कहानी: तीसरा बलिदान

Feb 20, 2025 - 08:56
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कहानी: तीसरा बलिदान

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कहानी: तीसरा बलिदान

नौकरीपेशा अनन्या ने अपने भाईबहन के लिए शादी नहीं की, ताकि वे पढ़ सकें, यह उस का पहला बलिदान था. दूसरा बलिदान तब दिया, जब उस ने घर ही छोड़ दिया, क्योंकि भाभी को उस का घर में रहना मंजूर नहीं था और उस ने तीसरा बलिदान भी दिया. आखिर क्या था वह तीसरा बलिदान ... अनन्या और सार्थक एक ही औफिस में पिछले 2 साल से काम कर रहे हैं. सार्थक इसी औफिस में 10 साल से काम कर रहा था, जबकि अनन्या 2 साल पहले ही बदली हो कर यहां आई थी. 3 दिन पहले ही अनन्या ने अहमदाबाद वाले औफिस में बदली हो कर ज्वाइन किया था. औफिस में 3 दिन बाद उस ने अपने कालेज के क्लासमेट सार्थक को देखा, तो खुशी से चिल्ला पड़ी, “अरे सार्थक, तुम यहां…“ “हां, मैं इसी औफिस में काम करता हूं. आप को पहचाना नहीं?”

सार्थक को आश्चर्य हुआ कि तुम जैसे अपनेपन वाला शब्द बोलने वाली यह खूबसूरत महिला कौन है? वहीं साथ में काम करने वाले आसपास के कर्मचारी दोनों को हैरानी से देख रहे थे कि कहीं अनन्या को गलतफहमी तो नहीं हुई है. “सार्थक, मैं अनन्या हूं… जोधपुर में हम एक ही कालेज में साथ में पढ़ते थे.” अनन्या को आश्चर्य हुआ कि सार्थक ने उसे पहचाना नहीं और थोड़ी झेंप हुई, क्योंकि आसपास सभी सहकर्मी उन दोनों को देख रहे थे कि अनन्या कोई भूल तो नहीं कर रही है. “ओह सौरी अनन्या, मैं ने तुम्हें पहचाना नहीं. शायद हमें कालेज छोड़े हुए तकरीबन 10 साल से ज्यादा हो गए हैं. अब याददाश्त भी कम हो रही है, उम्र के साथसाथ.” हालांकि 35 साल की उम्र ज्यादा बड़ी नहीं होती है, इस में क्या याददाश्त कम होगी. सार्थक ने बात बनाने की कोशिश की. सार्थक ने अनन्या को ध्यान से देखा, उस समय कालेज में अनन्या की चोटी हुआ करती थी, पर अभी उस के बाल बौयकट जैसे थे और साथ में आंखों का नंबर का चश्मा भी था. पर यह बात अनन्या को सब के सामने बता नहीं सकता था. “अरे, कब ज्वाइन की ड्यूटी आप ने यहां?”

सार्थक ने औपचारिकतावश पूछा, क्योंकि 3 दिनों से वह छुट्टी पर था. उस का बच्चा बीमार था. “3 दिन पहले ही,” अनन्या ने बेमन से बताया. अनन्या को उस का आप का औपचारिक संबोधन अच्छा नहीं लगा. यह सही बात थी कि अनन्या व सार्थक साथसाथ कालेज में एक ही क्लास में पढ़ते थे, पर बहुत अच्छे दोस्त नहीं थे तो भी कालेज में साथसाथ बैठते थे और दोनों का ग्रुप भी एक था. आपस में अनजान भी नहीं थे. अनन्या का मूड जो सार्थक को इतने साल बाद अपनी नई अनजान औफिस में अपनों को देख कर उत्साहित था, एकदम ठंडा पड़ गया. हालांकि सार्थक का शरीर भर गया था. उस ने मूंछें भी रख दी थी, तो भी उस ने इतने साल बाद एकदम से उसे पहचान लिया. औफिस वाले अनन्या का उत्साह देख कर जोरदार कालेज स्टोरी होने का अनुमान लगा रहे थे. लंच समय में अनन्या का मूड खराब देख कर सार्थक को लगा कि उस के हाथ से कुछ कच्चा कट गया है. “सौरी अनन्या, मैं पहचान नहीं सका,” कान पर हाथ रख कर कालेज के दोस्त वाली दोस्ती की भाषा में बोला, तो अनन्या मुसकराते हुए बोली, “हां, मेरे बाल की स्टाइल व चोटी न देख कर मैं समझ गई कि तुम मुझे पहचान नहीं पाए.” “हां, कालेज में तुम्हारे लंबे काले बालों वाली चोटी बहुत प्रसिद्ध थी. उस कारण तुम्हें एक बार मिस कालेज का खिताब भी मिला था,” सार्थक उस की चोटी याद कर के बोला, जिस पर कालेज के कई छात्र मजनू बन गए थे. “क्या करूं? सुबह की भागमभाग में चोटी बनती नहीं है, इसलिए जो लंबे काले बाल थे कालेज के समय में वह मैं ने कटवा दिए,”

किसी भी भारतीय स्त्री को काले घने लंबे बालों से बहुत ही प्रेम होता है, इसलिए अनन्या के शब्दों में अफसोस था. हम जब कालेज में या शहर में एकसाथ होते हैं, तो भले ही हमारे संबंध बहुत ज्यादा घनिष्ठ नहीं हो, पर जब हम अलग शहर में और बहुत समय बाद मिलते हैं, तो ऐसा लगता है कि हम बहुत ही करीब थे और बिछुड़ कर मिले हो, ऐसा लगता है. यह सब सार्थक व अनन्या के साथ भी हुआ. ”मतलब…?” सार्थक समझ न सका कि कोई अपना घर, घर के कारण छोड़ता है. अनन्या ने देखा कि सार्थक की औफिस की महिला सहकर्मियों के साथ सिर्फ बहुत ही जरूरी बातें होती हैं वह भी काम की, वह भी हां हूं में. हालांकि सार्थक की दूसरे पुरुष कर्मचारियों के साथ ऐसी बात नहीं थी और वह बहुत ही मिलनसार और सहयोगी प्रकृति का था. पर वह औफिस शाम 6 बजे छुट्टी होते ही निकल जाता था, एक मिनट की देरी किए बिना. बहुत दिनों बाद जब इस का कारण उस को पता चला, तब उसे बहुत ही दुख हुआ और सार्थक के साथ सहानुभूति हुई. सार्थक की पत्नी का निधन दो साल पहले ही कैंसर के कारण हो गया था और उस का एक छोटा सा 5 साल का बच्चा है।

उस कारण सार्थक ने दूसरी शादी नहीं की, क्योंकि सार्थक को लगता था सौतेली मां क्या होती है, यह सोच कर उसे डर लगता था अपने बेटे की भविष्य के बारे में. उसे सार्थक पर गर्व हुआ कि इतनी मानसिक व शारीरिक तकलीफों के बाद भी वह सिर्फ अपने बेटे के भविष्य का सब से पहले सोच रहा है, इस कारण वह महिला कर्मचारी से बात तक नहीं करता है. “अरे अनन्या, तुम ने जोधपुर जैसी जगह से अपनी बदली यहां करवा दी. वहां तो तुम्हारा अपना घर भी है,” कैंटीन में एक दिन दोपहर का खाना खाते हुए उस ने औपचारिकतावश पूछा. “इसलिए, क्योंकि वहां घर है,” टिफिन पैक करते हुए अनन्या ने जवाब दिया. “मतलब…?” सार्थक समझ ना सका कि कोई अपना घर, घर के कारण छोड़ता है. “मैं अपने घर में सब भाईबहनों में सब से बड़ी थी. मेरे पापा के अचानक गुजर जाने के बाद कोई कमाने वाला नहीं रहा. भाईबहन पढ़ रहे थे, मुझे पापा की जगह नौकरी मिल गई. इस कारण घर अच्छी तरह चलने लगा. आर्थिक स्थिति खराब होने से पहले ही बच गई और भाईबहन की पढ़ाई वैसे ही चलने लगी. अब मैं शादी नहीं कर सकती थी. यदि शादी कर दी तो घर की आर्थिक स्थिति खराब हो जाती और भाईबहन का कैरियर और दूसरी तकलीफें उत्पन्न होतीं. एक बार एक अच्छा परिवार देखने आया, तो मैं ने हिम्मत कर के उन्हें शादी के लिए यह शर्त रखी कि मेरी सैलरी का कुछ हिस्सा घरवालों को दूंगी, शादी के बाद. तो बात वहीं की वहीं खत्म हो गई।

फिर किसी के सामने यह शर्त रखने की हिम्मत ही नहीं हुई. मेरे लिए, मेरे भाईबहन और घर महत्वपूर्ण था. वे लोग मुझे आशाभरी नजरों से देखते थे और मुझे भगवान जैसा समझते थे. मैं भी अपनी इस जिंदगी से खुश और आत्मसंतुष्ट थी. भाई को अच्छी शिक्षा देने के बाद अपनी कसम दे कर भाई व बहन की शादी धूमधाम से की. मां भी यह सब देख कर चल बसी. पापा के बिना उस की जीने की इच्छा ही खत्म हो गई थी, वह सिर्फ भाईबहन को देख कर चल रही थी. भाई की शादी के बाद मेरी समस्याएं शुरू हुईं. भाभी को मेरी सैलेरी पसंद थी, पर मेरा घर पर रहना पसंद नहीं था और ना ही मेरा भाई का मेरी हर बात पर सलाह लेना. दोनों के बीच मेरे कारण तनाव रहने लगा. इस कारण भाई भी मुझ से धीरेधीरे कटने लगा. मुझे लगा कि अब समय आ गया है अपने बलिदान व त्याग का क्रेडिट लेने की जगह और महानता की आत्मप्रशंसा की जगह, जगह ही बदलना समयोचित है. मैं ने मेरे विभाग में बदली के लिए अर्जी दी और बदली का सही कारण भी बताया. मेरा ट्रैक रिकौर्ड अच्छा होने कारण मुझे अहमदाबाद में बदली मिल गई. यहां आ कर मुझे सच में मानसिक शांति मिली और यहां आ कर तुम्हें देखा तो मुझे बहुत ही अच्छा महसूस हुआ और कालेज के दिनों वाली ताजगी महसूस होने लगी. “अनन्या, तुम सच में महान हो. अपने परिवार के लिए खुद का बलिदान दिया. वह भी एक बार नहीं, दोदो बार. पहली बार अपने घर वालों के लिए शादी नहीं की और दूसरी बार अपने घर वालों के लिए घर ही छोड़ दिया. जो तुम्हारी सब से प्रिय जगह थी,” सार्थक ने सिर झुका कर आदरभाव से कहा. सार्थक को अच्छा लगा कि उस की क्लासमेट ने अपने परिवार के हित के लिए बलिदान दिया. उस के मन में अनन्या के लिए प्यार व आदरभाव पैदा हुआ. “क्या तुम्हें कभी प्यार हुआ है?”

एक अच्छे दोस्त की तरह सार्थक ने पूछा. “पता नहीं, मेरे लिए जवाबदारी इतनी बड़ी थी कि प्यार की गरमाहट मैं ने कभी महसूस ही नहीं की,” अनन्या ऐसे बोली, जैसे कि उस के मन में प्यार की कसक अभी बाकी है. “अब तो कोई जवाबदारी नहीं है. अब क्यों नहीं शादी कर रही हो?” सार्थक ने अपनेपन से पूछा. “सच बताऊं, एक तो उम्र हो गई है और दूसरा कोई ढूंढ़ने वाला भी तो चाहिए,” अनन्या ने हताशा से फीकी हंसी के साथ कहा. “32-35 साल की उम्र कोई उम्र नहीं होती है.” “देखते हैं, जिंदगी किस मोड़ ले जाती है,” मुसकरा कर बात खत्म करने के इरादे से वह बोली. “और तुम्हारी भी उम्र मेरी जितनी है, फिर तुम क्यों नहीं शादी कर रहे हो?” “बेटे के कारण. उसे मां का प्यार नहीं मिला तो क्या मैं उसे पिता का प्यार भी नहीं दूं. ना जाने कैसी होगी उस की सौतेली मां? ऊपर से उस के बच्चे हो गए तो क्यों मेरे बेटे का ध्यान रखेगी? बस डरता हूं मैं इस बात से,” सार्थक ने स्पष्ट रुप से कहा. “बेटा कालेज जाने लायक होगा, तब कर लूंगा दूसरी शादी,” हंसते हुए सार्थक बोला, तो सार्थक की बात सुन कर अनन्या हंसने लगी. दो साल से ज्यादा हो गए, अब दोनों न सिर्फ अच्छे दोस्त हो गए थे, बल्कि कई बार साथ में बाहर भी जाते थे. यहां तक कि कई बार साथ में 5 साल का बेटा चिंटू भी उन के साथ होता था. वह काफी घुलमिल गया था अनन्या के साथ. उसे प्यार से आंटी कहता था. दोनों के प्यार व साथ में रहने की चर्चा औफिस में होती थी और सब यह दिल से चाहते थे कि दोनों शादी कर लें. दोनों के चेहरे की चमक भी दो साल में बदल गई थी और दोनों के मन में, दिल में जिंदगी में कुछ आशाएं जलने लगी थीं – जगमगाने लगी थीं. “सार्थक कब शादी कर रहे हो अनन्या के साथ?” औफिस में औफिस का सहकर्मी आशीष, जो सार्थक का अच्छा दोस्त भी था, ने संजीदगी से पूछा. उस दिन औफिस में उन दोनों के अलावा कोई नहीं था।

सभी औफिसकर्मी के बच्चे की शादी में गए थे. अनन्या पर्स टेबल पर भूल गई थी, इसलिए लेने आई थी. उस ने अपना नाम सुना, तो दीवार के पीछे दोनों की बातें सुनने लगी. “मैं अनन्या को पसंद करता हूं. अनन्या बहुत अच्छी लड़की है, पर आज भले उसे मेरा बेटा अच्छा लग रहा है, पर जब उस के बच्चे होगें, तब शायद ही चिंटू अच्छा लगने लगे. मैं कोई जिंदगी में रिस्क नहीं लेना चाहता अपने बेटे के लिए,” सार्थक हताशा से स्पष्ट शब्दों में बोला, तो यह सुनने के बाद और कुछ सुनने की हिम्मत अनन्या में नहीं थी. वह बिना पर्स लिए पार्टी में चली गई. 3-4 दिन से अनन्या औफिस नहीं आई थी और उस का मोबाइल भी स्विच औफ आ रहा था. सार्थक बेचैन हो गया था. दो साल में पहली बार वह इतनी दूर था कि उस से उस को लगा कि उस के बिना शायद ही जिंदगी गुजार पाएगा? औफिस के सभी लोग उस की बेचैनी को स्पष्ट रूप से देख रहे थे और समझ भी रहे थे. 5 दिन बाद शाम को एक टैक्सी सार्थक के घर के आगे रुकी. उस में अनन्या उतरी और कमजोर जैसे कई दिनों की बीमार होती है, सीधे जैसे अस्पताल से आ रही हो, ऐसी दिख रही थी. ”अरे अनन्या 5 दिन से कहां थीं तुम?” इतने दिन बाद उसे सामने देखा तो सार्थक आश्चर्य से बोला. ”यह लो तुम्हारी मनपसंद चौकलेट व गेम,” चिंटू के हाथ मे गिफ्ट हैंपर देते हुए गाल पर प्यार से हाथ फेरते हुए उस ने कहा. ”थैंक यू आंटी,” चिंटू हमेशा की तरह अनन्या से चिपक कर बोला. ”बताया नहीं, क्या हुआ था तुम्हें,” उसे सोफे पर बिठाने के बाद बेसब्री व चिंता से सार्थक ने पूछा. अनन्या ने गहरी सांस ली और एक फाइल से सर्टिफिकेट निकाल कर कहा, ”यह लो.” सर्टिफिकेट देते हुए अनन्या बोली. सर्टिफिकेट लेते हुए सार्थक हैरानगी व असमजंस से बोला, ”कैसा सर्टिफिकेट?” वह गंभीरता से बोला. “क्या… यह क्या किया तुम ने अनन्या. तुम ने अपना नसबंदी का औपरेशन करा दिया वह भी शादी से पहले,” सरकारी अस्पताल का नसबंदी सर्टिफिकेट देखते हुए सार्थक तेज आवाज में बोला. ”तुम मुझ से शादी इसलिए नहीं कर रहे थे कि तुम डर रहे हो कि हमारे बच्चे होने के बाद मैं तुम्हारे चिंटू को प्यार नहीं दूंगी और ध्यान नहीं रखूंगी. मैं ने यह विश्वास दिलाने के लिए ही कि चिंटू ही मेरा प्रथम व आखिरी बच्चा है, इसलिए भविष्य में मेरे कभी बच्चे ही नहीं हो, इसलिए मैं ने यह प्रश्न ही खत्म करने के लिए, बच्चा ना होने का औपरेशन ही करा दिया. सार्थक, मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती हूं,” अनन्या भावपूर्ण स्वर में बोली. तो सार्थक बोला, ”अनन्या तुम ने एक बार फिर, तीसरी बार अपना बलिदान दे दिया अपनों के लिए. मेरे पास तुम्हारी महानता के लिए शब्द नहीं है,” प्यार से गले लगाते हुए सार्थक रो पड़ा।

 विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार मलोट पंजाब

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SuragBureau

Surag Bureau पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और स्थानीय व राष्ट्रीय मुद्दों पर समाचार लेखन करते हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना हैं।

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