जालिमों और हत्यारों का समय : विष्णु नागर, व्यंग्य
राजनैतिक व्यंग्य-समागम
*जालिमों और हत्यारों का समय : विष्णु नागर* हमारा समय जालिमों और हत्यारों का समय है।
ये बहुत-सी शक्लों में पाए जाते हैं। इनके अलग-अलग ब्रांड और ब्रांड एंबेसडर हैं। हर सिंहासन पर अलग-अलग नामों और भिन्न-भिन्न चेहरों के साथ ये ही बैठे हैं, कहीं नेतावेश में, कहीं साधुवेश में, कहीं बहुरूपिया बन कर। कहीं श्वेत-पीत वस्त्रों में, तो कहीं सूट-टाई में। कभी साकार, तो कभी निराकार रूप में। उन्होंने अपनी असंख्य प्रतिमाएं, अनगिनत रूपों-रंगों में देश के कोने-कोने में लगवा रखी हैं, जिनकी आरती भी वे खुद करते हैं और प्रसाद भी वे स्वयं चट करते हैं। मठ उनके हैं, मंदिर उनके हैं। नदियां, तालाब और समुद्र उनके हैं। हवा उनकी है, पानी उनका है। बरसात उनकी है, जंगल उनके हैं, पहाड़ और खदानें उनकी हैं। जहां तक उनकी नजर जाए, सब उनका है। जितना भी जिधर भी हरा है, नीला है, पीला है, सफेद और वासंती है, सब उनका है। विश्वविद्यालय और कला-साहित्य केंद्र उनके हैं। प्रकाशन गृह और स्वयंसेवी संगठन उनके हैं। सरकार उनकी है, डंडा और गोली उनकी है। वकील उनके हैं, जज उनके हैं, फैसले उनके हैं। उनके चतुर्मुखी योगदान की प्राइम टाइम में हर चैनल पर हर दिन चर्चा उनकी है। वे अपनी छवि, अपने कपड़ों की तरह अत्यंत उज्ज्वल रखते हैं। उस पर सिलवट तक पड़ने नहीं देते। वे इतने ताकतवर और जरूरत पड़ने पर इतने विनम्र भी हैं कि कानून उन पर फंदा कस नहीं सकता और कभी कानून ऐसी गलती कर बैठता है, तो वे इतनी सफाई से, रात के अंधेरे में नहीं, दिनदहाड़े उसकी हत्या करवा देते हैं कि किसी को पता नहीं चलता और पता चल जाए, तो भी डर कैसा? वे ही कानून हैं, वे ही रक्षक हैं! सफल हत्यारे अनेक बार दिखने में फूलों से कोमल, मृदुभाषी और धार्मिक जैसे लगने का अभ्यास करते हैं।उनसे किसी बात पर अगर ठन न जाए, उनके अहम को चोट न पहुंचाई जाए, तो वे उदार हृदय होते हैं।
स्वागत-सत्कार में अत्यंत प्रवीण, विनम्रता में एंटायर सब्जैक्ट्स में एम ए ही नहीं, पीएचडी होते हैं। सामने वाले को अहसानों के बोझ से इतना लाद देते हैं कि लाभार्थी उनके हत्यारे इरादों को जितना ज्यादा भांपने लग जाता है, उतना ही उसका उनसे डर बढ़ता जाता है और वह उनके और अधिक नजदीक आने लगता है।उनकी छत्रछाया में अपने को महफूज़ समझता है।लाभार्थी कभी हत्यारे के चंद बुरे क्षणों में उनसे छिटकने की कोशिश करता है, दूर दिखना चाहता है, तो हत्यारे इसे भांप कर प्यार से उसे अपने पास सटाते हैं, उसके गले में अपना हाथ डालकर उसकी और अपनी मुस्कुराती हुई तस्वीर खिंचवाते हैं, ताकि वक्त-जरूरत काम आए। हत्यारे हत्या के अलावा अपने हर काम का आडियो-विडियो और लिखित रिकार्ड रखते हैं और लाभार्थी को इसकी याद दिलाते रहते हैं कि हमारे पास तुम्हारा काला-पीला चिट्ठा है! हत्यारे मंदिर जाते हैं। किसी दिन सोमनाथ, तो किसी दिन मंगलनाथ। किसी दिन केदारनाथ, तो किसी दिन रामेश्वरम। यही उनकी ईश्वर भक्ति और देश भक्ति का ठोस प्रमाण है। हत्यारे सब भूल सकते हैं, मगर मंदिर जाना कभी नहीं भूल सकते। उन्हें डर रहता है कि वे चार दिन मंदिर-मठ नहीं गए, तो उनका असली रूप खुल जाएगा। कभी वे भगवान से आशीर्वाद लेते हैं, तो कभी भगवान को आशीर्वाद भी देते हैं।
उनकी नजर उठते-बैठते, खाते-पीते, बच्चों के साथ फुटबॉल खेलने का अभिनय करते हुए, झालमुड़ी या सत्तू खाते हुए कैमरे पर रहती है। कैमरे से न वे अपनी कोमलता छिपाते हैं, न मृदुता, न ईश्वर के प्रति अपना 'अगाध और अटूट प्रेम', न घंटी बजाना, न ढोल बजाना, न त्रिशूल उठाना। वे छिपाते हैं हत्याओं की अनगिनत दास्तानें। उनकी कोमलता, उनकी मृदुभाषिता, उनकी ईश्वर भक्ति, उनका कला-साहित्य प्रेम बिकाऊ है, जिसकी आड़ में वे अगली हत्याओं के इरादे और पिछली हत्याओं का इतिहास छुपाते हैं। वे बार-बार उन करोड़ों लोगों की बात करते हैं, जिनका इस्तेमाल वे नाक पोंछने वाले रूमाल की तरह, पसीना पोंछने वाले गमछे की तरह और टायलेट पेपर की मानिंद करते हैं। सफल हत्यारे खुद हत्या करना छोड़ देते हैं। वे इतने पहुंचे हुए हो चुके होते हैं कि किसी से कहते नहीं कि तुम हत्या करो। वे ऐसा वातावरण निर्मित करते हैं कि वे जिनकी हत्या करवाना चाहते हैं, अपने आप हो जाती है और उनके हाथ खून से नहीं सनते! हत्या के बाद उनके हाथ, हाथ नहीं रहते, कर-कमल हो जाते हैं और रिबन काटने के काम आते हैं। हत्यारे दुख प्रकट करने में सबसे आगे रहते हैं, खासकर वहां, जहां ऊंगली उन पर उठ सकती है! वे शोकाकुल परिवार से इतनी 'गहरी सहानुभूति' प्रकट करते हैं कि वह परिवार सोच भी नहीं सकता कि असली हत्यारा तो यही है। अगले दिन हत्यारे के चित्र के साथ उसके शोक संदेश से अखबार पटे होते हैं और टीवी पर उसका विडियो संदेश सबसे ज्यादा बार प्रसारित होता है। हत्यारे हर आपदा में अवसर ढूंढते हैं, चाहे वह कोरोना हो! हत्या की उच्च स्तरीय जांच के आदेश वे देते हैं और पांच साल बाद हत्या के पक्के सबूत न मिलने के आधार पर अपने सहयोगी हत्यारों को छुड़वाते भी वही हैं।
इस तरह हत्या के हर मोर्चे पर वे सक्रिय रहते हैं। उनसे आप आदमी या लोगों के समूह की ही नहीं, सिद्धांतों की, न्याय की, संविधान की, धर्मनिरपेक्षता की यानी किसी भी किस्म की हत्या करवा सकते हैं, बशर्ते उससे उन्हें फायदा हो। हत्या ही उनका भोजन है, मिठाई है, पान, सिगरेट और दारू है। हत्या ही उनका साहित्य और संगीतप्रेम है। हत्या ही उनका रंगमंच है, जिसकी साधना में वे रत रहते हैं। *(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)* ********** *चल चाणक्य अब पंजाब, जीत लिया बंगाल : राजेंद्र शर्मा* या-रब ये विरोधी न समझे हैं, न समझेंगे मोदी जी के मन की बात। बताइए, बंगाल फतेह करने के बाद, मोदी जी फौरन अपना वादा पूरा करने में जुट गए कि नहीं? मोदी जी ने अपने वादे, बल्कि अपनी गारंटी को पूरा किया कि नहीं कि बंगाल में, बंगाली को गद्दी पर बैठाएंगे ; बांग्ला बोलने वाले को गद्दी पर बैठाएंगे ; कोलकाता से राज करने वाले को बंगाल की गद्दी पर बैठाएंगे। लेकिन, मजाल है कि एक बार फिर बाहर वालों के राज से बंगाल वालों की जान बख्शवाने के लिए, विपक्ष वालों ने मोदी जी को नाम को भी धन्यवाद दिया हो। उल्टे जब मोदी जी ब्रिगेड परेड मैदान में शुभेंदु अधिकारी का राजतिलक करा रहे थे, तब विपक्षी ब्रिगेड के बाहर सोशल मीडिया पर मोदी जी का ही दस साल पुराना वीडियो वायरल कर के, खुद मोदी जी के श्रीमुख से अधिकारी को महाभ्रष्ट कहलवा रहे थे! नहीं, हम यह नहीं कह रहे हैं कि अधिकारी को खुद मोदी जी की आवाज में भ्रष्ट कहे जाने से, मोदी जी को कोई फर्क पड़ता है या शुभेंदु अधिकारी जी को ही कोई फर्क पड़ता है या बंगाल में ऐसे बदलाव के यज्ञ में आहुति देने वालों को कोई फर्क पड़ता है। जैसे नारदा घोटाले का वीडियो वायरल नहीं होता, तब भी शुभेंदु बाबू राजतिलक होता, वैसे ही वीडियो वायरल होने के बाद भी उनका राजतिलक हुआ। जैसे मोदी जी की आवाज में उनके घोटाले की याद दिलाए जाने के बिना, मोदी जी के आशीर्वाद से शुभेंदु बाबू का राजतिलक हुआ होता, वैसे ही खुद मोदी जी की आवाज में घोटाले की कथा पब्लिक को सुनाए जाने के बाद भी, मोदी जी के आशीर्वाद से उनका राजतिलक हुआ।
वास्तव में मोदी जी की यही तो खासियत है। मोदी जी जो करने की ठान लेते हैं, वह कर के ही मानते हैं। मोदी जो ठान लेते हैं, वह करने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता है, बल्कि अब तो कोई रोकने की जुर्रत भी नहीं करता है, न कोई अदालत-वदालत और न कोई चुनाव आयोग वगैरह। शुरू से ही दिखाई दे रहा था कि मोदी जी इस बार बंगाल को फतेह कर के मानेंगे और फतेह कर के दिखाया भी। बंगाल को फतेह करने के लिए, मोदी जी को चुनाव आयोग को अपने युद्ध-रथ में जोतना पड़ा, तो जोता। ईडी, सीबीआई, केंद्रीय बलों, सब को काम पर लगाना पड़ा, तो लगाया। धन्नासेठों की तिजोरियों से निकला पैसा पानी की तरह बहाना पड़ा, तो बहाया। देश की पूरी सरकार को महीनों कोलकाता ले जाकर बैठाना पड़ा, तो बैठाया। साम-दाम-दंड-भेद, हरेक हथियार खुलकर आजमाया, पर बंगाल फतेह कर के दिखाया। और अब शुभेंदु अधिकारी को गद्दी पर भी बैठा दिया। मोदी जी का फैसला न टलना था और न टला। बस इतनी बात है कि खुशी के मौके पर ऐसा वीडियो वाइरल हो जाए, तो मुंह का जायका जरा बिगड़ जाता है। कहां मोदी जी के आशीर्वाद से इतिहास बन रहा था और कहां चोर-चोर के शोर को दबाने के लिए, शुभेंदु अधिकारी को भगवा वेश से लेकर जय श्रीराम के नारों तक का सहारा लेना पड़ गया। हिंदू राज में ऐसा होना चाहिए था क्या? और ये विरोधियों ने उधार का मुख्यमंत्री, उधार का मुख्यमंत्री क्या लगा रखा है? शुभेंदु अधिकारी, पहले ममता बनर्जी की पार्टी में रहे थे, इसका मतलब यह थोड़े ही है कि उन्हें मोदी जी की पार्टी में उधार का मुख्यमंत्री कहा जाएगा। वैसे भी यह कोई पहला मौका थोड़े ही है जब, मोदी जी ने दूसरी पार्टी के नेताओं को अपनी पार्टी में आकर जनता की सेवा करने का चांस दिया है। शुभेंदु अधिकारी को तो अब गद्दी मिली है, बगल में गुवाहाटी की गद्दी पर मोदी जी के आशीर्वाद से हिमंत बिस्वा शर्मा तो पांच साल पहले से सवार हैं। वह कभी कांग्रेस में हुआ करते थे।
मणिपुर के पिछले मुख्यमंत्री, वीरेंद्र सिंह भी कभी कांग्रेस में ही हुआ करते थे। और बिहार के नये-नये बने मुख्यमंत्री, सम्राट चौधरी तो बिहार की करीब-करीब सभी पार्टियों में चक्कर लगाने के बाद, आखिर में मोदी जी की पार्टी में पहुंचे हैं। असल में मोदी जी पार्टियों के विभाजन से ऊपर, उठकर देश के हित को देखते हैं। मोदी जी किसी नेता की पार्टी देखते ही नहीं हैं, जैसे अर्जुन निशाने की मछली की सिर्फ आंख देखता था, वैसे ही मोदी जी तो नेताओं की सिर्फ देश की सेवा की लगन देखते हैं और देश की सेवा के लिए संसाधन जुटाने की प्रतिभा। और जहां भी उन्हें राष्ट्र के काम की कोई प्रतिभा दिखाई देती है, उसे अपनी पार्टी में लाने में और राष्ट्र यानी संघ की सेवा में लगाने में, जरा भी देरी नहीं करते हैं। यह उधार के मुख्यमंत्री, मंत्री वगैरह का नहीं, राष्ट्रहित में देश भर से राजनीतिक प्रतिभाओं का संकलन करने का मामला है। जाहिर है कि इस काम में भी बाधाएं आती हैं, पर मोदी जी बाधाओं के सामने पीछे हटने वालों में नहीं हैं। राष्ट्रहित के लिए है तब भी, दूसरी पार्टियों से नेताओं को खींचकर अपने साथ लाना आसान थोड़े ही होता है? राष्ट्र सेवा के लिए भी अक्सर लोगों को प्रलोभन देना पड़ता है। प्रलोभन भी काम नहीं आए तो उनके पीछे ईडी, सीबीआई वगैरह को छोड़ना पड़ता है। मामले-मुकद्दमे करने पड़ते हैं। जेल का डर दिखाना पड़ता है और कभी-कभी तो जेल भेजना भी पड़ता है। इस सब के लिए भ्रष्टाचार वगैरह के सच्चे-झूठे आरोप लगाने ही पड़ते हैं। पर यह सब तभी तक के लिए होता है, जब तक बंदा खूंटा तुड़ाकर, मोदी जी के थान पर आ नहीं पहुंचता है।
जाहिर है कि उसके बाद सब भुला दिया जाता है। विरोधी इसके बाद भी, मोदी जी के आवाज के वीडियो पकड़कर बैठे रहना चाहते हैं, तो मोदी जी क्या कर सकते हैं? और हां! उधार के नेताओं से याद आया, पंजाब के लिए भी तो मोदी जी को अपनी पार्टी का पहला सीएम मिल गया लगता है। जैसे शुभेंदु अधिकारी कभी तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो का खासमखास हुआ करता था, वैसे ही पंजाब में भी मोदी जी ने आप पार्टी सुप्रीमो का खासमखास खोज भी निकाला है और खरीद भी डाला है -- वही राघव चड्ढा और कौन? बंगाल फतेह हो लिया, अब पीएमओ और गृह मंत्रालय, कोलकाता से उठकर चंडीगढ़ की तरफ निकल सकते हैं। ईडी, सीबीआई की टीमों के रूप में उसकी अग्रिम पार्टियों ने पहुंच कर अपना काम शुरू भी कर दिया है। अगला नंबर पंजाब का है। तुम कहां रह गए, ज्ञानेश? *(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं।)*