गाँधी और शास्त्री जयंती पर विशेष - लाठी से हल तक

Sep 30, 2026 - 09:55
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गाँधी और शास्त्री जयंती पर विशेष -   लाठी से हल तक

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गाँधी और शास्त्री जयंती पर विशेष - लाठी से हल तक

 डॉ. विवेकानंद उपाध्यायवरिष्ठ स्तम्भकार, (देवरिया)

 कल्पना कीजिए, एक ही आसमान में दो सितारे एक ही घड़ी में टिमटिमाते हैं। एक बुझता नहीं, दूसरा उगता है। देखने वाले को लगता है यह संयोग है, पर इतिहास जानता है कि यह प्रयोग है। 2 अक्टूबर की सुबह कुछ ऐसी ही है। घड़ी की सुई जब उसी निशान पर आती है तो भारत के भाग्य के दो पहिए एक साथ घूमते हैं। एक पहिया लाठी का है, जो बिना मारे भी साम्राज्य को तोड़ देता है और दूसरा पहिया हल का है, जो बिना शोर के भी भूखे देश को जिता देता है। एक ही तारीख, दो जन्म और एक ही सवाल - क्या सादगी में इतनी ताकत हो सकती है कि दुनिया झुक जाए? हाँ, हो सकती है और उसी का नाम है गाँधी और शास्त्री।

1869 में पोरबंदर की एक हवेली में जन्मे मोहनदास और 1904 में मुगलसराय की मिट्टी में जन्मे लाल बहादुर, दोनों के बीच पैंतीस साल का फासला, पर किस्मत का धागा एक जैसा। दोनों के सिर से बचपन में ही पिता का साया उठ गया, दोनों की जेब खाली, पैरों में चप्पल तक नहीं। एक को स्कूल जाने के लिए गंगा तैरनी पड़ती थी, दूसरे को इंग्लैंड में वकालत के दिनों में एक वक्त का खाना छोड़ना पड़ता था, पर दोनों ने अभाव को अपना हथियार बना लिया। गाँधी जी को दक्षिण अफ्रीका की उस ठंडी रात में प्रिटोरिया जाने वाली ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे से रंग के कारण धक्के मारकर बाहर फेंक दिया गया। प्लेटफॉर्म पर ठिठुरते हुए उस अपमानित वकील ने प्रण लिया कि अब लड़ाई सीट की नहीं, सम्मान की होगी और वहीं से एक ऐसे हथियार का जन्म हुआ जिसकी काट आज तक दुनिया की कोई सेना नहीं खोज पाई - सत्याग्रह। यह कहता था तुम्हारे पास बंदूक है, मेरे पास भूखा रहने की ताकत है, तुम मेरी हड्डी तोड़ सकते हो, मेरा सच नहीं। उन्होंने देश को चरखा दिया। यह चरखा सूत नहीं कातता था, गुलामी काटता था। उन्होंने खादी को गरीब का कपड़ा नहीं, स्वाभिमान का कवच बना दिया। वे कहते थे दुनिया कहती है ईश्वर सत्य है, मैं कहता हूँ सत्य ही ईश्वर है, यानी अगर तुम सच पर खड़े हो तो तुम अकेले भी बहुमत हो। उनका दूसरा सूत्र था साधन ही साध्य है, गलत रास्ते से सही मंजिल कभी नहीं मिलती, हिंसा से मिला स्वराज, स्वराज नहीं होगा। और उनका तीसरा मंत्र, जिसे वे ताबीज कहते थे, कोई भी फैसला लेने से पहले सोचो कि उसका असर आखिरी पंक्ति में खड़े सबसे कमजोर आदमी पर क्या पड़ेगा।

तभी तो जब देश आजादी का जश्न मना रहा था, गाँधी जी नोआखली की खून से सनी गलियों में लोगों के आँसू पोंछ रहे थे, क्योंकि उनके लिए कुर्सी नहीं, इंसान बड़ा था। और उसी विचार की गोद में पले थे शास्त्री जी। धोती-कुर्ता, नंगे पाँव, बेहद धीरे बोलने वाले एक मास्टर से दिखने वाले आदमी, पर भीतर वही आग। रेल मंत्री थे, एक बड़ा रेल हादसा हुआ, किसी ने इस्तीफा नहीं माँगा, पर उन्होंने खुद आगे आकर कहा मेरी नैतिक जिम्मेदारी है और इस्तीफा दे दिया। प्रधानमंत्री बने तो भी वही फटी धोती, वही छोटा-सा घर। एक बार बेटे ने सरकारी गाड़ी निजी काम के लिए इस्तेमाल कर ली, पता चला तो उन्होंने किलोमीटर का हिसाब लगवाया और उतने पैसे अपनी जेब से सरकारी खजाने में जमा करा दिए। एक और रूपक देखिए, गाँधी जी की लाठी सहारा देती थी, शास्त्री जी का हल सहारा देता था, एक बुढ़ापे को चलाता था, दूसरा पूरे देश को खिलाता था। और फिर आया 1965 का वो अंधेरा साल। खेत सूखे, अनाज खत्म, अमेरिका लाल गेहूँ देने के नाम पर धमका रहा था और उसी घड़ी पाकिस्तान ने युद्ध थोप दिया। घर में भूख, सरहद पर गोलियाँ, खजाना खाली। तब रामलीला मैदान में खड़े होकर उस छोटे कद के आदमी ने दो शब्दों में देश की रीढ़ सीधी कर दी - जय जवान, जय किसान। उन्होंने कहा देश सोमवार को एक वक्त उपवास रखेगा और खुद अपने बच्चों के साथ भूखे रहे, प्रधानमंत्री आवास में चूल्हा एक ही बार जलता था। उसी भूखे देश की सेना ने लाहौर तक तिरंगा गाड़ दिया। ताशकंद में उनकी मृत्यु आज भी एक रहस्य है, पर उनका जीवन एकदम साफ है। अब अंत में सबसे रोचक बात सुनिए। गाँधी जी के पास दुनिया की सबसे बड़ी ताकत थी, पर जेब में एक लाठी के सिवा कुछ नहीं था।

शास्त्री जी के पास देश की सबसे बड़ी कुर्सी थी, पर घर में अपनी खुद की एक कार तक नहीं थी, प्रधानमंत्री रहते हुए भी उन्हें कार किस्तों पर लेनी पड़ी थी और मरते वक्त वह किस्त भी पूरी नहीं हुई थी। सोचिए, एक ने लाठी से अंग्रेजों को हराया, दूसरे ने हल से भूख को हराया, दोनों के पास कुछ नहीं था, पर दोनों ने देश को सब कुछ दे दिया। इसलिए 2 अक्टूबर को माला पहनाने से काम नहीं चलेगा। उस दिन आईने के सामने खड़े होकर खुद से एक सवाल पूछिए - अगर आज गाँधी जी मेरी जगह होते तो क्या वे यह झूठ बोलते, और अगर शास्त्री जी मेरी जगह होते तो क्या वे यह फिजूलखर्ची करते। जिसका जवाब नहीं में है, वही इन दोनों की सच्ची जयंती है।

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SuragBureau

Surag Bureau पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और स्थानीय व राष्ट्रीय मुद्दों पर समाचार लेखन करते हैं। हमारा उद्देश्य पाठकों तक सटीक, निष्पक्ष और विश्वसनीय जानकारी पहुंचाना हैं।

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