फर्रुखाबाद: सरकारी आवास की आस में झोपड़ी में रहने को मजबूर परिवार
फर्रुखाबाद के करनपुर घाट में एक महिला अपने चार बच्चों संग झोपड़ी में रहने को मजबूर है। सरकारी आवास योजना का लाभ न मिलने से परिवार की मुश्किलें लगातार बढ़ रही हैं।
फर्रुखाबाद जिले के अमृतपुर तहसील अंतर्गत आने वाले करनपुर घाट गांव की एक मार्मिक तस्वीर सामने आई है, जहां एक गरीब महिला सरकारी मदद की बाट जोह रही है। प्रियंका पत्नी वीरपाल नाम की यह महिला अपने चार मासूम बच्चों के साथ एक जर्जर झोपड़ी में रहने को विवश है। वर्षों से सरकारी आवास की आस लगाए बैठी इस महिला की व्यथा प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। आर्थिक तंगी के कारण पक्का मकान बनाने में असमर्थ प्रियंका के लिए यह झोपड़ी ही उसका एकमात्र आशियाना है, जो न केवल रहने का स्थान है, बल्कि यहीं पर खाना भी बनता है।
आवास योजना से वंचित परिवार का संघर्ष
प्रियंका का कहना है कि उन्होंने प्रधानमंत्री आवास योजना और मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत पक्का घर पाने के लिए हर संभव प्रयास किया है। हालांकि, कागजी खानापूर्ति और विभागीय उदासीनता के कारण उन्हें आज तक इसका लाभ नहीं मिल सका है। उनके अनुसार, गांव के प्रधान से भी कई बार गुहार लगाई गई, लेकिन आश्वासन के सिवाय उन्हें कुछ नहीं मिला। एक मां के लिए अपने चार बच्चों के साथ ऐसी दयनीय स्थिति में रहना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर है कि वे मजदूरी के जरिए केवल दो वक्त की रोटी ही जुटा पाते हैं, मकान बनवाना उनके लिए एक सपने जैसा है।
मौसम का कहर और सुरक्षा का संकट
करनपुर घाट जैसे ग्रामीण इलाकों में मौसम की मार सबसे पहले ऐसे ही कच्चे घरों पर पड़ती है। प्रियंका बताती हैं कि बारिश और बाढ़ के मौसम में उनकी मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं। झोपड़ी की छत से पानी टपकना और दीवारों में नमी के कारण बच्चों के बीमार होने का डर हमेशा बना रहता है। तेज हवाओं और भारी बारिश के दौरान पूरा परिवार अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहता है। असुरक्षित झोपड़ी में रातें गुजारना उनके लिए एक खौफनाक अनुभव जैसा है, जहां हर पल अनहोनी की आशंका बनी रहती है।
प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग
सरकारी योजनाओं का मूल उद्देश्य ही समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को पक्का आवास मुहैया कराना है। ऐसे में प्रियंका का मामला इस बात की ओर इशारा करता है कि पात्रता सूची में कहीं न कहीं खामियां हैं। महिला ने स्पष्ट मांग की है कि प्रशासन उनके मामले की निष्पक्ष जांच कराए और यदि वह पात्र है, तो उसे तत्काल प्रभाव से सरकारी आवास योजना का लाभ दिया जाए।
- आवास का अधिकार: जरूरतमंदों को पक्का मकान मिलना उनका संवैधानिक अधिकार है।
- पारदर्शिता की जरूरत: ग्राम स्तर पर चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित होनी चाहिए।
- तत्काल कार्रवाई: प्रशासन को धरातल पर जाकर पीड़ित परिवारों की सुध लेनी चाहिए।
अब देखना यह है कि क्या जिला प्रशासन इस मामले का संज्ञान लेकर प्रियंका के परिवार को सुरक्षा प्रदान करेगा या फिर यह परिवार सरकारी फाइलों के बीच उलझकर झोपड़ी में ही जिंदगी बसर करने को मजबूर रहेगा। स्थानीय लोगों का भी कहना है कि प्रियंका का परिवार वास्तव में जरूरतमंद है और उन्हें प्राथमिकता के आधार पर सहायता मिलनी चाहिए। उम्मीद है कि संबंधित अधिकारी जल्द ही इस पर विचार कर कोई ठोस कदम उठाएंगे ताकि बच्चों को एक सुरक्षित छत नसीब हो सके।
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