निलंबन पर हाईकोर्ट की रोक, सुनवाई के अधिकार पर बड़ी पीठ करेगी फैसला
निलंबन पर हाईकोर्ट की रोक, सुनवाई के अधिकार पर बड़ी पीठ करेगी फैसला
फर्रुखाबाद/प्रयागराज। कायमगंज स्थित कन्या विद्यापीठ इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य डॉ. विश्वमोहिनी पांडेय के निलंबन मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निलंबन आदेश और जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) के अनुमोदन आदेश पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। साथ ही, मामले में कानूनी मतभेद को देखते हुए यह प्रश्न बड़ी पीठ के समक्ष भेजने की प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया है कि निलंबन को मंजूरी देने से पहले डीआईओएस को संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर देना जरूरी है या नहीं। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकलपीठ में हुई। प्रधानाचार्य ने कॉलेज प्रबंधन के एक जुलाई 2026 के निलंबन आदेश और डीआईओएस के चार अगस्त 2026 के अनुमोदन आदेश को चुनौती दी थी। याचिका में कहा गया कि निलंबन का आधार बनी जांच रिपोर्ट उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई और डीआईओएस के समक्ष अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर भी नहीं मिला।
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम की धारा 16-जी के तहत निलंबन के अनुमोदन में सुनवाई के अधिकार का सवाल प्रमुखता से उठा। इस मुद्दे पर हाईकोर्ट की दो खंडपीठों के पूर्व फैसलों में अलग-अलग मत सामने आए हैं। एक फैसले में सुनवाई को आवश्यक माना गया, जबकि दूसरे में इसे अनिवार्य नहीं माना गया। इसी मतभेद के कारण एकलपीठ ने मामले को बड़ी पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि निलंबन के अनुमोदन के स्तर पर डीआईओएस को मुख्य रूप से यह देखना होता है कि आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर हैं या नहीं। उसे इस चरण पर मामले के पूरे गुण-दोष का अंतिम निर्णय नहीं करना होता, लेकिन अनुमोदन आदेश में संक्षिप्त कारण दर्ज होना जरूरी है। प्रधानाचार्य की ओर से यह भी कहा गया कि वर्ष 2025 में तीन सदस्यीय समिति की जांच में आरोप निराधार पाए गए थे, जबकि बाद में गठित समिति की रिपोर्ट के आधार पर निलंबन किया गया। वहीं, विपक्ष ने दलील दी कि निलंबन दंडात्मक कार्रवाई नहीं है और कानून में डीआईओएस के अनुमोदन के स्तर पर सुनवाई का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने फिलहाल निलंबन और डीआईओएस के अनुमोदन आदेश पर रोक लगा दी है। अब बड़ी पीठ के निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि भविष्य में निलंबन के अनुमोदन से पहले संबंधित शिक्षक या प्रधानाचार्य को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होगा या नहीं।
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