महिला मछुआरों की पहचान और संघर्ष: ब्लू इकोनॉमी बनाम तटीय जीवन
रामेश्वरम में महिला मछुआरों ने अपने अधिकारों और पहचान के लिए आवाज उठाई है। जानें कैसे सरकारी नीतियां और ब्लू इकोनॉमी उनके जीवन को प्रभावित कर रही हैं।
रामेश्वरम में अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति द्वारा आयोजित सम्मेलन में एक महत्वपूर्ण मांग उठी है कि समाज और सरकार महिला मछुआरों को पुरुषों के समान ही 'मछुआरे' के रूप में मान्यता दें। पंबन पुल के पास बसे इस द्वीप पर, मछली पकड़ने के उद्योग में महिलाओं का योगदान अक्सर 'मदद' के रूप में देखा जाता है, न कि प्राथमिक कार्य के रूप में। यह पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण महिलाओं की मेहनत को कमतर आंकता है, जबकि वास्तविकता यह है कि वे मछली पकड़ने से पहले और बाद की पूरी प्रक्रिया का मुख्य हिस्सा हैं।
श्रम का अदृश्य योगदान और शोषण
वैश्विक स्तर पर, मछली पकड़ने से जुड़े कार्यों में महिलाओं की भागीदारी 55% है। भारत में, मछली पकड़ने के बाद के कामों जैसे छंटाई, सफाई, कटाई और सुखाने में महिलाओं का योगदान 60% से अधिक है। तमिलनाडु में यह आंकड़ा 72% तक पहुंचता है। इसके बावजूद, उन्हें न तो मछुआरा माना जाता है और न ही सरकारी राहत योजनाओं का समान लाभ मिलता है।
समुद्री शैवाल इकट्ठा करने वाली महिलाओं को अत्यधिक जोखिम उठाना पड़ता है। वे बिना किसी सुरक्षा उपकरण के समुद्र में गोता लगाती हैं, जबकि कंपनियां उनसे बहुत कम कीमत पर उत्पाद खरीदकर भारी मुनाफे पर बेचती हैं। इसके अलावा, मछली बेचने के स्थानों पर शौचालय, पीने का पानी और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न और असुरक्षित माहौल उनकी समस्याओं को और गंभीर बना देता है।
ब्लू इकोनॉमी और तटीय संकट
केंद्र सरकार की 2020 की 'ब्लू इकोनॉमी' नीति ने तटीय समुदायों की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। तटीय नियमन क्षेत्र (CRZ) के नियमों में बदलाव कर तटों को कॉर्पोरेट्स और रियल एस्टेट के लिए खोल दिया गया है। संरक्षित क्षेत्र को 500 मीटर से घटाकर 200 मीटर करने का सीधा असर उन समुदायों पर पड़ा है, जो पीढ़ियों से समुद्र पर निर्भर थे।
- संसाधनों पर अधिकार: तटीय विकास के नाम पर आम लोगों को उनकी जीविका के साधनों से दूर किया जा रहा है।
- आर्थिक बोझ: महिला मछुआरों पर भारी कर्ज है, और सरकारी योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुंच पा रहा है।
- सुरक्षा और स्वास्थ्य: एनीमिया जैसी स्वास्थ्य समस्याओं और बुनियादी सुविधाओं की कमी ने उनके जीवन को संघर्षपूर्ण बना दिया है।
सम्मेलन में किए गए जमीनी अध्ययन से पता चला कि 110 महिलाओं में से अधिकांश पर कर्ज है और उन्हें परिवार की संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता। इन महिलाओं ने मांग की है कि सरकार उनके काम को औपचारिक मान्यता दे, समुद्री संसाधनों पर आधारित उद्योगों में उचित मजदूरी तय करे और स्वास्थ्य सेवाओं का उन्नयन करे।
अंततः, समुद्र केवल एक आर्थिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि इन समुदायों का घर है। जब तक सरकार अपनी नीतियों में इन हाशिए पर स्थित महिलाओं की आवाज को शामिल नहीं करेगी, 'ब्लू इकोनॉमी' का लाभ उन तक कभी नहीं पहुंचेगा। लहरों के बीच जीवन बिताने वाली इन महिलाओं का संघर्ष केवल सम्मान का नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व को बचाने की एक अनिवार्य लड़ाई है।
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