अवैध निर्माण और आम आदमी का संघर्ष: भ्रष्ट व्यवस्था की मार
क्या आम आदमी भ्रष्ट सरकारी तंत्र और अवैध निर्माण के खेल की सजा भुगतने को मजबूर है? जानिए आवास नीति और प्रशासनिक विफलता का कड़वा सच।
आम आदमी की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए रोटी, कपड़ा और मकान की उपलब्धता हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है। इन मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक सामान्य व्यक्ति जीवन भर संघर्ष करता है। अधिकांश आबादी का सपना होता है कि उसके सिर पर अपनी छत हो। अपनी जीवन भर की जमा-पूंजी जोड़कर वह जैसे-तैसे अपने लिए एक आशियाना बनाता है या रोजगार के लिए व्यावसायिक प्रतिष्ठान की स्थापना करता है। ऐसे में यदि अचानक उसके इस मकान को 'अवैध निर्माण' बताकर ध्वस्त करने की तलवार लटक जाए, तो उसके सम्मुख जीवन-मरण का प्रश्न उत्पन्न होना स्वाभाविक है। देश के विभिन्न नगरों व महानगरों में आज लाखों लोग इसी आशंका के साये में जी रहे हैं।
भ्रष्टाचार की मिलीभगत और आम आदमी
सत्य यही है कि आम आदमी के सपनों को साकार करने के नाम पर निजी कॉलोनाइजर और सरकारी एजेंसियों का एक गठजोड़ काम करता है। जिन मकानों को अवैध निर्माण की श्रेणी में रखा जाता है, उनमें से अधिकांश निर्माण सरकारी तंत्र की सरपरस्ती में ही फले-फूले होते हैं। चाहे आवास विकास परिषद से जुड़ी संपत्तियां हों, विकास प्राधिकरणों के क्षेत्र हों या निजी कॉलोनियां, इन सभी के निर्माण पर निगरानी रखने का पूर्ण अधिकार संबंधित नगर निकायों के पास होता है।
प्रश्न यह उठता है कि यदि अवैध निर्माणों पर अंकुश लगाने का संवैधानिक दायित्व निभाने वाली एजेंसियां ही अपनी नाक के नीचे ये निर्माण होने दें, तो इसका दोषी कौन है? क्या अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप आवास तलाशने वाला आम नागरिक, या वे भ्रष्ट अधिकारी, जिनके कार्यकाल में यह तथाकथित अवैध निर्माण हुआ? यह एक गंभीर नैतिक और प्रशासनिक विफलता है।
प्रशासनिक विसंगतियां और दोहरा मापदंड
संपत्ति व्यवसाय में अवैध निर्माण को लेकर आज भारी असमंजस की स्थिति है। आम आदमी यह समझ पाने में असमर्थ है कि जीवन भर की कमाई खर्च करने के बाद भी वह अपने घर में सुरक्षित क्यों नहीं है। देश में अक्सर यह देखा गया है कि चुनाव से पहले बड़ी-बड़ी अवैध कॉलोनियों को वैध करने के वादे किए जाते हैं, जो केवल एक राजनीतिक स्टंट बनकर रह जाते हैं। दिल्ली जैसे महानगरों में ऐसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाती रही हैं, जहां पहले निर्माण को अवैध घोषित कर दहशत फैलाई जाती है और बाद में उसे वोट बैंक की राजनीति के लिए नियमित करने का ढोंग किया जाता है।
सुविधाएं कौन दे रहा है?
सबसे विचारणीय बिंदु यह है कि जिन कॉलोनियों को 'अवैध' करार दिया जाता है, उन तक बिजली, पानी, सड़क और रसोई गैस की आपूर्ति कैसे पहुंचती है? क्या विद्युत वितरण कंपनियां और जल निगम यह नहीं जानते कि वे किसी अवैध क्षेत्र को सेवा दे रहे हैं? यदि इन सरकारी विभागों की संलिप्तता के बिना वहां बुनियादी सुविधाएं पहुंचना असंभव है, तो फिर केवल आम आदमी को ही 'अवैध' होने की सजा क्यों दी जाती है?
निष्कर्षतः, जब तक सरकारी तंत्र अपनी जवाबदेही तय नहीं करेगा और अवैध निर्माण के शुरुआती चरण में ही उसे रोकने के बजाय 'अवैध' घोषित करने का खेल जारी रखेगा, तब तक आम आदमी इसी तरह पिसता रहेगा। भ्रष्ट व्यवस्था की सजा केवल उस गरीब या मध्यमवर्गीय व्यक्ति को नहीं मिलनी चाहिए, जिसने अपने सपनों का घर बड़ी उम्मीदों के साथ बनाया था। अब समय आ गया है कि इस नीति में पारदर्शिता लाई जाए और दोषियों पर कार्रवाई हो, न कि उन पर, जो केवल अपने सिर पर छत चाहते हैं।
What's Your Reaction?
Like
0
Dislike
0
Love
0
Funny
0
Wow
0
Sad
0
Angry
0
Comments (0)