हनुमान चरित्र: सेवा-समर्पण का प्रेरणास्रोत

Apr 1, 2026 - 21:20
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हनुमान चरित्र: सेवा-समर्पण का प्रेरणास्रोत
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*हनुमान चरित्र: सेवा-समर्पण का प्रेरणास्रोत

● डाॅ०राकेश सक्सेना*

रघुनाथ प्रिय, अतुलित बल के धाम, सम्पूर्ण अर्थ-सिद्धियों के आगार,अविनाशी लोकविश्रुत अंजनानंदन श्री हनुमान जी का जन्म शंकर जी के अंश से वायु द्वारा कपिराज केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ से चैत्र शुक्ल पूर्णिमा के दिन मघा नक्षत्र में हुआ था। आपके अवतरण के समय प्रकृति पूर्णतया रम्य हो गई थी, चतुर्दिश हर्षोल्लास दिखाई दे रहा था, माता अंजना और कपिराज केसरी की तो कोई सीमा नहीं थी। दोनों ही मनोयोग से अतिशय प्यार करते हुए अपने प्राणप्रिय पुत्र का लालन-पालन करने लगे। आपकी बाल-क्रीड़ाओं को देखकर वे मन ही मन मुदित होते थे। अंजना सदाचारिणी तपस्विनी आदर्श माता थीं। वह पूजनोपरांत और रात्रि शयन से पूर्व हनुमान जी को पुराणों की कथा सुनाया करतीं थीं। भगवान राम अवतार की कथा प्रारम्भ होते ही बालक का सारा ध्यान उसमें ही केन्द्रित हो जाता था।

माँ को झपकी आती तो हनुमान झकझोर कर कहने लगते कि-- माँ! आगे क्या हुआ? कथा सुनाते-सुनाते वे पूछ बैठतीं थीं कि बेटा! तू भी वैसा ही हनुमान बनेगा? हनुमान उत्तर देते थे कि हाँ, माँ! अवश्य वही हनुमान बनूँगा। बालक हनुमान अत्यंत चंचल और नटखट थे। मृगराज की पूँछ पकड़कर चारों ओर घुमाना, हाथी को पकड़कर उसकी शक्ति का अनुमान लगाना, वृक्षों को मूल सहित हिला देना, इनकी नित्य-प़ति की क्रीड़ाएँ थीं। ऋषियों के आश्रम में उनकी गोद में बैठ जाना, मृगचर्म ओढ़कर पेड़ों पर कूदना या उसे वृक्ष पर टाँग देना, कमण्डल का जल फैला देने से ऋषिगणों को कष्ट होता था किन्तु ब्रह्मादि देवगणों के वरदान से परिचित होने के कारण वे चुप रह जाते थे। शनै:- शनै: उनकी आयु विद्याध्ययन के योग्य हो गई। माता-पिता भी चिंतित रहने लगे। ऋषियों ने जब उनके सामने अपनी कष्ट-गाथा सुनाई तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया कि-- " हे तपोधनों! हमें यह बालक बहुत दिनों के बाद कठोर तप के प्रभाव से प्राप्त हुआ है। आप लोग इस पर अनुग्रह करें! ऐसी कृपा करें, जिससे यह विद्या को प्राप्त कर ले! आप लोगों की करुणा से ही इसका स्वभाव परिवर्तन सम्भव है।

आप हम दोनों पर दया करें! " ऋषियों ने सोचा कि यह अपने पराक्रम अभिमान व बल को भूल जाए तो इसका हित हो सकता है। इस कारण भृगु एवं अंगिरा वंश में उत्पन्न हुए ऋषियों ने हनुमान को शाप दे दिया-- " हे वानरवीर! तुम जिस बल का आश्रय लेकर हमें सता रहे हो, उसे हमारे शाप से मोहित होकर दीर्घकाल तक भूले रहोगे। तुम्हें अपने बल का पता ही न चलेगा। जब कोई तुम्हें, तुम्हारी कीर्ति का स्मरण दिलाएगा, तभी तुम्हारा बल बढ़ेगा। " माता-पिता ने हनुमान जी का उपनयन संस्कार कराया और अन्त में समस्त लोकों के साक्षी भगवान सूर्य देव के पास शिक्षा प्राप्ति के लिए भेज दिया और उनका सविधि विद्याध्ययन हो गया। हनुमान जी का चरित्र सर्वाधिक प्रभावशाली रूप में श्रीराम के परम भक्त और सेवक रूप में सामने आता है।

राम के प्रति उनका समर्पण अद्वितीय है। सीता की खोज, लंका दहन, संजीवनी बूटी लाना, युद्ध में राम की सहायता आदि प्रसंगों में इनका साहस,बुद्धिमत्ता और अटूट भक्ति स्पष्ट दिखाई देती है,इसीलिए भारतीय समाज में हनुमान जी को निष्काम कर्मयोग और परम भक्ति का आदर्श माना जाता है। आपका चरित्र साहस और आत्मबल का प्रतीक है जो कठिन परिस्थितियों में धैर्य और साहस बनाए रखने की प्रेरणा देता है। राम के प्रति इनकी निष्ठा यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं होता। हनुमान जी ने सदैव अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर सेवा और कर्तव्य को प्राथमिकता दी। आज के भौतिकवादी युग में हनुमान का आदर्श अत्यंत प्रासंगिक है। उनका जीवन हमें प्रेरित करता है कि शक्ति तभी सार्थक है जब वह धर्म और सेवा के लिए प्रयुक्त हो! आधुनिक समाज के लिए हनुमान जी की विनम्रता, निस्वार्थ सेवा और समर्पण प्रेरणा का स्रोत है। ■