राजनीति में एक बार फिर महिलाओं का चरित्र हनन
दृष्टिकोण
राजनीति में एक बार फिर महिलाओं का चरित्र हनन (डॉ. सुधाकर आशावादी )
एक ओर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं की तैंतीस प्रतिशत भागीदारी लागू किये जाने की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर महिलाओं के राजनीतिक अस्तित्व में यौन शोषण की भूमिका पर बहस छिड़ गई है। बिहार के सांसद पप्पू यादव ने दावा किया है, कि राजनीति में सक्रिय नब्बे प्रतिशत महिलाओं का करियर नेताओं के बिस्तर से शुरू होता है और प्रभावशाली नेताओं से समझौता किए बिना उन्हें सक्रिय राजनीति में जगह नहीं मिलती। पप्पू यादव के इस बयान से अनेक दलों की महिला राजनीतिज्ञ आक्रोशित हैं, सक्रिय राजनीति में उनकी अस्मिता का प्रश्न खड़ा हो गया है। पप्पू यादव का यह दावा कितने प्रतिशत सत्य है, यह कहना मुश्किल है, मगर राजनीति में यौन शोषण की कहानियां नई नहीं हैं। इसके अनेक उदाहरण जनमानस के सम्मुख प्रकाश में आ चुके हैं। यौन शोषण के बल पर महिलाओं के राजनीति में बढ़ते क़दमों के किस्से अख़बारों में सुर्खियां बने हैं।
देश के अनेक प्रांतों में गाहे बगाहे प्रभावशाली महिलाओं की उपस्थिति और उनसे अंतरंग संबंधों की गाथाओं की पुष्टि चर्चाओं से शुरू होकर न्यायालय तक हो चुकी है। नेताओं के विवाहेत्तर संबंधों से उत्पन्न संतानों के प्रामाणिक तथ्य भी प्रकाश में आ चुके हैं। बहरहाल यह किस्सा केवल राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। समाज में हर प्रकार की प्रवृत्ति के लोग रहते हैं। भौतिक सुखों की प्राप्ति के लिए कौन किस हद तक समझौता कर सकता है, किस हद तक नहीं, यह व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर करता है। पप्पू यादव सक्रिय राजनीति में हैं, उनकी पत्नी भी कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय है। भाजपा में भी अनेक महिलाएं उच्च पदों पर हैं। अनेक राजनीतिक दलों में महिलाओं की भागीदारी है, किन्तु उनमें से नब्बे प्रतिशत महिलाओं के चरित्र पर उंगली उठाना किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता। पप्पू यादव का यह बयान राजनीति में सक्रिय महिलाओं के प्रभावी आधार पर शक की सुईं खड़ी करता है। इसका यह अर्थ भी लगाया जा सकता है, कि पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक अपनी राजनीतिक समझ बूझ का लोहा मनवाने वाली महिलाएं क्या यौन शोषण की प्रक्रिया से गुजर कर सत्ता शीर्ष तक पहुंची थी ? लगता है, कि कुछ लोगों की आदत बन चुकी है, कि वे अनर्गल और अप्रमाणिक बयानबाजी करके समाज में सुर्खियां बटोरने का प्रयास करते हैं।
यूँ तो अपवाद हर जगह हैं, लेकिन महिलाओं की राजनीति में भागीदारी पर नब्बे प्रतिशत महिलाओं के चरित्र पर सवाल उठाना राजनीति में मुख्य भूमिका निभाने वाली महिला जनप्रतिनिधियों का घोर अपमान है, जिसकी जितनी निंदा की जाए, सो कम है।