आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को धरातल पर उतारने में मध्यप्रदेश की मोहन सरकार का स्वर्णिम योगदान

Apr 9, 2026 - 21:14
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आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को धरातल पर उतारने में मध्यप्रदेश की मोहन सरकार का स्वर्णिम योगदान
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आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को धरातल पर उतारने में मध्यप्रदेश की मोहन सरकार का स्वर्णिम योगदान

(डॉ. राघवेंद्र शर्मा-विभूति फीचर्स)

मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर और शिल्प कौशल को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राज्य के विकास की एक ऐसी नई पटकथा लिखी है, जो आत्मनिर्भर भारत के स्वप्न को धरातल पर उतारने की दिशा में क्रांतिकारी सिद्ध होगी। हाल ही में मुख्यमंत्री द्वारा समत्व भवन से मृगनयनी उत्पादों के ई-कॉमर्स पोर्टल का शुभारंभ करना केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उन लाखों उपेक्षित और गुमनाम शिल्पकारों के जीवन में आर्थिक समृद्धि का नया सवेरा लाने का संकल्प है, जो पीढ़ियों से अपनी उंगलियों के जादू से माटी, धागे और धातु को जीवंत करते आए हैं। आज के डिजिटल युग में जब बाजार की सीमाएं सिकुड़ रही हैं और उपभोक्ता की पहुंच वैश्विक स्तर पर बढ़ रही है, ऐसे में मध्य प्रदेश के कुटीर और ग्रामोद्योग विभाग की यह पहल प्रदेश के पारंपरिक कौशल को एक नई पहचान दिलाने के साथ-साथ युवाओं और महिलाओं के लिए रोजगार के अनंत द्वार खोलने वाली है।

मुख्यमंत्री का यह दृष्टिकोण कि वर्तमान समय ई-कॉमर्स का है, इस सच्चाई को स्वीकार करता है कि यदि हम अपनी विरासत को समय की मांग के साथ नहीं जोड़ेंगे, तो वह केवल संग्रहालयों तक सीमित रह जाएगी। इस पोर्टल के माध्यम से राज्य के हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पादों को ओएनडीसी (ONDC) जैसे विशाल प्लेटफॉर्म से एकीकृत करने का निर्णय एक मास्टरस्ट्रोक है, क्योंकि इससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त होगी और शिल्पकारों को उनकी मेहनत का सीधा लाभ मिल सकेगा। ​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'वोकल फॉर लोकल' और 'लोकल से ग्लोबल' के मंत्र को साकार करने की दिशा में मध्य प्रदेश सरकार का यह कदम अत्यंत सराहनीय और दूरगामी परिणामों वाला है। प्रदेश के जिला स्तर पर लूम (करघा) केंद्रों को पुनर्जीवित करने और उनके व्यवस्थित संचालन की आवश्यकता पर बल देना यह दर्शाता है कि सरकार केवल बाजार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उत्पादन की जड़ों को भी मजबूत करना चाहती है। जब गांव का एक बुनकर या शिल्पी यह जानता है कि उसके द्वारा निर्मित चंदेरी, महेश्वरी साड़ी या जनजातीय कलाकृतियां अब केवल स्थानीय हाट-बाजारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दिल्ली, मुंबई से लेकर सात समंदर पार तक के खरीदारों की पहुंच में हैं, तो उसका आत्मविश्वास और रचनात्मकता एक नए स्तर पर पहुंच जाती है।

पोर्टल पर 15 श्रेणियों में उपलब्ध लगभग 350 उत्पाद और आगामी समय में इन्हें 1500 से अधिक करने का लक्ष्य यह बताता है कि सरकार एक सुव्यवस्थित योजना के साथ आगे बढ़ रही है। आगामी वर्षों में दो लाख से अधिक कारीगरों और दस लाख उत्पादों को इस प्लेटफॉर्म से जोड़ने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य न केवल आर्थिक आंकड़ा है, बल्कि यह उन लाखों परिवारों के जीवन स्तर में सुधार का एक ब्लू प्रिंट है, जो अपनी पारंपरिक कला को छोड़कर पलायन करने को मजबूर थे। ​इस डिजिटल पहल की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रामाणिकता और पैकेजिंग प्रणाली है। आज के समय में उपभोक्ता केवल उत्पाद नहीं खरीदता, बल्कि वह उस उत्पाद के पीछे की कहानी और उसकी मौलिकता को भी तलाशता है। मृगनयनी पोर्टल के माध्यम से ग्राहकों को मिलने वाला प्रामाणिकता प्रमाण-पत्र और शिल्प विवरण कार्ड न केवल खरीदार का विश्वास जीतेंगे, बल्कि मध्य प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रचार-प्रसार भी करेंगे। जीआई (GI) टैग प्राप्त उत्पादों और ओडीओपी (एक जिला एक उत्पाद) को विशेष प्राथमिकता देकर सरकार ने राज्य की क्षेत्रीय विविधताओं को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करने का अवसर दिया है। यह पहल 'विज़न 2047' के अनुरूप है, जिसमें सशक्त युवा, आत्मनिर्भर नारी और सुरक्षित सांस्कृतिक विरासत की परिकल्पना की गई है। जनजातीय कलाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना न केवल सामाजिक न्याय है, बल्कि यह उन समुदायों के आर्थिक सशक्तिकरण का मार्ग भी है जो सदियों से अपनी कला को सहेजते आए हैं।

जब राज्य का हर कारीगर डिजिटल बाजार का हिस्सा बनेगा, तो वह केवल एक विक्रेता नहीं रहेगा, बल्कि वह मध्य प्रदेश का सांस्कृतिक राजदूत बनकर उभरेगा। ​मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में लिया गया यह निर्णय कुटीर और लघु उद्योगों के प्रति सरकार की संवेदनशीलता और प्रगतिशील सोच को उजागर करता है। यह पोर्टल रोजगार सृजन के एक सशक्त माध्यम के रूप में उभरेगा, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के लिए, जो घर बैठे अपनी कला को बाजार में बेच सकेंगी। आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश के निर्माण में यह कदम मील का पत्थर साबित होगा, क्योंकि यह परंपरागत ज्ञान को आधुनिक प्रबंधन के साथ जोड़ता है। अत्याधुनिक तकनीक और सरल यूजर इंटरफेस के साथ विकसित किया गया यह प्लेटफॉर्म बायर-सेलर के बीच की दूरियों को पाटकर एक सुदृढ़ पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करेगा। अंततः, यह पहल मध्य प्रदेश के शिल्पकारों के सपनों को एक नई उड़ान देने वाली है, जिससे न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि मध्य प्रदेश की कला और संस्कृति का परचम पूरी दुनिया में लहराएगा। यह बदलाव की वह लहर है, जो राज्य के आर्थिक परिदृश्य को बदल देगी और 'आत्मनिर्भर भारत' के निर्माण में मध्य प्रदेश के योगदान को स्वर्णाक्षरों में अंकित करेगी।