दुर्गा पूजा और किताबों पर फासीवादी हमले: एक विश्लेषण
दुर्गा पूजा के दौरान बुक स्टॉल्स पर हो रहे हमलों और फासीवादी प्रवृत्तियों पर मालिनी भट्टाचार्य का विस्तृत आलेख। जानें कैसे बंगाल में प्रतिरोध की नई लहर जगी है।
दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल की जनता का सबसे लोकप्रिय वार्षिक उत्सव है। वामपंथी दलों और उनके सहयोगी संगठनों द्वारा संचालित बुक स्टॉल लंबे समय से इस उत्सव की संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। पंडालों के दर्शन के लिए निकलने वाले लोग इन स्टॉलों पर भी जाते हैं और खाने-पीने के स्टॉल, खिलौने की दुकानों तथा छोटे उद्यमियों व कारीगरों द्वारा लगाए गए घरेलू सामान के स्टॉलों की तरह ही अक्सर यहाँ से भी किताबें खरीदते हैं। मेरा यह अनुमान शायद सही है कि ये बुक स्टॉल अन्य राजनीतिक प्रकाशनों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं, क्योंकि वे केवल पार्टी के प्रचार नहीं, बल्कि साहित्यिक ग्रंथ, विज्ञान, इतिहास और बच्चों की विविध पुस्तकें भी बेचते हैं।
पिछले पंद्रह वर्षों में इन बुक स्टॉलों पर टीएमसी के गुंडों द्वारा कई बार हमले किए गए हैं, जिन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर अपना वर्चस्व जमाने का प्रयास किया है। परंतु ज़मीनी स्तर पर वामपंथी कार्यकर्ताओं ने इन हमलों का मुकाबला किया है। बहरहाल, ये हमले किताबों के खिलाफ़ नहीं थे, बल्कि यह शक्ति प्रदर्शन था। किन्तु इस वर्ष, सत्तासीन नई पार्टी को इन बुक स्टॉलों पर हमला करने का एक नया प्रपंच मिल गया है। भाजपा के नेता इन स्टालों पर बेची जाने वाली किताबों को अनैतिक और राष्ट्र-विरोधी बता रहे थे, जैसे कि इनकी उपस्थिति दुर्गापूजा की पवित्रता को दूषित कर देगी।
प्रतिरोध की मशाल
पूजा के दिनों से पहले से ही, कोलकाता और अन्य नगरों में ऐसे बुक स्टॉल लगाने वालों को धमकियों एवं मारपीट का सामना करना पड़ा है। बिना किसी भय के, इनमें से कई कार्यकर्ताओं ने टूटे हुए स्टॉल पर लौटकर फिर से काम शुरू कर दिया। कुछ ने सड़क के किनारे या तिपहिया वाहनों पर अपनी किताबें लादकर उन्हें लोगों तक पहुँचाया। किताबों पर इस फासीवादी हमले के प्रतिरोध ने लोगों का ध्यान खींचा है और यह पठन-पाठन का एक बेहतरीन प्रचार साबित हुआ है।
सप्तमी का संकट और प्रशासनिक विफलता
इस युद्ध का सबसे खतरनाक चरण सप्तमी के दिन आया, जब कोलकाता की सड़कों पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। शहर के कई क्षेत्रों में पुलिस और सशस्त्र बलों की तैनाती पंडालों की सुरक्षा के बजाय 'अवैध' वामपंथी किताबों के स्टॉल गिराने के लिए की गई। जब जादवपुर विश्वविद्यालय के पास एक प्रसिद्ध बुक स्टॉल को हटाने के लिए बुलडोजर लाए गए, तो विद्यार्थियों सहित बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने मानव श्रृंखला बनाकर उसकी रक्षा की।
इस बीच, प्रशासन की गैर-जिम्मेदारी का एक दुखद परिणाम सामने आया। पुलिस का ध्यान बुक स्टॉल गिराने पर था, लेकिन भीड़ प्रबंधन प्रणाली पूरी तरह विफल रही। उत्तर कोलकाता के चोरबागान पंडाल में हुई भगदड़ में 18 लोगों की जान चली गई। यह आपदा बंगाल के सबसे बड़े उत्सव पर एक गहरा ग्रहण है और फासीवादी शासन के पाखंड को उजागर करती है।
हमने यूरोप में नाज़ियों द्वारा पुस्तकों को जलाए जाने के बारे में सुना था। आज हम इसे अपनी आँखों के सामने देख रहे हैं। यह हमारे राष्ट्रीय कलंक की कहानी है। लेकिन इन मौतों पर शोक व्यक्त करते हुए, आइए हम उन लोगों के प्रति एकजुटता की घोषणा करें, जो उस रात सड़कों पर किताबें बचा रहे थे। उन्हीं में हमारे भविष्य की आशा निहित है।
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