Article : झोली वाले बाबाओं से सावधानी ज़रूरी

Apr 16, 2026 - 20:48
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झोली वाले बाबाओं से सावधानी ज़रूरी

आस्था के नाम पर फैलते छल से बचकर ही सुरक्षित रहेगी किसान की मेहनत

 - डॉ. सत्यवान सौरभ

उत्तर भारत के गाँवों में गेहूँ की कटाई केवल एक मौसम नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव होती है। यह वह समय है जब किसान की महीनों की तपस्या, धूप में जले हाथ, सर्द रातों की पहरेदारी और अनिश्चित मौसम के साथ लड़ी गई जंग अंततः रंग लाती है। खेतों में झूमती सुनहरी बालियाँ किसी साधारण फसल का दृश्य नहीं, बल्कि आशा, संघर्ष और आत्मसम्मान का प्रतीक होती हैं। जब यही फसल कटकर घर के आँगन में ढेर बनाती है, तो वह केवल अनाज नहीं होती—वह पूरे साल की सुरक्षा होती है, बच्चों की पढ़ाई का आधार, बीमारियों में सहारा, और भविष्य की अनिश्चितताओं से लड़ने की ताकत होती है। घर की महिलाएँ उस अनाज को सहेजती हैं, साफ करती हैं, सुखाती हैं और बड़े जतन से उसे भंडार में रखती हैं, क्योंकि वे जानती हैं कि यही दाने आने वाले समय में घर की नींव को मजबूत बनाए रखेंगे। लेकिन इस सुनहरे और संतोष भरे दृश्य के साथ ही एक ऐसी परछाईं भी गाँव की गलियों में उतरने लगती है, जो धीरे-धीरे इस खुशी को कम करने लगती है। यह परछाईं है झोली लेकर घूमने वाले तथाकथित बाबाओं और मोड़ों की, जो इसी मौसम का इंतजार करते हैं। जैसे ही अनाज घरों में आता है, ये लोग अचानक गाँवों में दिखाई देने लगते हैं।

उनके वस्त्र, उनका रूप और उनकी वाणी सब कुछ इस तरह से रचा गया होता है कि वे श्रद्धा के पात्र प्रतीत हों। माथे पर तिलक, सिर पर पटका या टोपी, रंग-बिरंगे कपड़े और हाथ में एक झोली—यह सब मिलकर एक ऐसा रूप तैयार करते हैं, जिसे देखकर सामान्य ग्रामीण सहज ही प्रभावित हो जाता है। वे घर-घर जाकर दरवाजे पर खड़े होते हैं और मीठे शब्दों में आशीर्वाद देते हैं—“भगवान भला करेगा”, “माता रानी कृपा बनाए रखे”—और बदले में कुछ अनाज या पैसे की अपेक्षा रखते हैं। गाँवों में दान और सेवा की परंपरा सदियों से चली आ रही है। यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है, जो आपसी सहयोग और सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत करती है। खासकर महिलाएँ इस परंपरा को निभाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे घर की दहलीज पर खड़ी होकर आने-जाने वालों का स्वागत करती हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देती हैं। उनके लिए यह केवल एक सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आस्था का हिस्सा होता है। लेकिन यही आस्था कई बार उनकी कमजोरी बन जाती है, जब कुछ लोग इसका लाभ उठाने लगते हैं। एक घर से दी गई एक मुट्ठी गेहूँ शायद बहुत छोटी बात लगती है। देने वाले को लगता है कि इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन यही प्रक्रिया जब पूरे गाँव में दोहराई जाती है, तो यह छोटी-छोटी मुट्ठियाँ मिलकर एक बड़े ढेर में बदल जाती हैं।

दिन भर में सैकड़ों घरों से इकट्ठा किया गया अनाज शाम तक एक बड़ी मात्रा में पहुँच जाता है। इसके बाद यह अनाज अक्सर बाजार में बेच दिया जाता है, और उससे प्राप्त धन का उपयोग जरूरी जरूरतों के बजाय नशे, जुए या अन्य अनुचित गतिविधियों में होने की शिकायतें सामने आती हैं। इस प्रकार, जो अनाज किसान ने अपने खून-पसीने से उगाया था, वह धीरे-धीरे ऐसे हाथों में चला जाता है जहाँ उसका सम्मान नहीं होता। यह केवल आर्थिक नुकसान की बात नहीं है, बल्कि यह विश्वास के टूटने की कहानी भी है। जब कोई व्यक्ति धर्म और आस्था का सहारा लेकर किसी की मेहनत का लाभ उठाता है, तो वह केवल संसाधनों की चोरी नहीं करता, बल्कि सामाजिक मूल्यों को भी कमजोर करता है। इससे भी अधिक चिंताजनक स्थिति तब होती है जब कुछ लोग दान न देने पर डराने-धमकाने का सहारा लेते हैं। “अगर दान नहीं दिया तो अनिष्ट होगा”, “घर में अशांति आ जाएगी”—ऐसे शब्द केवल अंधविश्वास को बढ़ावा नहीं देते, बल्कि लोगों के मन में अनावश्यक भय भी पैदा करते हैं। यह भय खासकर महिलाओं और बुजुर्गों को प्रभावित करता है, जो पहले से ही धार्मिक मान्यताओं से गहराई से जुड़े होते हैं। हालाँकि, इस पूरी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। समाज में ऐसे लोग भी हैं जो वास्तव में जरूरतमंद हैं—बुजुर्ग, विकलांग या ऐसे व्यक्ति जिनके पास जीवनयापन का कोई साधन नहीं है। उनके लिए भिक्षा माँगना कोई विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी होती है। उनके चेहरे पर बनावटीपन नहीं, बल्कि संघर्ष और थकान की सच्चाई झलकती है। इसलिए हर झोली लेकर आने वाले व्यक्ति को एक ही नजर से देखना उचित नहीं होगा।

यही वह बिंदु है जहाँ विवेक और संवेदनशीलता दोनों की आवश्यकता होती है। समस्या का समाधान केवल विरोध में नहीं, बल्कि समझदारी में छिपा है। सबसे पहले, जागरूकता आवश्यक है। परिवार के सभी सदस्यों को यह समझाना जरूरी है कि दान केवल भावना के आधार पर नहीं, बल्कि सोच-समझकर किया जाना चाहिए। खासकर महिलाओं को यह सिखाना जरूरी है कि वे किसी भी प्रकार के डर या दबाव में आकर निर्णय न लें। यदि कोई व्यक्ति जबरदस्ती करता है या डराने की कोशिश करता है, तो उसका विरोध करना चाहिए और जरूरत पड़ने पर पड़ोसियों या पंचायत की सहायता लेनी चाहिए। दूसरा महत्वपूर्ण कदम है दान की दिशा को सही करना। यदि किसी के मन में देने की भावना है, तो उसे उन लोगों तक पहुँचाना चाहिए जो वास्तव में जरूरतमंद हैं। गाँव में ऐसे कई परिवार होते हैं जो आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, जिनकी मदद से उनका जीवन बेहतर हो सकता है। विधवाएँ, बुजुर्ग, अनाथ बच्चे या शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े जरूरतमंद लोग—ये वे स्थान हैं जहाँ दान का वास्तविक प्रभाव पड़ता है। इससे न केवल संसाधनों का सही उपयोग होता है, बल्कि समाज में आपसी सहयोग और विश्वास भी मजबूत होता है। तीसरा, सामूहिक निर्णय की शक्ति को समझना जरूरी है। यदि पूरा गाँव मिलकर यह तय कर ले कि घर-घर घूमकर अनाज देने की परंपरा को सीमित किया जाएगा, तो इस समस्या का समाधान अपने आप निकल सकता है। अकेले व्यक्ति के लिए मना करना मुश्किल हो सकता है, लेकिन जब पूरा समुदाय एक साथ खड़ा हो, तो स्थिति बदल जाती है। सामूहिक जागरूकता और एकजुटता ही ऐसे शोषण के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है। अंततः यह मुद्दा केवल अनाज का नहीं है, बल्कि उस सम्मान का है जो किसान अपनी मेहनत से अर्जित करता है।

खेत में बहाया गया पसीना केवल पानी नहीं, बल्कि उसके जीवन का एक हिस्सा होता है। उस पसीने से उगा हर दाना अनमोल होता है और उसका सम्मान करना हर समाज का कर्तव्य है। उसे किसी भी प्रकार के छल, दबाव या अंधविश्वास के कारण व्यर्थ जाने देना न केवल आर्थिक हानि है, बल्कि आत्मसम्मान का भी नुकसान है। आस्था हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन आस्था का अर्थ अंधविश्वास नहीं होता। सच्ची आस्था वही है जो विवेक के साथ चलती है, जो सही और गलत के बीच अंतर कर सके। जब आस्था के नाम पर कोई हमारी मेहनत का शोषण करने लगे, तो उसे पहचानना और उससे बचना ही सच्ची समझदारी है। इसलिए समय की मांग है कि हम अपनी परंपराओं का सम्मान करें, लेकिन आँख बंद करके नहीं। हमें अपने समाज, अपने संसाधनों और अपनी मेहनत की रक्षा के लिए जागरूक और सतर्क रहना होगा। क्योंकि अंत में, वही समाज आगे बढ़ता है जो अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, लेकिन बदलते समय के साथ अपनी सोच को भी विकसित करता है। और जब यह समझ हमारे भीतर विकसित हो जाएगी, तब शायद गेहूँ की यह सुनहरी फसल केवल खेतों में ही नहीं, बल्कि हमारे विचारों में भी लहलहाएगी—सम्मान, जागरूकता और विवेक के साथ।