मध्य पूर्व तनाव का असर, लेकिन भारत तैयार: संसाधनों का संयमित उपयोग अनिवार्य
मध्य पूर्व तनाव का असर, लेकिन भारत तैयार: संसाधनों का संयमित उपयोग अनिवार्य। -
■ सुनील कुमार महला
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण विश्व के कई हिस्सों में पिछले कुछ समय से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो रही है, जिससे ऊर्जा संकट की स्थिति बनती दिखाई दे रही है। ऐसे समय में यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, असीमित नहीं। इसलिए उनका उपयोग सोच-समझकर और जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए, क्योंकि उन्हें अनावश्यक रूप से बर्बाद करने का अधिकार किसी को नहीं है। इसी संदर्भ में भारत सरकार ने 26 मार्च 2026 (गुरुवार) को यह स्पष्ट किया है कि देश में पेट्रोल और एलपीजी की आपूर्ति पूरी तरह सुरक्षित है और स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि वे सोशल मीडिया पर फैल रही भ्रामक और दुष्प्रचारपूर्ण खबरों पर ध्यान न दें, क्योंकि इनका उद्देश्य केवल भय और घबराहट पैदा करना है।पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, भारत के पास कुल 74 दिनों की भंडारण क्षमता है, जिसमें वर्तमान में लगभग 60 दिनों का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। इस भंडार में कच्चा तेल, पेट्रोलियम उत्पाद तथा भूमिगत रणनीतिक भंडारण शामिल हैं।
मंत्रालय ने यह भी बताया कि मध्य-पूर्व संकट के 27वें दिन तक देश में कहीं भी पेट्रोल, डीजल या एलपीजी की कोई कमी नहीं है। सरकार के अनुसार, हर नागरिक के लिए लगभग दो महीने तक निरंतर ईंधन आपूर्ति सुनिश्चित है, चाहे वैश्विक परिस्थितियां कैसी भी हों। इसके अतिरिक्त, सरकार ने अगले दो महीनों के लिए कच्चे तेल की खरीद पहले से ही सुनिश्चित कर ली है। इतना ही नहीं, मीडिया के हवाले से यह भी खबरें आईं हैं कि सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटा दी है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पेट्रोल-डीजल पर ₹10 की कटौती की गई है, इससे फिलहाल पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ेंगे। यह अच्छी बात है कि केंद्र सरकार ने तेल कंपनियों और आम जनता को राहत देते हुए पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी को 13 रुपए प्रति लीटर से घटाकर 3 रुपए कर दिया गया है तथा डीजल पर यह ड्यूटी पूरी तरह खत्म यानी जीरो कर दी गई है। बहरहाल, जहां कुछ देशों में ईंधन की कीमतों में वृद्धि, राशनिंग और पेट्रोल पंपों के बंद होने जैसी स्थिति देखने को मिल रही है, वहीं भारत में ऐसी कोई स्थिति नहीं है और किसी आपातकालीन कदम की आवश्यकता भी नहीं पड़ी है।बहरहाल, यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि संकट की इस घड़ी में समाज की वास्तविक परीक्षा एकजुटता और जिम्मेदारी में निहित होती है।
इतिहास गवाह है कि जब भी कोई बड़ा संकट आता है-चाहे वह महामारी हो, प्राकृतिक आपदा या आर्थिक मंदी-तब केवल आम जनता ही नहीं, बल्कि प्रशासन और व्यापारिक वर्ग की जिम्मेदारी भी कई गुना बढ़ जाती है। दुर्भाग्यवश, ऐसे समय में कालाबाजारी और मुनाफाखोरी जैसी प्रवृत्तियां भी उभरती हैं, जो कृत्रिम कमी पैदा कर आम लोगों की कठिनाइयों को और बढ़ा देती हैं। वास्तव में,कालाबाजारी और मुनाफाखोरी समाज की आर्थिक व्यवस्था को भीतर से खोखला कर देती हैं।यह न केवल आम जनता की जेब पर बोझ डालती है, बल्कि विश्वास की नींव को भी कमजोर करती है। आवश्यक वस्तुओं की कृत्रिम कमी पैदा कर कीमतें बढ़ाना नैतिक और कानूनी दोनों रूप से गलत है।सच तो यह है कि ऐसे समय में गरीब और मध्यम वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। ऐसे में सरकार को सख्त कानून और प्रभावी निगरानी व्यवस्था लागू करनी चाहिए।साथ ही, दोषियों पर कड़ी कार्रवाई से ही इसका सही समाधान संभव है। जनता को भी जागरूक रहकर ऐसे कृत्यों का विरोध करना चाहिए।ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ व्यापार करना ही स्वस्थ समाज की पहचान है।वास्तव में, हमें यह समझना होगा कि वास्तविक शक्ति संसाधनों को जमा करने में नहीं, बल्कि उन्हें जरूरतमंदों तक सही तरीके से पहुंचाने में है।
कालाबाजारी भले ही अल्पकालिक लाभ दे, लेकिन यह समाज के विश्वास और नैतिक आधार को कमजोर करती है। इसके विपरीत, यदि व्यापारी, उद्योगपति, प्रशासन और आम नागरिक मिलकर ईमानदारी, पारदर्शिता और सहयोग का मार्ग अपनाएं, तो किसी भी संकट के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अंततः, यही समय है जब हमें यह सिद्ध करना होगा कि हमारी सभ्यता स्वार्थ पर नहीं, बल्कि एकता, संवेदना और सहभागिता जैसे मूल्यों पर आधारित है। यही भावना न केवल संकट से उबरने में सहायक होती है, बल्कि एक मजबूत और सुदृढ़ राष्ट्र की नींव भी रखती है।