने की छूट आपको है। कल तो समय आपको और हमें भी छोड़कर बहुत दूर चला जाएगा।पीछे मुड़कर भी नहीं देखेगा।
आप आज जहां हैं, कल वहां नहीं होंगे। उसके बाद आपके पास समय ही समय होगा, इतना अधिक समय होगा कि खर्च करते-करते भी आप ऊब जाएंगे। जितना ज्यादा उसे खर्च करेंगे, उससे ज्यादा आपके सामने वह मुंह बाये खड़ा होगा और आपसे कोंच-कोंच कर कहेगा कि मुझे खर्च करो! आप बैठे-बैठे, खाते-खाते, सोते-सोते, टीवी देखते-देखते, देश-विदेश की यात्राएं करते-करते थक जाएंगे, मगर वक्त खत्म नहीं होगा। यही नहीं, लोदी गार्डन में कभी आप टहलते पाये गए, तो थोड़े ही दिनों में वक्त इतना आगे बढ़ चुका होगा कि कोई पहचानकर भी आपको नहीं पहचानेगा। कोई दिमाग पर थोड़ा जोर डालेगा कि इन्हें कहीं देखा-सा लगता है, मगर उसे याद नहीं आएगा और वह आगे बढ़ जाएगा! आपसे पहले भी बहुत आए और आपके बाद भी बहुत आएंगे और जिनके पास भी अपने वक्त के सवालों को सुनने और देखने का वक्त नहीं था और नहीं होगा, सबकी यही दशा हुई है और होगी। दर्जनों उदाहरण तो आपके सामने हैं। कुछ महीने बाद आप भी उन्हीं उदाहरणों में एक होंगे।
प्रधानमंत्री गणेशोत्सव के समय आरती करने भी उसी के यहां जाते हैं, जो उस समय चीफ जस्टिस होता है। उसके बाद कितने ही गणेशोत्सव गुजर जाएं, अगर वह अब चीफ जस्टिस नहीं है, तो वह कितनी ही बार कितनी ही तरह से बुलाए, प्रधानमंत्री जवाब तक नहीं देते! उन्हें गणेश जी से नहीं, चीफ जस्टिस से मतलब है। केवल वही नहीं, बल्कि उनका कोई मंत्री-संत्री भी बेडमिंटन खेलने के लिए किसी न्यायाधीश को नहीं बुलाता। सब होशियार हैं और अपने समय का निवेश किसी लाभदायक जगह पर करते हैं। और यह बात मी लॉर्ड, हर चीफ़ जस्टिस के हर आराध्य पर लागू होती है। कोई अगर नरेन्द्र मोदी की मूर्ति भी घर के देवालय में रखना शुरू कर दे, तो उस पर भी यही नियम लागू होता है। उस समय मी लॉर्ड, आपके पास कोई न्याय मांगने नहीं आएगा। तब आपके पास किसी को अन्याय देने की शक्ति भी नहीं होगी। तब कोई किसी विडियो देखने के लिए आपसे आग्रह नहीं करेगा। आप स्वयं तब एक्स या इंस्टाग्राम या फेसबुक पर रील देखते पाए जाएंगे। हो सकता है, तब आपकी श्रीमती जी आप पर ताना कसें कि पहले तो आप अकड़ कर कहते थे कि मेरे पास विडियो देखने का समय नहीं है, अब दिन-रात रील में ही घुसे रहते हैं।
कुछ ख़याल भी है कि दोनों बेटियां, दामाद और उनके बच्चे हमारे यहां आए हैं और आपको रील देखने से फुरसत नहीं है! तब आपका हालचाल लेने भी शायद ही कोई आए। कोई घंटी बजाए और आप भागकर दरवाजा खोलने जाएं, तो पता चले कि अखबारवाला महीने भर के बिल का पैसा लेने आया है। धोबी प्रेस किये हुए कपड़े देने आया है। मैडम की महिला दोस्त, उनके साथ चाय पीने आई है और आप मन ही मन कुढ़ रहे हैं और अकेले बैठे अपने कमरे में चाय सुड़क रहे हैं! तब कई ऐसे भी होंगे जो आपका फोन नहीं उठाएंगे। तब कोई कराह, कोई चीख आपका इंतज़ार नहीं करेगी। किसी युवा की टांग या हाथ तोड़ा जाएगा, किसी को पैलेट गन से घायल किया जाएगा, किसी को बेंत से करंट लगाया जाएगा या कील लगे डंडे से चोटिल किया जाएगा या किसी लड़की की गुदा में कोई पुलिस वाला डंडा घुसेड़ेगा या कपड़े फाड़ेगा, तब आप ये विडियो देखेंगे? मी लॉर्ड, आप ये विडियो देखते तो निश्चित रूप से आपके अंदर कोई हलचल नहीं होती, मगर उन्हें दिक्कत हो जाती, जिनकी खुशी के लिए आपने ये फैसला लिया होगा।
आपने उनको होने वाली तकलीफों का खयाल रखा होगा। उनके प्रति 'संवेदनशीलता' दिखाई होगी, ताकि वे खुश रहें और आपकी खुशी बरकरार रहे। वक्त आने पर हो सकता है, वे आपके प्रति भी 'संवेदनशीलता' दिखाएं। हर भूतपूर्व को रिटायरमेंट के बाद सरकारी 'संवेदनशीलता' की उम्मीद रहती है। इस 'संवेदनशीलता' के कई उम्मीदवार इस दुनिया से कूच कर गए और कुछ कूच करने के इंतजार में बैठे हैं और आपस में दुखड़ा रोते हैं कि हाय मेरी 'संवेदनशीलता' की सरकार ने कद्र तक नहीं की! आप तो स्वयं विद्वान हैं, जैसा कि भरी अदालत में हर न्यायाधीश को कहा जाता है, अतः आपको इस तरह की बात कहने की हिम्मत उसे नहीं होनी चाहिए, जो विद्वान की पूंछ भी नहीं है। माई लॉर्ड आपको किसी फिल्म का, किसी डाक्यूमेंट्री का विडियो दिखाया नहीं जा रहा था। 21जुलाई को आपके-हमारे बच्चों के बच्चे, दिल्ली पुलिस, अर्ध सैनिक बलों तथा कुछ अज्ञात गुंडों के हाथों पिटे थे। उनका खून सड़क पर बहा था। उनकी हड्डियां टूटी थीं। एक विडियो में एक सिपाही एक लड़की को नीचे गिराकर उसके कपड़े फाड़ता दिख रहा था।
एक ऐसा भी विडियो है महोदय कि एक नौजवान कह रहा है कि मैं कुछ दिनों से अनशन पर हूं और मुझमें इतनी शक्ति नहीं है कि आपकी मार से बचने के लिए भाग सकूं, फिर भी उसे मारा गया। एक युवा मार खाता गया और कहता गया और मारो, मैं रोऊंगा और चीखूंगा नहीं। एक मां अपने दो बच्चों को लेकर आई और बेरहम पुलिसवालों से रो-रोकर कहने लगी, आओ और मेरे इन बच्चों को भी मार डालो जुल्मियों! ऐसे दृश्यों के विडियो देखकर 75-80 साल की बुजुर्ग महिलाओं और पुरुषों के दिल भी हिल गए हैं और वे जंतर-मंतर की भीड़ में युवाओं के साथ खड़े होने आ गईं कि अब तो जब हमारे इन बच्चों को न्याय मिलेगा, तभी घर जाएंगे। और मी लार्ड, यह सब और इससे भी कई गुना ज्यादा आपकी अदालत से करीब दो किलोमीटर दूर हो रहा था। और आप सरकार के प्रति इतने 'संवेदनशील' हो गए, इतने दयालु और कृपालु हो गए कि आपने कहा कि हमारे पास समय नहीं है। क्या सचमुच अपने बंगले में जाकर आपने उस दिन का कोई विडियो नहीं देखा? नहीं देखा हो, तो भी आप मी लॉर्ड हैं, कोई और ऐसा कहता, तो मैं उसे लानतें भेजता। आपसे तो कुछ कह भी नहीं सकता! मी लॉर्ड, ये विडियो देखकर वे लोग भी अंदर से हिल गए थे, जिन्होंने 2024 में नरेंद्र मोदी की भाजपा को केवल वोट ही नहीं दिया था, उसका प्रचार भी किया था। मोदी जी को वोट देने के लिए रिश्तेदारों और मित्रों से जो लड़े थे। आप अभी देश के जजों में सर्वोच्च हैं, आप अपनी आंखें, अपना दिल कहीं रखकर भूल तो नहीं आए?
चलो कहीं भूल आए हों, तो भी भारत के संविधान और कानून की किताबें पढ़कर आप यहां पहुंचे हैं, उनमें लिखी बातें भी क्या भूल गए? ऐसा क्यों होता है मी लार्ड कि हर बार आपको अपनी पिछली बात का स्पष्टीकरण देना पड़ता है? इस बार भी आलोचनाओं के दबाव में आकर आपको अपनी बात में थोड़ा-सा संशोधन करना पड़ा है। मगर जो धब्बा लगा, वह जल्दी मिटेगा नहीं! और हां, काक्रोच जनता पार्टी वाले काक्रोच कहने के लिए आपको बार- बार धन्यवाद दे रहे हैं, वह तो पहुंच ही गया होगा। *(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)* ***** *2. ये जेन ज़ी-जेन ज़ी क्या है? : राजेंद्र शर्मा* ये जेन-ज़ी, जेन-ज़ी क्या है? माने नौजवान हैं, अच्छी बात है। माने पढ़े-लिखे हैं, और अच्छी बात है। अपना दिमाग रखते हैं, यह भी बुरा नहीं है। किसी के कहने भर से कुछ नहीं मानते, किसी के कहने से कुछ नहीं करते, जो सही जंचे, वही करते हैं, यह सब तो अच्छा है। लेकिन, इसका मतलब यह थोड़े ही है कि अपनी संस्कृति-संस्कार, सब को भूलकर किसी की भी खिल्ली उड़ाने लग जाएंगे। अब बताइए, इन्हीं के इस्तीफा दो, इस्तीफा दो की रट पकड़ने पर, धर्मेंद्र प्रधान जी ने इस्तीफा दिया।
इन्हीं की और इन्हीं के भाई-बांधवों की सेवा करने के लिए जो पद संभाला था, उस पद से इस्तीफा दिया। इस्तीफा दिया कि इन्हीं के जरिए भारत-विरोधी षड्यंत्र आगे न बढ़ने पाएं और राष्ट्र विरोधी ताकतों के मंसूबे कहीं सफल न हो जाएं। इनके एंटी-नेशनल आकाओं से लड़ने के लिए, भारत माता के चरणों में अपनी गद्दी का सिर काट कर चढ़ा दिया। पर राष्ट्र के लिए उनकी कुर्बानी का खुद सम्मान नहीं करना था, तो नहीं करते, पर ये तो भगवा पार्टी के सांसदों के संसद के दरवाजे पर प्रधान का सम्मान करने का भी मजाक उड़ा रहे हैं। और दलीलें तो ऐसी-ऐसी फालतू कि कुछ पूछो ही मत। कह रहे हैं कि टोपी पहनाकर और शॉल ओढ़ाकर यह किस का सम्मान हो रहा है? 2024 के पेपर लीक के बाद, 2026 में पेपर लीक के रिपीट होने का सम्मान? सीबीएसई परीक्षा कॉपियों की जांच की धांधली का सम्मान? परीक्षा दर परीक्षा गड़बड़ी के अनोखे रिकार्ड का सम्मान? नीट की चोरी की वजह से 22 बच्चों के जान गंवाने का जश्न? किस बात का सम्मान? अगले ने अपनी गद्दी का सिर काटकर मां भारती के चरणों में चढ़ा दिया और ये हैं कि अगले को टोपी पहनाने पर हुज्जत कर रहे हैं -- ऐसे नाशुक्रे हैं ये जेन ज़ी! और ये धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगने पर ही रुक जाते, तब तो फिर भी इनकी एंटीनेशनलता को बच्चा समझ कर माफ किया जा सकता था। ये तो प्रधान जी के प्रात: आराध्य, देवतुल्य मोदी जी की भी खिल्ली उड़ाते हैं। मोदी जी ने रातों में बारह-बारह बजे तक जागकर रीलें बनायीं और वह भी सेल्फी मोड में अकेले-अकेले। पता नहीं टेलीप्रॉम्प्टर भी साथ में था या नहीं। और इन्होंने न उम्र का ख्याल किया, ना उनकी फ्रेंडशिप कबूल की, उल्टे कैमरा एंगल, कैमरे से दूरी के खोट और निकालने लगे। उधर खुद, भीड़ में तो भीड़ में, अकेले-अकेले अपने सोशल मीडिया खातों में भी, अगले के ऐसे-ऐसे मीम बना रहे थे, ऐसे-ऐसे नारे उठा रहे थे, ऐसे-ऐसे कैरीकेचर बना रहे थे और ऐसे-ऐसे गाने बना रहे थे कि पूछो मत। और हद्द तो यह हो गयी कि अगले अंग्रेजी में भिगो-भिगो के, शुद्ध देसी गालियां भी दे रहे थे और वह भी शाकाहारी गालियां ही नहीं, तरह-तरह की हिंदू सेनाओं के सेनापतियों की भारी-भारी गालियों की टक्कर की गालियां! हिंदू भक्ति में मुकाबला करने में इनकी नानी मरती है, पर हिंदू सैनिकों से गालियों में इनसे मुकाबला करा लो, ऐसे हैं ये जेन-ज़ी! और ये जो जेन-ज़ी की कुर्बानियों के गीत गाए जा रहे हैं, ये सब राई का पहाड़ बनाने वाली बातें हैं।
जून-जुलाई की तपती गर्मी में राजधानी में जंतर-मंतर पर आकर बैठ ही गए, तो क्या हो गया? ये रहते तो ज्यादा टैम इंटरनेट पर और अपने फोन में ही हैं। इन्हें कहां गर्मी, बारिश, तपिश, उमस कुछ भी महसूस होता है? इन्हें कहां टैम का पता चलता है -- बैठ गए तो बैठे रह गए एक महीने। रही बात भूख हड़ताल वगैरह की, तो इन्हें खाने का होश ही कहां रहता है? मांऐं ही पीछे पड़ी रहती हैं कि बेटा खा ले, कुछ तो खा ले ; तब बड़ा एहसान पटकते हुए दो-चार ग्रास खा लें, तो खा लें, वर्ना ये तो यूं भी हवा खाकर ही जिंदा रहते हैं। बीस-बाईस दिन की भूख हड़ताल तो इनके लिए कुछ भी नहीं है। और रही पुलिस की मार के सामने भी डटे रहने की बात, किसी से नहीं डरने की बात, तो ये इस दुनिया को जानते ही कितना हैं, जो डरेंगे? पहले किसी जुलूस-वुलूस में गए नहीं, पुलिस की लाठी खाई नहीं, गोली चलती देखी नहीं, जेल की सूरत देखी नहीं। और तो और, जमकर पिटाई तक नहीं खाई, न मां-बाप से, न स्कूल में और न मोहल्ले-पड़ोस में। 20 जुलाई को जो हुआ, इन्हें शुरू में तो वीडियो गेम लगा होगा। बाद में फंस गए, तो करते भी तो क्या करते? मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। खुद तो शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी बन गए और बेचारे पुलिस वालों को जल्लाद के नाम से बदनाम कर दिया। अब जंतर-मंतर पर पैलेट गन चलने का शोर मचा रहे हैं, जबकि इन्हें पुलिस को थैंक यू कहना चाहिए, एके-47 नहीं चलाने के लिए। क्या सोचते हैं, एके-47 क्या सिर्फ बिहार के पुलिस वाले ही चलाना जानते हैं? शाह साहब के डाइरेक्ट कंट्रोल में, दिल्ली पुलिस को अपने बिहारी बिरादरों से कमजोर दिल का समझा है क्या? रही पैलेट गन की बात तो, इन जेन-ज़ी वालों ने क्या समझा था कि पैलेट गन इस्राइल से चलकर कश्मीर तक आ सकती है, तो देश में आगे नहीं जाएगी और सिर्फ कश्मीर में ही रहेगी! कितने भोंदू हैं ये जेन-ज़ी वाले। भगवाधारियों को इन जेन-ज़ी वालों को देशभक्ति सिखानी ही पड़ेगी।
प्यार से सीखें तो प्यार से, नहीं तो मार से। वर्ना ये तो देश को बर्बाद ही कर देंगे। देश का भविष्य, देश का भविष्य सुन-सुनकर ये कुछ ज्यादा ही सिर चढ़ गए हैं। मोदी जी ने एक महीने जंतर-मंतर पर क्या बैठने दिया, इन्होंने तो सारी दुनिया में भारत का नाम ही खराब कर दिया। पुलिस की लाठी, पुलिस की आंसू गैस, पुलिस की गोली, सब सारी दुनिया को दिखा दिया और अमृत काल को, दुनिया वालों की नजरों में तानाशाही काल बना दिया। इनमें जरा भी देशभक्ति होती, तो क्या ये एक जरा से पेपर लीक को लेकर इतना भारी हंगामा खड़ा करते और वह भी यह जानते-समझते हुए कि इंटरनेट के इस जमाने में, गोदी मीडिया भी बहुत काम का नहीं रह गया है -- बाकी दुनिया से कुछ भी छुपा नहीं रह पाता है। उल्टे कॉकरोच बनकर ये तो लंदन, न्यूयार्क वगैरह में भी प्रदर्शन करने के लिए सडक़ों पर निकल आए, भारत को बदनाम करने के लिए -- ऐसे एंटीनेशनल हैं ये जेन-ज़ी। और इनके हमदर्द -- वो तो सब के सब सुर्खे हैं। उंगली पकड़ कर पहुंचा पकड़ रहे हैं ; प्रधान का इस्तीफा मिल गया, अब शाह जी का इस्तीफा मांग रहे हैं। इनका क्या है, कल मोदी जी का भी इस्तीफा मांगने लग जाएंगे। ऐसे-ऐसों की हिम्मत बढ़ा रहे हैं, ये जेन-ज़ी वाले। *(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*
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