बयानबाजी और हकीकत : पश्चिम बंगाल में भाजपा शासन के एक माह
बयानबाजी और हकीकत : पश्चिम बंगाल में भाजपा शासन के एक माह
(आलेख : सुबिनॉय मौलिक, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते)
पश्चिम बंगाल में भाजपा को सरकार में आकर सत्ता संभाले हुए लगभग एक महीना हो गया है। इस बेहद कम समय में ही, सरकार के प्रशासनिक रवैये को लेकर जनता में बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही है। यह बेचैनी सिर्फ़ फेरीवालों और विक्रेताओं को बेरहमी से हटाने और राज्य में "बुलडोज़र संस्कृति" लाने के खौफ़नाक नतीजों की वजह से ही नहीं है। यह भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और दूसरे नेताओं की "सरकारी दखल" वाली बयानबाजी तक ही सीमित नहीं है, जो पाठ्यपुस्तकों और सामाजिक जीवन में पूरी तरह से बदलाव लाने की वकालत कर रहे हैं। इसके बजाय, एक ज़्यादा व्यापक और परेशान करने वाली बात ज़ोर पकड़ रही है : यह सरकार बड़े-बड़े वादे करने में तो माहिर है, लेकिन जब उन्हें असल में पूरा करने की बात आती है, तो काफ़ी पीछे रह जाती है। नतीजन, इस बात को लेकर गहरे सवाल उठने लगे हैं कि असल में यह प्रशासन लोगों के हितों पर कितना केंद्रित है। *छिन्न-भिन्न प्राथमिकताएँ* सरकार की सांस्कृतिक मुखरता और उसकी आर्थिक सुस्ती के बीच एक चौंकाने वाला विरोधाभास सामने आया है।
पर्यवेक्षक यह सवाल उठा रहे हैं कि स्कूलों और मदरसों में 'वंदे मातरम' गान को अनिवार्य बनाने के लिए इतनी बेताबी क्यों दिखाई जा रही है, जबकि इसके विपरीत, जब आम जनता के ठोस कल्याण की बात आती है, तो गति बिल्कुल धीमी पड़ जाती है। कई नागरिकों के मन में एक साझा सवाल उठ खड़ा हुआ है : क्या फेरीवालों को हटाना, लोगों को उनके घरों से बेदखल करना, 1950 के 'पशु वध/बलि अधिनियम' को सख्ती से लागू करना, या ऐसे निर्देश जारी करना जो सरकारी कर्मचारियों की आवाज़ को प्रभावी ढंग से दबा देते हैं — क्या सचमुच यही इस समय पश्चिम बंगाल की सबसे ज़रूरी और अहम समस्याएँ हैं? चुनाव जीतने के बाद उनकी प्राथमिकताओं की सूची में ये कदम निश्चित रूप से शामिल नहीं थे। तो फिर, भाजपा के नए नेतृत्व ने इन वैचारिक दांव-पेचों को अपनी प्राथमिकताओं की सूची में सबसे ऊपर रखने का फैसला क्यों किया है? आलोचकों का तर्क है कि मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) के बाद पैदा हुए लोकतांत्रिक संकट को तुरंत सुलझाना कहीं ज़्यादा ज़रूरी है। एक बेहद डरावनी प्रक्रिया के ज़रिए किए गए इस पुनरीक्षण में, लगभग 27 लाख लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया।
लाखों नागरिकों के नाम, जिन्हें सूची से हटा दिया गया है या जो अभी भी सुनवाई की पेचीदा प्रक्रिया में फँसे हुए हैं, उन्हें वापस शामिल करने की दिशा में काम करने के बजाय, नई बनी राज्य सरकार ने ठीक इसी समय 'नागरिकता संशोधन अधिनियम' को लागू करने की घोषणा करना चुना। इसके साथ ही, मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी जैसे प्रमुख व्यक्ति के नेतृत्व वाले प्रशासन ने घुसपैठियों के संबंध में अपनी नीति को "पहचानो, हटाओ और निर्वासित करो" (डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट) घोषित कर दिया है। मुख्यमंत्री ने घुसपैठियों की पहचान करने और उन्हें राज्य के भीतर "निरोध केंद्रों (होल्डिंग सेंटर्स)" में रखने की योजना की घोषणा की है, जो असम के नजरबंदी केंद्रों (डिटेंशन सेंटर्स) की तर्ज़ पर होंगे। इन तीनों कदमों से एक बात बिल्कुल स्पष्ट है : इसका उद्देश्य उनके चुनाव-पूर्व नारे "डर भगाओ, विश्वास जगाओ" को पूरा करना नहीं है ; बल्कि, इसका मकसद समाज में दहशत फैलाना और धार्मिक ध्रुवीकरण के नाम पर आपसी अविश्वास और संदेह को बढ़ावा देना है। अब आम नागरिकों के मन में गहरी आशंका घर कर गई है। *अगंभीर वादे* शुरू से ही, चुनाव-पूर्व किए गए वादों और अब जो हो रहा है, उसके बीच तालमेल का अभाव साफ़-साफ़ दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, राज्य सरकार के कर्मचारियों की मांगों को ही ले लीजिए — एक ऐसा क्षेत्र, जहाँ भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान वादे करने में खूब दरियादिली दिखाई थी। सड़कों पर लगे विज्ञापन बोर्डों में वादा किया गया था कि सरकार बनने के 45 दिनों के भीतर सातवें वेतन आयोग को लागू कर दिया जाएगा। इस वादे को पूरा करने के बजाय, मंत्रिमंडल ने विभिन्न सरकारी निकायों और संस्थानों के लिए एक आयोग गठित करने का केवल 'सैद्धांतिक निर्णय' लिया है। कर्मचारी इसे पिछली टीएमसी सरकार द्वारा फरवरी में पेश किए गए बजट की घोषणा का महज़ एक 'नया रंग रूप' मान रहे हैं, जो चुनाव से पहले किए गए स्पष्ट वादे को पूरा करने में नाकामी दिखाता है।
बकाया महंगाई भत्ते को लेकर भी कर्मचारी चिंतित हैं। विपक्ष में रहते हुए महंगाई भत्ता आंदोलन का समर्थन करने के बावजूद, मौजूदा मुख्यमंत्री अप्रैल के लिए महंगाई भत्ता में पहले से की गई 4% की बढ़ोतरी की बजटीय घोषणा पर चुप हैं। 2009 के रोपा नियमों से जुड़ा कानूनी विवाद अभी भी जारी है और इसका कोई समाधान नहीं निकला है। ऐसा लगता है कि मौजूदा सरकार भी पिछली सरकार की तरह ही, राजकोषीय घाटे और अदालत में मामले के लंबित रहने का हवाला देकर मामले को टालने की रणनीति अपना रही है। केंद्र और राज्य के बीच महंगाई भत्ता के मौजूदा 42% के अंतर को पाटना अब और भी मुश्किल लग रहा है। *कानून के राज का ध्वंस* हाल ही में पश्चिम बंगाल की सड़कों पर एक नया उपद्रव खड़ा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं को — जो पहले से ही आपसी कलह से जूझ रहे हैं — सड़कों पर ऐसे हमलों का सामना करना पड़ रहा है, जिन्हें "जनता का गुस्सा" कहा जा रहा है। पिछले पंद्रह सालों में, वामपंथी लोग भी इसी तरह के सुनियोजित और बर्बर हमलों का बार-बार शिकार होते रहे हैं ; तथाकथित "जनता के गुस्से" की आड़ में उन पर नियमित रूप से हमले किए जाते रहे हैं, ताकि उनकी आवाज़ को दबाया जा सके। अभिषेक बनर्जी या कल्याण बनर्जी जैसी हस्तियों से जुड़ी घटनाएँ दो अलग-अलग सच्चाईयों की ओर इशारा करती हैं : पहली, ये घटनाएं एक बेहद कमज़ोर न्यायिक व्यवस्था की ओर संकेत करती हैं, जहाँ बड़े बदलाव के दावों के बावजूद, कानून का राज कमज़ोर बना हुआ है, क्योंकि सड़कों पर स्थापित प्रशासनिक और वैधानिक मानदंडों की बार-बार अवहेलना की जाती है ; दूसरी, ये शारीरिक हमले अनजाने में एक राजनीतिक पुनरुद्धार को बढ़ावा दे रहे हैं, क्योंकि ये जनता का ध्यान फिर से तृणमूल कांग्रेस की ओर खींच रहे हैं — संभवतः उस विपक्षी दल को फिर से जीवित कर रहे हैं, जो आंतरिक कलह, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों और जनता से दूरी के कारण लगभग पूरी तरह से हाशिए पर चला गया है।
मौजूदा प्रशासनिक माहौल में बुनियादी मानवीय गरिमा के पतन पर मानवाधिकार कार्यकर्ता और भी सवाल उठा रहे हैं। वे पूछ रहे हैं कि क्या किसी आरोपी को — भले ही उसका अपराध कितना भी जघन्य क्यों न हो — कमर में रस्सी बांधकर, अर्धनग्न अवस्था में सड़कों पर घुमाना, मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन नहीं है? उन्हें आशंका है कि भले ही यह सख़्त रवैया शुरुआत में अपराधियों को निशाना बनाता हो, लेकिन अंततः यह व्यवस्था को जवाबदेह ठहराने के किसी भी वैध मानवीय अधिकार को खतरे में डाल देगा। *नौकरशाही की भूलभुलैया* चुनावी वादे के मुताबिक 'लक्ष्मी भंडार' से 'अन्नपूर्णा योजना' की ओर बदलाव, प्रशासनिक रवैये में आए एक और स्पष्ट परिवर्तन को उजागर करता है। शुरुआत में, भाजपा ने यह घोषणा की थी कि जो भी लोग पहले मिलने वाली कल्याणकारी आर्थिक सहायता प्राप्त करते थे, उन्हें नई 'अन्नपूर्णा योजना' के तहत अपने-आप ही 3,000 रुपये मिलने लगेंगे। बहरहाल, चुनाव समाप्त होते ही, भाजपा का एक बिल्कुल ही अलग चेहरा सामने आया है। इस घोषणा के बावजूद कि यह योजना 1 जून को शुरू होगी और मौजूदा लाभार्थियों के खातों में फंड अपने-आप ट्रांसफर हो जाएगा, हकीकत में कहीं ज़्यादा मुश्किल भरी साबित हुई है। अब इस योजना का लाभ उठाने के लिए एक जटिल 12-पृष्ठ का आवेदन पत्र भरना ज़रूरी हो गया है। यह शर्त लाखों वंचित महिलाओं के लिए भारी परेशानी का सबब बन गई है।
इस विस्तृत नए दस्तावेज़ को भरने में बहुत ज़्यादा बारीकियों की ज़रूरत है, जिसमें आवेदक की पहचान के साथ ही संवेदनशील दस्तावेज़ और मतदाता का पूरा डेटा शामिल है। इसके अलावा, इसमें परिवार के हर सदस्य की निजी पहचान और आय की जानकारी देना ज़रूरी है, साथ ही यह भी साफ़-साफ़ बताना होगा कि क्या घर में तीन से ज़्यादा कमरे हैं। इस तरह की बारीक जाँच से मज़दूर वर्ग में काफ़ी चिंता फैल गई है कि इस फ़ॉर्म को भरते समय वे कहीं कोई ऐसी ग़लती न कर बैठें, जिससे वे अयोग्य घोषित हो जाएँ। "क्या इस फ़ॉर्म का मकसद मदद देना है, या यह लोगों को बाहर करने की वजहें पहचानने का एक ज़रिया है? हर घर के सदस्य की निजी जानकारी या हमारी प्रॉपर्टी के कागज़ात की ज़रूरत क्यों है?" — राज्य भर में नाराज़ औरतें इन नई शर्तों पर सवाल उठा रही हैं। इस बीच, राज्य की महिला एवं बाल कल्याण मंत्री, अग्निमित्रा पॉल ने कहा कि सिर्फ़ इस फ़ॉर्म को सही-सही भर देने से यह गारंटी नहीं मिलती कि किसी को अन्नपूर्णा योजना का पैसा मिल ही जाएगा; उन्होंने कहा कि कई दूसरे पहलुओं की भी बारीकी से जाँच की जाएगी। मंत्री के इस बयान के बाद, और ज़्यादा भ्रम फैल गया है। लोग साफ़ तौर पर देख रहे हैं कि चुनावों से पहले, नई योजनाओं के तहत मिलने वाले फ़ायदों की एक पूरी लिस्ट जारी की गई थी; लेकिन अब, उन्हें असल में जो मिल रहा है, वह उन तरीकों की एक पूरी लिस्ट है, जिनका इस्तेमाल कुछ खास लोगों को ये फ़ायदे मिलने से रोकने के लिए किया जा रहा है। *खोखले वादे* इन ढांचागत रुकावटों को और भी गंभीर बना रहा है एक ज़बरदस्त आर्थिक झटका। मोदी सरकार ने महज़ 15 से 20 दिनों के भीतर ही पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में चार बार बढ़ोतरी कर दी है। कीमतों में लगातार हो रही इस बढ़ोतरी का असर पूरे बाज़ार पर पड़ रहा है, जिससे ज़रूरी चीज़ों के दाम आसमान छू रहे हैं और आम आदमी के रसोई के बजट पर भारी मार पड़ रही है। पूरे देश में ईंधन की कीमतों में सबसे ज़्यादा बढ़ोतरी कोलकाता में दर्ज की गई है, जहाँ पेट्रोल की कीमत 113.51 रूपये प्रति लीटर और डीज़ल की कीमत 99.82 रूपये तक पहुँच गई है। पिछली सरकार से टैक्स में राहत की मांग करने के बावजूद, मौजूदा भाजपा नेतृत्व ने ईंधन पर लगने वाले अपने हिस्से के टैक्स को माफ करने के मामले में पूरी तरह से चुप्पी साध ली है। इसी तरह, चुनाव से पहले वीडियो में प्रचार किया गया था कि खाना पकाने वाला गैस सिलेंडर सिर्फ़ 450 रूपये में देने का वादा किया गया था, लेकिन वह भी पूरा नहीं हो पाया है। ये सब बस सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर वायरल वीडियो बनकर ही रह गए हैं। अपने रिकॉर्ड का बचाव करने के लिए, सरकार के समर्थक 1 जून को महिलाओं के लिए शुरू की गई मुफ़्त बस यात्रा योजना का हवाला देते हैं। बहरहाल, आलोचकों का कहना है कि ज़्यादातर रूटों पर यह उपाय महज़ कागज़ी है, क्योंकि राज्य के बस बेड़े को काफ़ी समय पहले ही बड़े पैमाने पर खत्म कर दिया गया था। नीले और सफ़ेद रंग की सरकारी बसें मुख्य यात्रा मार्गों पर लगभग न के बराबर ही दिखाई देती हैं, जिससे परिवहन निगम (डब्ल्यूबीटीसी) ल के कई डिपो खाली पड़े हैं।
इस संकट के कारण नागरिकों को निजी बसों, ऑटो-रिक्शा और ई-रिक्शा (टोटो) पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जो ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण लगातार महंगे होते जा रहे हैं। जैसा कि डोमकल से वामपंथी विधायक मुस्तफिजुर रहमान (राणा) ने मुख्यमंत्री को लिखे एक पत्र में उल्लेख किया है, बहरामपुर-डोमकल-जलांगी जैसे मार्गों पर सरकारी बस सेवा तो बिल्कुल नहीं है। *ग्रामीण बहिष्करण* ग्रामीण क्षेत्रों में संकट का और भी खतरनाक आयाम धीरे-धीरे सामने आ रहा है : भाजपा सरकार राज्य के नौ प्रमुख जिलों में धान की खरीद नहीं करेगी। फिलहाल यह निर्देश रबी सीजन के लिए जारी किया गया है। इस रबी मौसम में धान की खरीद के दायरे से पूरी तरह बाहर रखे गए जिले हैं : कूच बिहार, जलपाईगुड़ी, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, बीरभूम, बांकुड़ा और पूर्व मेदिनीपुर। इन नौ जिलों के किसानों से खरीद पूरी तरह रोकने के फैसले के साथ-साथ, सुवेंदु अधिकारी सरकार ने खरीदी के कुल लक्ष्यों में भी भारी बदलाव किया है। पिछले वित्तीय वर्ष की तुलना में रबी मौसम में धान की खरीद का कुल लक्ष्य 60 प्रतिशत कम कर दिया गया है। यह पिछले साल के 5 लाख मीट्रिक टन से घटकर मात्र 2 लाख मीट्रिक टन रह गया है। प्रशासन ने यह भी सूचित किया है कि वह सेंट्रल पूल' के लिए किसी भी धान की खरीद नहीं करेगा, और सारी गतिविधियाँ पूरी तरह से 'स्टेट पूल' तक ही सीमित रहेंगी। इस परिचालन बंदी के कारण, इन महत्वपूर्ण कृषि केंद्रों के लाखों किसान सरकारी बिक्री माध्यमों से पूरी तरह वंचित हो गए हैं, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर यह आबादी शोषण करने वाले बिचौलियों और दलाल गिरोहों के हाथों 'मजबूरी में कम दाम पर बेचने' के लिए विवश हो गई है। *सामाजिक सुरक्षा पर प्रहार* पिछड़े अल्पसंख्यकों को ओबीसी आरक्षण से वंचित करना भाजपा का चुनाव-पूर्व का एक प्रमुख एजेंडा था, और सत्ता में आते ही उन्होंने इसे वापस लेने की दिशा में तेज़ी से कदम उठाए हैं। 2011 से पहले मौजूद आरक्षण सूची का सख्ती से पालन करते हुए, सुवेंदु अधिकारी सरकार ने प्रभावी रूप से ओबीसी आरक्षण कोटा को 17% से घटाकर 7% कर दिया है। यह 17% कोटा फरवरी 2010 में बुद्धदेव भट्टाचार्य की वाम मोर्चा सरकार द्वारा 'ओबीसी-ए' श्रेणी के तहत स्थापित किया गया था। यह कदम मुस्लिम समुदाय के अत्यंत गरीब और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग की स्पष्ट सिफारिशों के बाद उठाया गया था। राज्य मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने इस आरक्षण को वापस लेने के कदम का बचाव करते हुए, पुरानी आरक्षण व्यवस्था को "वोट-बैंक की राजनीति" और "तुष्टीकरण" करार दिया है। उनका कहना है कि इस आरक्षण के कारण पात्र हिंदू समुदाय हाशिए पर चले गए है। उन्होंने पिछड़ा वर्ग के लिए राष्ट्रीय आयोग (एनसीबीसी) से इस मामले की समीक्षा करवाने के लिए औपचारिक रूप से पहल करने की भी घोषणा की है। इस नीतिगत बदलाव पर राजनीतिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति की प्रदेश अध्यक्ष जहानआरा खान ने चेतावनी दी है कि इस फैसले को वापस लेने से लगभग 2 करोड़ गरीब अल्पसंख्यकों से उनके विकास के संवैधानिक अधिकार छिन जाएंगे। वाम मोर्चा के नेताओं ने इस फैसले की कड़ी निंदा करते हुए इसे अल्पसंख्यकों के प्रति पूर्वाग्रह का एक खुला प्रदर्शन बताया है, जिससे पूरे राज्य में सामाजिक-आर्थिक प्रगति बाधित होगी और धार्मिक ध्रुवीकरण और गहराएगा। *स्मार्ट हमला* बिजली व्यवस्था का प्रबंधन भी अब एक बड़े और आक्रामक प्रशासनिक बदलाव का निशाना बन गया है। अब यह साफ़ हो गया है कि चुनाव से पहले किया गया "200 यूनिट मुफ़्त बिजली" का वादा, असल में चुनाव प्रचार का एक हथकंडा (जुमला) भर था। इसके विपरीत, 'डबल-इंजन' वाली सरकार ने राज्य के बिजली उपभोक्ताओं पर दोतरफ़ा हमला करने की पूरी योजना तैयार कर ली है — जिसके तहत बिजली की दरें बढ़ाई जाएंगी और साथ ही 'स्मार्ट मीटर' लगाने का काम भी शुरू किया जाएगा। चुनावों से पहले, भाजपा ने अपने घोषणापत्र (संकल्प पत्र) में राज्य के उपभोक्ताओं को 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली देने का स्पष्ट वादा किया था। इसके बावजूद, उस वादे को पूरा करने से पहले ही, केंद्र और राज्य सरकारों ने उपभोक्ताओं पर बढ़ी हुई दरों और स्मार्ट प्रीपेड मीटरों के रूप में दोहरी मार डाल दी है। राजारहाट में केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर, राज्य मंत्री अग्निमित्रा पॉल और विभिन्न अधिकारियों के बीच हुई एक बैठक के बाद, बिजली के लिए एक संयुक्त रूपरेखा को अंतिम रूप दिया गया। चुनाव से पहले किए गए कल्याणकारी वादों से हटकर, सरकार इस जुलाई से डब्ल्यूबीएसईडीसीएल नेटवर्क के तहत 2 करोड़ घरों में स्मार्ट मीटर लगाना शुरू करेगी। बाद में ये मीटर प्रीपेड यूनिट में बदल जाएंगे, जिससे उपभोक्ताओं को पूरी राशि पहले से ही चुकानी होगी।
*एक चिंताजनक रुझान* पश्चिम बंगाल में नई सरकार के पहले महीने ने चुनावी वादों और शासन की असलियत के बीच एक गहरी खाई को उजागर कर दिया है। बुनियादी सुविधाओं के प्रबंधन और आर्थिक कल्याण से लेकर नागरिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुरक्षा के उपायों तक — तेज़ी से जनता को राहत देने के बजाय भाजपा सरकार का फोकस नौकरशाही के आक्रामक पुनर्गठन, वित्तीय सख्ती और वैचारिक ध्रुवीकरण की ओर मुड़ गया है। आम नागरिकों के लिए, जिन "अच्छे दिनों" का वादा किया गया था, वे इसके बजाय बढ़ती कीमतों, व्यवस्थागत बहिष्कार और बढ़ती प्रशासनिक बेचैनी की एक जटिल भूलभुलैया बनकर सामने आए हैं। इस बीच, राज्य विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल, तृणमूल कांग्रेस, पूरी तरह से बिखर रही है ; मीडिया रोज़ाना उनके भयानक आपराधिक अतीत की घटनाओं को उजागर कर रहा है। इसके साथ ही, भाजपा का अपने पहले के वादों से पीछे हटना लोगों को वामपंथी और लोकतांत्रिक ताकतों को एक वास्तविक विकल्प के रूप में देखने के लिए प्रेरित कर रहा है। *(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।
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